उत्तर प्रदेश में बुनियादी ढांचे और विकास की रफ्तार को बढ़ाने के लिए बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं। इन्हीं दावों के बीच ₹4,200 करोड़ की भारी-भरकम लागत से बना कानपुर-लखनऊ ग्रीनफील्ड एलिवेटेड एक्सप्रेसवे सुर्खियों में है। इस एक्सप्रेसवे का उद्घाटन 13 जुलाई 2026 को बड़ी धूमधाम से देश के बड़े मंत्रियों द्वारा किया गया था। लेकिन इस चमचमाती सड़क की 'उम्र' केवल दो हफ्ते भी नहीं टिक सकी।
उत्तर प्रदेश में बुनियादी ढांचे और विकास की रफ्तार को बढ़ाने के लिए बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं। इन्हीं दावों के बीच ₹4,200 करोड़ की भारी-भरकम लागत से बना कानपुर-लखनऊ ग्रीनफील्ड एलिवेटेड एक्सप्रेसवे सुर्खियों में है। इस एक्सप्रेसवे का उद्घाटन 13 जुलाई 2026 को बड़ी धूमधाम से देश के बड़े मंत्रियों द्वारा किया गया था। लेकिन इस चमचमाती सड़क की 'उम्र' केवल दो हफ्ते भी नहीं टिक सकी।
महज 17 दिनों के भीतर यह एक्सप्रेसवे तीसरी बार टूट और धंस चुका है। पहली ही मानसूनी बारिश ने इस 63 किलोमीटर लंबे एक्सप्रेसवे के निर्माण की गुणवत्ता को पानी में बहा दिया है।
पहली ही बारिश में खुली पोल, धंस गया ट्रक
एक्सप्रेसवे के खुलने के ठीक 12-13 दिन बाद, उन्नाव के कोरारी गांव (किलोमीटर संख्या 64) के पास सड़क का करीब 5 से 7 मीटर का हिस्सा पूरी तरह धंस गया और उसमें गहरी दरारें आ गईं। सोशल मीडिया पर इसका वीडियो वायरल होने के बाद राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (NHAI) ने आनन-फानन में पैचवर्क कर इसे ठीक किया।
लेकिन भ्रष्टाचार की नींव इतनी कमजोर थी कि यह मरम्मत भी ज्यादा दिन नहीं टिकी। अभी हाल ही में
किलोमीटर संख्या 30 (बेगमखेड़ा गांव) के पास सड़क फिर से उखड़ गई। हद तो तब हो गई जब मरम्मत कार्य के ठीक पहले सड़क धंसने की वजह से गिट्टियों से लदा एक ट्रक वहीं असंतुलित होकर पलट गया। महज दो हफ्तों में बार-बार मरम्मत का काम चालू होना यह साफ दिखाता है कि निर्माण में कितने बड़े पैमाने पर लापरवाही बरती गई है। [,
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मंत्रियों की कोठी, अफसरों का कैश और ठेकेदारों के हीरे!
जब कोई आम नागरिक ₹4,200 करोड़ की लागत सुनता है, तो वह उम्मीद करता है कि उसे अंतरराष्ट्रीय स्तर की सुरक्षित सड़क मिलेगी। लेकिन जब उद्घाटन के तुरंत बाद ही सड़कें ताश के पत्तों की तरह ढहने लगें, तो जनता का यह सोचना बिल्कुल स्वाभाविक है कि जनता की गाढ़ी कमाई का टैक्स आखिर गया कहाँ?
यदि आप इस एक्सप्रेसवे को कंक्रीट की सड़क के बजाय भ्रष्टाचार के चश्मे से नजदीक जाकर देखेंगे, तो आपको इसमें सड़क की गिट्टियां नहीं, बल्कि:
- नेताओं और मंत्रियों की आलीशान कोठियां नजर आएंगी।
- भ्रष्ट अधिकारियों की तिजोरियों में बंद बेहिसाब कैश दिखाई देगा।
- ठेकेदारों की पत्नियों के गले में चमकते हीरे के कीमती हार साफ महसूस होंगे।
यह सिर्फ एक सड़क का धंसना नहीं है, बल्कि यह आम जनता के विश्वास और कड़े टैक्स के पैसों का कत्ल है। जिन पैसों से देश का भविष्य बनना था, उससे कुछ रसूखदारों के घर के ऐशो-आराम सजाए जा रहे हैं।
NHAI की सफाई और विपक्ष के तीखे वार
इस पूरी घटना के बाद मुख्य विपक्षी दलों (सपा और कांग्रेस) ने सरकार को घेरते हुए इसे 'योगी सरकार का सीधा भ्रष्टाचार' करार दिया है। सोशल मीडिया पर यूज़र्स इस एक्सप्रेसवे की तुलना "बारिश में घुलने वाले बिस्किट" से कर रहे हैं। दूसरी तरफ, NHAI (National Highways Authority of India) के अधिकारी इसे एक सामान्य 'सरफेस स्लिपेज' (ऊपरी सतह का खिसकना) बताकर अपना पल्ला झाड़ने की कोशिश कर रहे हैं। लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या ₹4200 करोड़ के प्रोजेक्ट में 'सामान्य' तौर पर भी पहली बारिश में ट्रक धंस जाते हैं?
बुनियादी ढांचे का विकास किसी भी राज्य के लिए गर्व की बात होती है, लेकिन जब विकास के नाम पर केवल ठेकेदारों और भ्रष्ट तंत्र की जेबें भरी जाएं, तो वह विकास विनाश को बुलावा देता है। आज कानपुर-लखनऊ एक्सप्रेसवे पर सफर करने वाले यात्री अपनी जान जोखिम में डालकर चल रहे हैं। सरकार को चाहिए कि वह केवल लीपापोती करने के बजाय इस घटिया निर्माण के जिम्मेदार इंजीनियरों और पीएनसी (PNC) इंफ्राटेक जैसी निर्माण कंपनियों पर सख्त से सख्त कार्रवाई करे।