ICRIER के प्रोफेसर रमेश चंद ने एथेनॉल के लिए मक्के की खेती बढ़ाने की सलाह दी है। जानें पंजाब-हरियाणा में धान की जगह मक्का और MSP की भूमिका।

भारत में एथेनॉल उत्पादन के लिए मक्के के इस्तेमाल को बढ़ाने की वकालत करते हुए इंडियन काउंसिल फॉर रिसर्च ऑन इंटरनेशनल इकोनॉमिक रिलेशंस (ICRIER) के Distinguished Professor रमेश चंद ने एक अहम शर्त रखी है।
उनका कहना है कि एथेनॉल के लिए मक्के की खेती बढ़नी चाहिए, लेकिन इसके लिए ऐसी जमीन का इस्तेमाल होना चाहिए जहां अभी पानी की अधिक खपत वाली धान की खेती हो रही है। खास तौर पर पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश जैसे क्षेत्रों में धान के कुछ हिस्से को मक्के से बदलने की संभावना पर उन्होंने जोर दिया।
उनके मुताबिक, अगर किसानों को मक्के के लिए धान की तरह भरोसेमंद MSP खरीद मिलती है, तो यह फसल विविधीकरण को गति देने वाला सबसे बड़ा कदम हो सकता है।
रमेश चंद के मुताबिक, मौजूदा समय में एथेनॉल के लिए इस्तेमाल किए जा रहे प्रमुख फीडस्टॉक्स में मक्का कई तरह की लागत को देखते हुए बेहतर विकल्प है।
उनका तर्क है कि जहां धान की खेती पर्यावरण पर दबाव बढ़ा रही है, वहां मक्के को बढ़ावा देना केवल ईंधन नीति का मामला नहीं है। इससे खेती की लागत, पर्यावरण और लंबे समय की कृषि स्थिरता—तीनों को बेहतर तरीके से संतुलित किया जा सकता है।
खास तौर पर उत्तर-पश्चिम भारत में धान की खेती ने भूजल पर दबाव बढ़ाया है। ऐसे क्षेत्रों में वैकल्पिक फसल के रूप में मक्का फसल विविधीकरण की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
पंजाब और हरियाणा भारत के प्रमुख धान उत्पादक राज्यों में हैं, लेकिन यहां धान की खेती का विस्तार भूजल संसाधनों पर दबाव से जुड़ा रहा है।
धान की जगह मक्का लाने से किसानों को वैकल्पिक फसल मिल सकती है और पानी की अधिक मांग वाली खेती पर निर्भरता कम करने की कोशिश की जा सकती है।
रमेश चंद ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश को भी ऐसे संभावित क्षेत्र के रूप में बताया है जहां धान से मक्का की ओर बदलाव किया जा सकता है।
हालांकि, केवल फसल बदलने की सलाह पर्याप्त नहीं होगी। किसानों के लिए सबसे बड़ा सवाल यह रहेगा कि मक्का बेचने पर उन्हें धान के मुकाबले कितनी निश्चित आय मिलेगी।
रमेश चंद के मुताबिक, मक्के की MSP पर सुनिश्चित खरीद फसल विविधीकरण की सबसे बड़ी कुंजी हो सकती है।
धान के किसानों को सरकारी खरीद का एक स्थापित तंत्र मिलता है। इसके मुकाबले मक्का उत्पादकों को कई बार MSP से कम कीमत पर अपनी उपज बेचनी पड़ सकती है।
ऐसे में किसान के लिए धान छोड़कर मक्का अपनाने का जोखिम बढ़ जाता है। अगर सरकार मक्के के लिए भी प्रभावी खरीद व्यवस्था सुनिश्चित करती है, तो किसान के लिए फसल बदलने का आर्थिक जोखिम कम होगा।
चंद ने मक्के के लिए PM-AASHA जैसी व्यवस्था के जरिए खरीद समर्थन देने का सुझाव दिया है। उनका मानना है कि केंद्र और राज्य सरकारों के सहयोग से ऐसी व्यवस्था किसानों को धान से मक्का की ओर जाने के लिए प्रोत्साहित कर सकती है।
रमेश चंद ने घरेलू मक्का उत्पादन बढ़ाने के लिए तीन प्रमुख संभावनाओं की ओर इशारा किया।
पहला रास्ता पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में धान के कुछ क्षेत्र को मक्के में बदलना है।
दूसरा, बिहार जैसे राज्यों में धान की कटाई के बाद खाली रहने वाले rice fallows का इस्तेमाल मक्के की खेती के लिए किया जा सकता है।
तीसरा रास्ता मक्के की उत्पादकता बढ़ाना है। बेहतर बीज, तकनीक और कृषि प्रबंधन के जरिए प्रति हेक्टेयर उत्पादन में वृद्धि होने पर बिना बड़े पैमाने पर अतिरिक्त जमीन की जरूरत के भी घरेलू आपूर्ति बढ़ाई जा सकती है।
मक्के से एथेनॉल उत्पादन बढ़ने को लेकर एक चिंता यह भी रही है कि इससे सोयाबीन और अन्य तिलहनों की मांग प्रभावित हो सकती है।
रमेश चंद ने इस तर्क को खारिज किया। उनके मुताबिक, भारत से नॉन-GM ऑयलकेक और ऑयल मील की विदेशों में मांग बनी हुई है, खासकर यूरोपीय बाजारों में।
इसलिए उनके अनुसार मक्के की खेती बढ़ने को सीधे सोयाबीन मील की मांग में संरचनात्मक गिरावट से जोड़ना उचित नहीं है।
रमेश चंद ने इस आशंका को भी स्वीकार नहीं किया कि एथेनॉल के लिए मक्के की मांग बढ़ने से भारत की खाद्य तेल आयात निर्भरता बढ़ जाएगी।
उनके अनुसार, भारत की खाद्य तेलों में आत्मनिर्भरता की मुख्य चुनौती तिलहन की कम उत्पादकता है।
सोयाबीन और अन्य तिलहनों की उत्पादकता बढ़ाए बिना भारत खाद्य तेलों के मामले में आत्मनिर्भरता हासिल नहीं कर सकता। उनके मुताबिक, पिछले एक दशक में मक्के की उत्पादकता में उल्लेखनीय सुधार हुआ है, जबकि सोयाबीन की पैदावार अपेक्षाकृत स्थिर रही है।
इस नजरिए से मक्के की उत्पादकता में आगे सुधार करना एथेनॉल और कृषि आय दोनों के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है।
देश में एथेनॉल उत्पादन क्षमता बढ़ने के साथ मक्के की अतिरिक्त मांग भी पैदा हुई है। इसी वजह से मक्का आयात में बढ़ोतरी को लेकर चिंता सामने आई है।
रमेश चंद का मानना है कि भारत भविष्य की घरेलू मांग को पूरा कर सकता है, लेकिन इसके लिए मक्के का उत्पादन सही क्षेत्रों में बढ़ाना होगा।
धान वाले इलाकों में फसल विविधीकरण, बिहार में rice fallows का इस्तेमाल और उत्पादकता बढ़ाना—इन तीनों उपायों से घरेलू मक्का उपलब्धता में सुधार किया जा सकता है।
एथेनॉल नीति और E20 पेट्रोल को लेकर रमेश चंद ने एक अलग चिंता भी जताई। उन्होंने स्पष्ट किया कि उनकी आपत्ति कृषि क्षेत्र में एथेनॉल के इस्तेमाल को लेकर नहीं, बल्कि वाहनों की compatibility को लेकर है।
उनके मुताबिक, भारत में बड़ी संख्या में दोपहिया और चारपहिया वाहन 2023 से पहले बनाए गए हैं और हो सकता है कि वे ज्यादा एथेनॉल मिश्रण के लिए पूरी तरह अनुकूल न हों।
इसलिए एथेनॉल उत्पादन बढ़ाने के साथ वाहन तकनीक और ईंधन compatibility का मुद्दा भी नीति निर्माण में महत्वपूर्ण रहेगा।
मक्के की MSP पर भरोसेमंद सरकारी खरीद उपलब्ध होना इस बदलाव के लिए निर्णायक हो सकता है।
किसान आमतौर पर केवल फसल की पर्यावरणीय उपयोगिता देखकर फसल नहीं बदलते हैं। उनके लिए बाजार, कीमत, सरकारी खरीद और आय की स्थिरता ज्यादा महत्वपूर्ण होती है।
इसी वजह से रमेश चंद का सुझाव है कि अगर मक्के के लिए धान जैसी खरीद सुरक्षा तैयार की जाती है, तो किसान फसल विविधीकरण को ज्यादा आसानी से अपना सकते हैं।
मक्के से एथेनॉल उत्पादन बढ़ाने की रणनीति को केवल पेट्रोल में एथेनॉल मिश्रण के लक्ष्य से जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए।
सही क्षेत्रों में मक्के का विस्तार होने पर यह फसल विविधीकरण, भूजल पर दबाव कम करने और किसानों के लिए वैकल्पिक फसल उपलब्ध कराने में मदद कर सकता है।
लेकिन इसकी सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि सरकार मक्का किसानों के लिए बाजार और कीमत का कितना मजबूत सुरक्षा तंत्र तैयार करती है। यदि मक्का केवल एथेनॉल उद्योग की बढ़ती मांग के कारण महंगा होता है, जबकि किसानों को स्थिर खरीद नहीं मिलती, तो वांछित फसल विविधीकरण हासिल करना मुश्किल हो सकता है।
इसलिए आगे की नीति में एथेनॉल उत्पादन बढ़ाने के साथ-साथ MSP खरीद, उत्पादकता, क्षेत्रीय फसल योजना और जल संरक्षण को एक साथ देखना जरूरी होगा।