भारत की कृषि अर्थव्यवस्था में महिलाओं की भागीदारी लगातार बढ़ रही है, लेकिन उनकी मेहनत और किसान के रूप में पहचान के बीच अब भी बड़ा अंतर बना हुआ है। Arya.ag की नई रिपोर्ट ‘Her Harvest 2026: The Hidden Cost of Women’s Invisible Work in Indian Agriculture’ के मुताबिक, कृषि क्षेत्र में काम करने वाली 50.5% महिलाएं परिवार के खेतों पर बिना वेतन वाले सहायक (Unpaid Helpers) के रूप में दर्ज हैं। पुरुषों में यह आंकड़ा 21.7% है।

भारत की कृषि अर्थव्यवस्था में महिलाओं की भागीदारी लगातार बढ़ रही है, लेकिन उनकी मेहनत और किसान के रूप में पहचान के बीच अब भी बड़ा अंतर बना हुआ है। Arya.ag की नई रिपोर्ट ‘Her Harvest 2026: The Hidden Cost of Women’s Invisible Work in Indian Agriculture’ के मुताबिक, कृषि क्षेत्र में काम करने वाली 50.5% महिलाएं परिवार के खेतों पर बिना वेतन वाले सहायक (Unpaid Helpers) के रूप में दर्ज हैं। पुरुषों में यह आंकड़ा 21.7% है।
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि आधिकारिक आंकड़ों में ‘हेल्पर’ को किसान या कृषक के रूप में वर्गीकृत नहीं किया जाता। ऐसे में बड़ी संख्या में महिलाएं खेती में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने के बावजूद औपचारिक रूप से किसान के तौर पर दर्ज नहीं हो पातीं।
Arya.ag की रिपोर्ट के अनुसार, भारत के कृषि कार्यबल में महिलाओं की हिस्सेदारी अब करीब 48% हो गई है। 2017-18 में यह लगभग 30% थी।
इस बढ़ती भागीदारी के बावजूद जमीन के मालिकाना हक, कृषि ऋण, तकनीक, बाजार और उत्पादन संसाधनों तक महिलाओं की पहुंच सीमित बनी हुई है। रिपोर्ट का निष्कर्ष है कि महिलाओं की कम उत्पादकता को उनकी क्षमता से जोड़ना सही नहीं होगा। इसके पीछे संसाधनों और वित्तीय सुविधाओं तक असमान पहुंच प्रमुख कारणों में शामिल है।
रिपोर्ट के आंकड़े PLFS 2023-24, Agriculture Census 2015-16, FAO, ILO और भारत सरकार समेत विभिन्न सार्वजनिक और संस्थागत स्रोतों पर आधारित हैं।
रिपोर्ट के अनुसार, भारत में महिलाओं के पास कृषि की 13.96% परिचालन जोत (Operational Holdings) हैं। वैश्विक औसत करीब 14.5% बताया गया है।
कृषि क्षेत्र के मामले में भारत की स्थिति कुछ देशों से बेहतर भी है। भारत में महिलाएं करीब 11.72% खेती योग्य क्षेत्र का संचालन करती हैं। इसकी तुलना में ब्राजील में महिलाओं के प्रमुख संचालन वाली कृषि भूमि करीब 8.5% और अमेरिका में करीब 7% बताई गई है।
हालांकि, नेपाल की स्थिति भारत से काफी आगे है। वहां महिलाएं करीब 32.4% कृषि जोत रखती हैं और 22.3% कृषि क्षेत्र का संचालन करती हैं।
रिपोर्ट के मुताबिक, कृषि और खाद्य प्रणालियों में महिलाएं पुरुषों द्वारा कमाए गए प्रत्येक ₹100 के मुकाबले करीब ₹82 कमाती हैं।
वहीं, समान काम करने वाली महिला कृषि श्रमिकों को पुरुषों की तुलना में करीब 20-30% कम मजदूरी मिलने की बात रिपोर्ट में कही गई है।
रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि समान आकार के पुरुषों द्वारा संचालित खेतों की तुलना में महिलाओं द्वारा संचालित खेतों की उत्पादकता करीब 24% कम हो सकती है। रिपोर्ट इस अंतर को महिलाओं की क्षमता से नहीं, बल्कि ऋण, इनपुट और अन्य उत्पादक संसाधनों तक उनकी सीमित पहुंच से जोड़ती है।
रिपोर्ट ने FAO के उस अनुमान का इस्तेमाल किया है, जिसके अनुसार उत्पादक संसाधनों तक असमान पहुंच के कारण कृषि उत्पादन में 2.5-4% तक की कमी हो सकती है।
भारत के ₹48.7 लाख करोड़ के कृषि GVA को आधार मानते हुए रिपोर्ट का अनुमान है कि देश हर साल करीब ₹1.2 लाख करोड़ से ₹2 लाख करोड़ के कृषि उत्पादन से वंचित रह सकता है।
रिपोर्ट का तर्क है कि समस्या यह नहीं है कि महिलाएं खेती कम करती हैं, बल्कि यह है कि वे अक्सर पुरुषों की तुलना में कम संसाधनों के साथ खेती करती हैं।
Arya.ag के Managing Director और CEO प्रसन्न राव ने कहा कि महिलाओं को वित्त, भंडारण, तकनीक और संगठित बाजारों तक बेहतर पहुंच मिलने से इसका लाभ केवल व्यक्तिगत किसान तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि परिवार, समुदाय और व्यापक कृषि अर्थव्यवस्था तक पहुंचेगा।
उन्होंने 2026 को International Year of the Woman Farmer के रूप में महिला किसानों की भूमिका को मजबूत करने का अवसर बताया। उनके अनुसार, महिलाओं की भूमिका को केवल कृषि श्रम से आगे बढ़ाकर नेतृत्व तक पहुंचाना अधिक उत्पादक, लचीली और समावेशी कृषि अर्थव्यवस्था के लिए जरूरी है।
रिपोर्ट में सबसे पहले महिलाओं को किसान के रूप में पहचान देने पर जोर दिया गया है, भले ही जमीन के दस्तावेजों में उनका नाम दर्ज हो या नहीं।
इसके साथ ही कृषि ऋण, खरीद और FPO (Farmer Producer Organisation) की सदस्यता से जुड़े आंकड़ों को पुरुषों और महिलाओं के आधार पर अलग-अलग प्रकाशित करने की सिफारिश की गई है।
रिपोर्ट में बिना अधिक जमानत वाले ऋण, वेयरहाउस रसीदों और महिलाओं के नाम पर कृषि क्रेडिट खातों को बढ़ावा देने की बात भी कही गई है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि वित्तीय सहायता केवल जमीन के मालिकाना हक के आधार पर नहीं, बल्कि वास्तविक कृषि गतिविधि से भी जुड़ी हो।
महिला किसानों तक ड्रोन, कृषि सलाह और बाजार से जुड़ी तकनीक पहुंचाने के लिए उन संस्थानों का विस्तार करने का सुझाव दिया गया है, जिनमें महिलाएं सक्रिय रूप से भाग लेती हैं और नेतृत्व करती हैं।
रिपोर्ट ने महिला-नेतृत्व वाले FPO को केवल अल्पकालिक योजनाओं के बजाय लंबे समय तक काम करने वाले बाजार संस्थानों के रूप में विकसित करने की जरूरत पर भी जोर दिया है।
कृषि क्षेत्र में महिलाओं की बढ़ती भागीदारी के बावजूद अगर उन्हें किसान के रूप में औपचारिक पहचान, सस्ता ऋण, तकनीक, बाजार और भंडारण जैसी सुविधाएं नहीं मिलतीं, तो उनकी आर्थिक क्षमता पूरी तरह सामने नहीं आ पाएगी।
Arya.ag की रिपोर्ट इसी अंतर की ओर ध्यान दिलाती है। आंकड़े बताते हैं कि भारतीय कृषि में महिलाओं का योगदान बड़ा है, लेकिन संसाधनों और अवसरों तक उनकी पहुंच अभी भी उस योगदान के अनुपात में नहीं है।