वंदे मातरम्’ को लेकर कांग्रेस और बीजेपी के बीच राजनीतिक विवाद गुरुवार को और तेज हो गया। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कांग्रेस कार्यसमिति (CWC) के उस फैसले पर तीखा हमला बोला, जिसमें पार्टी ने अपने कार्यक्रमों में वंदे मातरम् के केवल पहले दो छंद गाने का फैसला दोहराया

वंदे मातरम्’ को लेकर कांग्रेस और बीजेपी के बीच राजनीतिक विवाद गुरुवार को और तेज हो गया। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कांग्रेस कार्यसमिति (CWC) के उस फैसले पर तीखा हमला बोला, जिसमें पार्टी ने अपने कार्यक्रमों में वंदे मातरम् के केवल पहले दो छंद गाने का फैसला दोहराया है।
कांग्रेस ने यह रुख अपने 1937 के प्रस्ताव के आधार पर अपनाया है। CWC ने बुधवार को कहा था कि पार्टी के कार्यक्रमों में आगे भी राष्ट्रीय गीत के पहले दो छंद ही गाए जाएंगे।
अमित शाह ने कांग्रेस के इस फैसले को ‘राष्ट्रविरोधी’ करार देते हुए आरोप लगाया कि 1937 में वंदे मातरम् के कुछ हिस्सों को अलग करने का फैसला तुष्टिकरण की राजनीति के तहत लिया गया था।
अमित शाह ने गुरुवार को कांग्रेस पर निशाना साधते हुए कहा कि CWC का मौजूदा फैसला उसके 1937 के रुख को दोहराता है। उन्होंने दावा किया कि उस समय वंदे मातरम् के विभाजन ने देश के विभाजन की नींव रखने में भूमिका निभाई।
गृह मंत्री ने यह भी आरोप लगाया कि कांग्रेस ने मुस्लिम तुष्टिकरण की राजनीति के कारण राष्ट्रीय गीत के पूरे स्वरूप को स्वीकार नहीं किया।
शाह के मुताबिक, मौजूदा सरकार ने इस ऐतिहासिक ‘गलती’ को सुधारने की कोशिश की है और राष्ट्रीय एकता को मजबूत करने के लिए इसे कानूनी ढांचा भी दिया है।
उन्होंने कांग्रेस पर निशाना साधते हुए कहा कि पार्टी एक ओर अपने 1937 के प्रस्ताव को लागू कर रही है, जबकि दूसरी ओर संसद द्वारा बनाए गए कानून को स्वीकार नहीं कर रही।
यह विवाद केवल मौजूदा राजनीति तक सीमित नहीं है। इसकी जड़ें स्वतंत्रता आंदोलन के दौर तक जाती हैं।
1937 में कांग्रेस कार्यसमिति ने वंदे मातरम् के इस्तेमाल को लेकर विचार किया था। उस समय पार्टी के सामने गीत के कुछ हिस्सों को लेकर आपत्तियां रखी गई थीं। इसके बाद पहले दो छंदों को कांग्रेस और सार्वजनिक कार्यक्रमों के लिए अपनाने का फैसला किया गया।
कांग्रेस का मौजूदा तर्क इसी ऐतिहासिक निर्णय पर आधारित है। पार्टी का कहना है कि पहले दो छंद लंबे समय से राष्ट्रीय आंदोलन और सार्वजनिक आयोजनों में इस्तेमाल होते रहे हैं।
इसी वजह से CWC ने 2026 में भी 1937 के प्रस्ताव का हवाला देते हुए पार्टी कार्यक्रमों में पहले दो छंदों के इस्तेमाल पर कायम रहने का निर्णय लिया।
वंदे मातरम् को लेकर ताजा राजनीतिक विवाद स्वतंत्रता दिवस के आसपास तेज हुआ। इसके बाद बीजेपी नेताओं ने कांग्रेस पर राष्ट्रीय गीत के अपमान का आरोप लगाया।
कांग्रेस ने इन आरोपों को खारिज करते हुए बीजेपी और RSS पर पलटवार किया। कांग्रेस नेता पवन खेड़ा ने गुरुवार को सवाल उठाया कि स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान RSS की भूमिका क्या थी और अब संगठन वंदे मातरम् को लेकर कांग्रेस को उपदेश क्यों दे रहा है।
इससे विवाद केवल गीत के गायन तक सीमित न रहकर कांग्रेस और बीजेपी की राष्ट्रवाद तथा स्वतंत्रता आंदोलन की विरासत को लेकर राजनीतिक बहस में बदल गया है।
अमित शाह ने अपने हमले को आगे बढ़ाते हुए कहा कि कांग्रेस के इस फैसले के खिलाफ देश को एकजुट होना चाहिए।
उन्होंने आरोप लगाया कि कांग्रेस एक बार फिर ‘तुष्टिकरण की राजनीति’ को आगे बढ़ा रही है और बीजेपी अब ऐसी राजनीति को स्वीकार नहीं करेगी।
गृह मंत्री ने यह भी कहा कि वंदे मातरम् केवल एक गीत नहीं है, बल्कि स्वतंत्रता संग्राम के दौरान लाखों लोगों की भावनाओं और बलिदान से जुड़ा प्रतीक है।
उनका आरोप है कि कांग्रेस के मौजूदा फैसले से Bankim Chandra Chattopadhyay की रचना और स्वतंत्रता आंदोलन में इससे जुड़े लोगों का अपमान हुआ है। India
कांग्रेस ने फिलहाल अपने 1937 के फैसले को ही आधार बनाया है। CWC के निर्णय के अनुसार, पार्टी के कार्यक्रमों में वंदे मातरम् के पहले दो छंद गाए जाएंगे।
कांग्रेस नेताओं ने बीजेपी के आरोपों पर पलटवार करते हुए स्वतंत्रता आंदोलन में अपने योगदान का हवाला दिया है।
इससे साफ है कि दोनों प्रमुख दल इस मुद्दे को केवल गीत के स्वरूप के बजाय अपने व्यापक राजनीतिक और वैचारिक नैरेटिव से जोड़ रहे हैं।
1937 का प्रस्ताव इस पूरे विवाद का सबसे महत्वपूर्ण ऐतिहासिक संदर्भ है।
कांग्रेस कार्यसमिति ने उस समय माना था कि वंदे मातरम् का स्वतंत्रता आंदोलन में विशेष ऐतिहासिक महत्व है। साथ ही, गीत के कुछ हिस्सों को लेकर उठाई गई आपत्तियों पर विचार करते हुए पहले दो छंदों को सार्वजनिक और कांग्रेस कार्यक्रमों के लिए अपनाने का निर्णय लिया गया था।
यही प्रस्ताव अब करीब नौ दशक बाद फिर राजनीतिक बहस के केंद्र में है।
बीजेपी इसे कांग्रेस की पुरानी ‘तुष्टिकरण नीति’ के प्रमाण के रूप में पेश कर रही है, जबकि कांग्रेस इसे अपने ऐतिहासिक और संगठनात्मक फैसले के पालन के तौर पर देख रही है।
वंदे मातरम् भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन से गहराई से जुड़ा हुआ है और इसे भारत के राष्ट्रीय गीत का दर्जा प्राप्त है। इसी कारण इसके स्वरूप और सार्वजनिक गायन को लेकर होने वाली राजनीतिक बहस का भावनात्मक महत्व भी काफी अधिक है।
मौजूदा विवाद में बीजेपी कांग्रेस पर राष्ट्रवाद और तुष्टिकरण को लेकर हमला कर रही है, जबकि कांग्रेस अपने ऐतिहासिक फैसले और स्वतंत्रता आंदोलन में अपनी भूमिका को सामने रख रही है।
अमित शाह के ताजा बयान के बाद यह विवाद संसद और राजनीतिक मंचों पर और तेज होने की संभावना है। फिलहाल दोनों दल इस मुद्दे पर अपने-अपने राजनीतिक नैरेटिव को मजबूत करने में जुटे हैं।