गौतम बुद्ध नगर की जिलाधिकारी मेधा रूपम एक बार फिर विवादों के केंद्र में हैं। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने दिल्ली विश्वविद्यालय की 25 वर्षीय स्नातक आकृति चौधरी की राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम (NSA) के तहत हुई हिरासत को रद्द करते हुए डीएम के आचरण पर बेहद सख्त टिप्पणी की है। कोर्ट ने इसे मनगढ़ंत कहानी पर आधारित बताते हुए प्रशासनिक कार्रवाई को तानाशाही रवैया करार दिया।

गौतम बुद्ध नगर की जिलाधिकारी मेधा रूपम एक बार फिर विवादों के केंद्र में हैं। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने दिल्ली विश्वविद्यालय की 25 वर्षीय स्नातक आकृति चौधरी की राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम (NSA) के तहत हुई हिरासत को रद्द करते हुए डीएम के आचरण पर बेहद सख्त टिप्पणी की है। कोर्ट ने इसे मनगढ़ंत कहानी पर आधारित बताते हुए प्रशासनिक कार्रवाई को तानाशाही रवैया करार दिया।
अप्रैल 2026 में हुए नोएडा मजदूर प्रदर्शन के सिलसिले में एनएसए के तहत हिरासत में लिए जाने के बाद आकृति चौधरी करीब पांच महीने तक न्यायिक हिरासत में रहीं। जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस अचल सचदेव की बेंच ने उनकी तत्काल रिहाई का आदेश देते हुए उन्हें 5 लाख रुपये का मुआवजा दिए जाने का निर्देश दिया। कोर्ट ने साफ कहा कि यह राशि उन सभी जिम्मेदार अधिकारियों की सैलरी से वसूली जाए, थाना अध्यक्ष स्तर तक के अधिकारियों समेत
अदालत ने डीएम के आचरण को लेकर बेहद तीखी भाषा का इस्तेमाल किया। बेंच ने कहा कि रूपम का व्यवहार "उपहास के लायक" था और यह देखा कि डीएम आकृति के जरिए एक मिसाल कायम करना चाहती थीं ताकि अन्य लोगों को मजदूरों के समर्थन में विरोध जताने से रोका जा सके
कोर्ट ने अपनी टिप्पणी में जॉर्ज ऑरवेल के मशहूर उपन्यासों '1984' और 'एनिमल फार्म' का भी हवाला दिया और आगाह किया कि नौकरशाही में गड़बड़ी करने वाले अधिकारी जल्द ही उत्तर प्रदेश को "ऑरवेलियन डिस्टोपिया" में बदल सकते हैं। बेंच ने यह भी कहा कि जो नौकरशाह और पुलिस अधिकारी अपनी शपथ के खिलाफ काम करते हैं, उन्हें ब्रिटिश साम्राज्य के दमनकारी अवशेष के तौर पर देखा जा सकता है।
अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि भले ही पुलिस रिपोर्ट में आकृति के खिलाफ आरोप शामिल थे, लेकिन एनएसए जैसा कड़ा कदम उठाने से पहले रिकॉर्ड की बारीकी से जांच करना डीएम की जिम्मेदारी थी।
रिपोर्ट्स के मुताबिक आकृति चौधरी को 12 अप्रैल 2026 को गिरफ्तार किया गया था, और राज्य सरकार के वकील ने आरोप लगाया था कि उन्होंने भीड़ को आगजनी और पथराव के लिए उकसाया। इसके बाद उनके खिलाफ एनएसए, 1980 लगाया गया। हालांकि जजों ने पाया कि गिरफ्तारी से पहले बीएनएसएस की धारा 126 के तहत जरूरी नोटिस उन्हें नहीं दिया गया था।
गौरतलब है कि कुछ रिपोर्ट्स में उनकी गिरफ्तारी की तारीख 11 अप्रैल भी बताई गई है, और अदालत में यह तथ्य भी सामने आया कि जो हिंसा हुई, वह आकृति चौधरी की गिरफ्तारी के बाद हुई जिससे यह सवाल खड़ा हुआ कि उन्हें उन घटनाओं के लिए कैसे जिम्मेदार ठहराया जा सकता है जो उनकी हिरासत के बाद हुईं।
नोएडा में अप्रैल में मजदूरों की आम हड़ताल पथराव और तोड़फोड़ जैसी घटनाओं के चलते हिंसक हो गई थी। स्थानीय प्रशासन पर मामले को ठीक से न संभाल पाने के आरोप लगे, क्योंकि यह सवाल भी उठा कि क्या हिंसा भड़कने से पहले मजदूरों की जरूरतों को पूरा करने की कोशिश की गई थी।
जनवरी 2026 में सॉफ्टवेयर इंजीनियर युवराज मेहता की उस समय मौत हो गई थी जब जलभराव से भरे एक गड्ढे में उनकी कार गिर गई थी। इस मामले में मेधा रूपम की आलोचना इसलिए हुई क्योंकि वे घटनास्थल पर घटना के चार दिन बाद पहुंचीं और मीडिया से बातचीत नहीं की।
इस हादसे ने शहर की नागरिक बुनियादी ढांचे, जलभराव की समस्या और खतरनाक सड़क हालातों को लेकर मिलने वाली शिकायतों पर प्रशासन के रवैये को लेकर भी कई सवाल खड़े कर दिए थे।
रूपम प्रशासन का एक और विवादित फैसला उस समय सामने आया जब तीन थाना क्षेत्रों में 60 से ज्यादा बूथ लेवल अधिकारियों और सुपरवाइजरों के खिलाफ आपराधिक एफआईआर दर्ज की गई। यह कार्रवाई जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 32 के तहत की गई थी, जिसमें गहन मतदाता सूची मिलान के दौरान लापरवाही का हवाला दिया गया।
इस कार्रवाई की आलोचना इस वजह से हुई क्योंकि इसमें बड़ी संख्या में अधिकारियों के नाम शामिल थे और चुनावी कामकाज में कथित खामियों को लेकर सीधे आपराधिक कार्यवाही का सहारा लिया गया।
मेधा रूपम भारत के 26वें मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की बेटी हैं। 1988 बैच के केरल कैडर के आईएएस अधिकारी ज्ञानेश कुमार का जन्म 1964 में आगरा में हुआ था और उन्होंने प्रशासनिक सेवा में 35 साल बिताए हैं। उन्होंने गृह मंत्रालय में अहम पदों पर रहते हुए अनुच्छेद 370 हटाने, जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम का मसौदा तैयार करने और श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट की स्थापना जैसे कामों में भूमिका निभाई थी।
आईआईटी कानपुर से सिविल इंजीनियरिंग स्नातक ज्ञानेश कुमार ने आईसीएफएआई और हार्वर्ड से भी उच्च शिक्षा हासिल की है। वे संसदीय कार्य और सहकारिता मंत्रालयों में सचिव रहे, जनवरी 2024 में सेवानिवृत्त होने के बाद चुनाव आयोग से जुड़े और फरवरी 2025 में मुख्य चुनाव आयुक्त बने। उनका कार्यकाल जनवरी 2029 तक है, जिसमें अगला लोकसभा चुनाव भी शामिल है।
आलोचकों और विपक्षी दलों का आरोप रहा है कि उत्तर प्रदेश सरकार ने मेधा रूपम को उनके पारिवारिक कनेक्शन के चलते सख्त जवाबदेही से बचाया और उन्हें अहम पदों पर तेजी से पदस्थ किया। हालांकि यह पूरी तरह उनके आलोचकों की ओर से लगाए गए आरोप हैं, इनकी कोई स्वतंत्र या आधिकारिक पुष्टि सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं है।
अगस्त 2025 में नोएडा की पहली महिला जिलाधिकारी बनीं मेधा रूपम 2014 बैच की आईएएस अधिकारी हैं, जिन्होंने यूपीएससी 2013 में अखिल भारतीय स्तर पर 10वीं रैंक हासिल की थी। वे एक राष्ट्रीय स्तर की राइफल शूटर भी हैं। अब हाई कोर्ट के इस ताजा आदेश ने एक बार फिर उनके प्रशासनिक फैसलों और विवादित मामलों को संभालने के तरीके पर ध्यान केंद्रित कर दिया है।