खेती में ज्यादा खाद डालना अब सिर्फ फसल का मामला नहीं रहा… ये सीधे देश की अर्थव्यवस्था और विदेशी मुद्रा भंडार से जुड़ चुका है। इसीलिए अब प्रधानमंत्री Narendra Modi ने किसानों से रासायनिक उर्वरकों का इस्तेमाल कम करने की अपील की है। लेकिन बड़ा सवाल यही है...

खेती में ज्यादा खाद डालना अब सिर्फ फसल का मामला नहीं रहा… ये सीधे देश की अर्थव्यवस्था और विदेशी मुद्रा भंडार से जुड़ चुका है। इसीलिए अब प्रधानमंत्री Narendra Modi ने किसानों से रासायनिक उर्वरकों का इस्तेमाल कम करने की अपील की है। लेकिन बड़ा सवाल यही है जब ₹4000 की यूरिया सिर्फ ₹270 में मिलेगी, तो किसान आखिर क्यों रुकेगा? West Asia संकट के बीच सरकार की चिंता बढ़ गई है। तेल, गैस और उर्वरकों की सप्लाई पर असर पड़ने का डर है। ऐसे में भारत अब खेती को धीरे-धीरे केमिकल फर्टिलाइज़र से हटाकर बायो-फर्टिलाइज़र की तरफ ले जाना चाहता है। मगर जमीन पर हालात इतने आसान नहीं दिख रहे।
भारत में किसानों को मिलने वाली सबसे बड़ी राहत में से एक है Fertilizer Subsidy। लेकिन अब यही सब्सिडी सरकार के लिए सिरदर्द बनती जा रही है। इंडस्ट्री एक्सपर्ट्स के मुताबिक, एक बोरी यूरिया की असली कीमत करीब ₹4000 पड़ती है। लेकिन किसानों को वही 45 किलो की बोरी लगभग ₹270 में मिल रही है। जब कीमत इतनी कम होगी, तो स्वाभाविक है कि जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल बढ़ेगा। यही वजह है कि FY26 में भारत ने करीब 40 मिलियन टन यूरिया खपा दी, जो हाल के वर्षों में सबसे ज्यादा मानी जा रही है।
सरकार सिर्फ खेती की मिट्टी बचाने की बात नहीं कर रही। इसके पीछे बड़ा आर्थिक दबाव भी छिपा है। भारत हर साल भारी मात्रा में उर्वरक आयात करता है। West Asia में तनाव बढ़ने से सप्लाई और कीमत दोनों प्रभावित हो सकती हैं। ऐसे में अगर जरूरत से ज्यादा केमिकल फर्टिलाइज़र इस्तेमाल होता रहा, तो सरकार पर सब्सिडी का बोझ और बढ़ेगा। अनुमान है कि FY26 में फर्टिलाइज़र सब्सिडी करीब ₹2.17 लाख करोड़ तक पहुंच गई, जो बजट अनुमान से लगभग 30% ज्यादा है।
यानी सरकार जितना सोच रही थी, उससे कहीं ज्यादा पैसा सिर्फ खाद सस्ती रखने में जा रहा है।
कुछ स्टडीज़ ने सरकार की चिंता और बढ़ा दी है। रिपोर्ट्स के अनुसार पंजाब और हरियाणा जैसे राज्यों में कई जगहों पर फर्टिलाइज़र का इस्तेमाल तय मात्रा से लगभग 50% ज्यादा हो रहा है। वहीं उत्तर प्रदेश में भी खपत औसत से करीब 25% अधिक बताई जा रही है। गांवों में अक्सर किसान सोचते हैं कि “ज्यादा खाद मतलब ज्यादा पैदावार। लेकिन लगातार ज्यादा केमिकल डालने से मिट्टी की ताकत कमजोर होती जा रही है। जमीन की उर्वरता कम हो रही है और खेती की लागत भी धीरे-धीरे बढ़ती जा रही है।
अब सरकार खेती में बड़ा बदलाव लाना चाहती है। इसी सोच के तहत PM-PRANAM Scheme शुरू की गई, जिसका पूरा फोकस रासायनिक खाद का इस्तेमाल कम करना है। अगर कोई राज्य केमिकल फर्टिलाइज़र की खपत घटाता है, तो बची हुई सब्सिडी का हिस्सा उसे विकास कार्यों के लिए वापस दिया जाता है।
सरकार चाहती है कि राज्य खुद किसानों को जागरूक करें और जैविक या बायो-फर्टिलाइज़र को बढ़ावा दें। इसी के साथ “Dharti Mata Bachao Andolan Samitis” जैसी लोकल कमेटियां भी बनाई गई हैं ताकि गांव स्तर पर निगरानी और जागरूकता बढ़ सके।
यही सबसे बड़ा सवाल है। कई एक्सपर्ट्स मानते हैं कि जब तक यूरिया और DAP की कीमतें वास्तविक बाजार दर के करीब नहीं आएंगी, तब तक ज्यादा बदलाव मुश्किल है। क्योंकि किसान आखिर लागत देखकर ही फैसला लेता है। अगर ₹4000 की चीज ₹270 में मिलेगी, तो उसका जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल होना लगभग तय है। यानी सिर्फ भाषण, कैंपेन या अपील से काम नहीं चलेगा। सिस्टम में आर्थिक संतुलन भी जरूरी होगा।
पहले सिर्फ यूरिया ही पूरी तरह प्राइस कंट्रोल में था। लेकिन कोविड के बाद DAP पर भी अनौपचारिक प्राइस कैप लग गया। इससे Nutrient-Based Subsidy सिस्टम कमजोर पड़ने लगा। अब किसान सस्ती खाद की तरफ ज्यादा झुक रहे हैं, जबकि संतुलित पोषण वाली खेती पीछे छूटती जा रही है।
इसका असर आने वाले वर्षों में मिट्टी और उत्पादन दोनों पर पड़ सकता है।
आने वाले समय में सरकार Bio Fertilizer, Nano Urea और Organic Farming को ज्यादा तेजी से आगे बढ़ा सकती है। संभव है कि भविष्य में सब्सिडी मॉडल में भी कुछ बदलाव देखने को मिलें। लेकिन गांव की हकीकत यही है कि किसान तुरंत वही अपनाता है जो सस्ता और आसानी से उपलब्ध हो।
इसलिए बदलाव तभी सफल होगा जब सरकार जागरूकता के साथ-साथ व्यवहारिक विकल्प भी दे पाए।