देश में सबसे महत्वपूर्ण खेती के समय एक बड़े संकट का सामना कर रहा है। गैस की कमी और पैकेजिंग मैटेरियल की कमी ने यूरिया के उत्पादन और सप्लाई दोनों पर असर डालना शुरू कर दिया है। इस स्थिति में, फर्टिलाइजर एसोसिएशन ऑफ इंडिया (FAI) ने सरकार से तुरंत राहत की...

देश में सबसे महत्वपूर्ण खेती के समय एक बड़े संकट का सामना कर रहा है। गैस की कमी और पैकेजिंग मैटेरियल की कमी ने यूरिया के उत्पादन और सप्लाई दोनों पर असर डालना शुरू कर दिया है। इस स्थिति में, फर्टिलाइजर एसोसिएशन ऑफ इंडिया (FAI) ने सरकार से तुरंत राहत की मांग की है, ताकि किसानों तक कृषि के लिए समय पर यूरिया पहुंचे।
यूरिया बनाने के लिए गैस सबसे अहम कच्चा माल है। लेकिन मौजूदा अंतरराष्ट्रीय हालात की वजह से LNG गैस की सप्लाई प्रभावित हुई है। सरकार के नए नियमों के तहत, फर्टिलाइजर प्लांट्स को उनकी औसत गैस जरूरत का केवल 70% गैस मिल रही है। इस कमी का सीधा असर उत्पादन पर पड़ा है। कई बड़े यूरिया प्लांट अब अपनी पूरी क्षमता से काम नहीं कर पा रहे हैं।
Business Standard की खबर के अनुसार, FAI ने इस संकट के मद्देनजर सरकार को पत्र लिखा है और कई अहम मांगें रखी हैं। संगठन ने कहा कि मौजूदा स्थिति असाधारण है, इसलिए कंपनियों को वित्तीय मदद मिलनी चाहिए। FAI ने मांग की है कि प्लांट चलाने में बढ़े हुए ऊर्जा खर्च की भरपाई की जाए। इसके अलावा, गैस की कमी की वजह से लगाई गई फाइन माफ या रिफंड की जाए। संगठन ने यह भी कहा कि इस कठिन समय में कंपनियों की वास्तविक ऊर्जा खपत को ही मान्यता दी जाए, ताकि उन्हें नुकसान से बचाया जा सके।
अब गैस संकट के बीच एक नई समस्या भी सामने आई है। Urea Packaging में इस्तेमाल होने वाले प्लास्टिक ग्रेन्यूल्स जैसे पॉलीप्रोपलीन और हाई-डेन्सिटी पॉलीएथिलीन की सप्लाई भी घट गई है। इसका असर यह हुआ कि फैक्ट्रियों में बने यूरिया को समय पर पैक करना मुश्किल हो गया है। पोर्ट्स पर सप्लाई चेन भी प्रभावित हो रही है, जिससे डिलीवरी में देरी का डर बढ़ गया है।
खरीफ सीजन की बुवाई जून से शुरू होती है और इस समय यूरिया की मांग सबसे अधिक होती है। किसान इस समय धान, मक्का और अन्य फसलों में बड़ी मात्रा में यूरिया का इस्तेमाल करते हैं। अगर सप्लाई में कमी आई, तो किसानों को यूरिया की कमी और बढ़ी कीमत दोनों का सामना करना पड़ेगा। इससे खेती की लागत बढ़ेगी और उत्पादन पर भी असर पड़ सकता है।
किसी उद्योग से जुड़े लोग कहते हैं कि अगर गैस और पैकेजिंग दोनों की समस्या जल्द नहीं सुलझी, तो यूरिया की सप्लाई पूरी तरह प्रभावित हो सकती है। इसका असर सिर्फ किसानों पर नहीं, बल्कि पूरे कृषि क्षेत्र पर पड़ेगा। FAI ने सरकार से अपील की है कि वह स्थिति को गंभीरता से लें और तुरंत कदम उठाएं, ताकि सप्लाई चेन सुचारू रहे।
भारत में यूरिया और DAP की बड़ी मात्रा आयात पर निर्भर है। हाल के समय में समुद्री रास्तों जैसे रेड सी और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज़ में अस्थिरता की वजह से आयात बढ़ा, सिर्फ सात महीनों में 70% तक बढ़ा। यूरिया की कीमत 120% और DAP की कीमत 94% बढ़ गई, जिससे खेती महंगी हुई और किसानों पर बोझ बढ़ा।
समस्या सिर्फ यूरिया की कमी नहीं है, बल्कि उसका गलत इस्तेमाल भी है। भारत में किसानों द्वारा यूरिया का अनुपात सही नहीं रखा जा रहा। सही अनुपात 4:2:1 होना चाहिए, लेकिन वर्तमान में 10:9:4 है। इस वजह से मिट्टी की सेहत खराब हो रही है और फसल को पूरा लाभ नहीं मिल रहा है। यूरिया पानी के साथ बह जाता है या मिट्टी में बेकार हो जाता है। इसका नुकसान किसानों को और सरकार को दोनों को होता है।
इस समस्या का समाधान केवल ज्यादा यूरिया लाने में नहीं है, बल्कि सही तरीके से इस्तेमाल करना है। अब बायोफर्टिलाइजर्स और बायोस्टिमुलेंट्स का इस्तेमाल बढ़ रहा है। ये यूरिया के साथ मिलकर उसकी ताकत बढ़ाते हैं। सही इस्तेमाल से उत्पादन 10–15% तक बढ़ाया जा सकता है, जिससे आयात कम होगा और पैसा बचाया जा सकेगा।
एक नई तकनीक आई है, जिसे फर्टिलाइजर बायोएडिटिव्स कहते हैं। यह यूरिया का विकल्प नहीं है, लेकिन उसे अधिक प्रभावी बनाती है। यह पौधों को पोषण लेने में मदद करती है, मिट्टी में पोषक तत्वों के घुलने में सहायक होती है और यूरिया की हानि कम करती है। इससे फसल अच्छी होती है और मिट्टी स्वस्थ रहती है।
भारत में विज्ञान और प्राकृतिक संसाधन हैं, जिससे इस क्षेत्र में विकास हो सकता है। इसके लिए सरकार को जरूरी कदम उठाने होंगे:
आज की यूरिया समस्या हमें बड़ा सबक देती है। हमें सिर्फ आयात पर निर्भर नहीं रहना, बल्कि अपने संसाधनों का सही इस्तेमाल करना चाहिए। अगर भारत समय पर कदम उठाए, तो यह कृषि में नई तकनीकों में अग्रणी बन सकता है। इससे न सिर्फ किसानों को फायदा होगा, बल्कि देश की अर्थव्यवस्था और पर्यावरण भी मजबूत होंगे।