देश की सबसे बड़ी बीमा कंपनी LIC (लाइफ इंश्योरेंस कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया) के शेयर मंगलवार को दबाव में रहे। इसकी वजह केंद्र सरकार की ओर से कंपनी में 6.5% हिस्सेदारी बेचने (Offer for Sale - OFS) का ऐलान है। सरकार ने इस OFS के लिए 382 रुपये प्रति शेयर का फ्लोर प्राइस तय किया है, जो सोमवार के बंद भाव 424.35 रुपये से करीब 10% कम है।

देश की सबसे बड़ी बीमा कंपनी LIC (लाइफ इंश्योरेंस कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया) के शेयर मंगलवार को दबाव में रहे। इसकी वजह केंद्र सरकार की ओर से कंपनी में 6.5% हिस्सेदारी बेचने (Offer for Sale - OFS) का ऐलान है। सरकार ने इस OFS के लिए 382 रुपये प्रति शेयर का फ्लोर प्राइस तय किया है, जो सोमवार के बंद भाव 424.35 रुपये से करीब 10% कम है।
मंगलवार सुबह कारोबार के दौरान LIC का शेयर करीब 6.5% की गिरावट के साथ कारोबार करता दिखा। कंपनी का मार्केट कैप करीब 2.53 लाख करोड़ रुपये है।
अगर यह OFS पूरी तरह सफल रहता है तो सरकार 82.22 करोड़ शेयर, यानी 6.5% हिस्सेदारी बेचकर करीब 31,000 करोड़ रुपये जुटा सकती है।
इस ऑफर को दो हिस्सों में बांटा गया है—
संस्थागत निवेशकों के लिए OFS मंगलवार से खुल गया है, जबकि रिटेल निवेशक बुधवार को इसमें हिस्सा ले सकेंगे।
इस हिस्सेदारी बिक्री का उद्देश्य केवल राजस्व जुटाना नहीं है। फिलहाल सरकार के पास LIC में 96.5% हिस्सेदारी है। OFS पूरा होने के बाद यह घटकर करीब 90% रह जाएगी।
इससे LIC, SEBI के न्यूनतम सार्वजनिक शेयरधारिता (Minimum Public Shareholding - MPS) नियमों का पालन करने के और करीब पहुंच जाएगी। SEBI ने LIC को 10% सार्वजनिक हिस्सेदारी हासिल करने के लिए मई 2027 तक का समय दिया है।
DIPAM सचिव अरुणिश चावला ने कहा कि यह OFS सरकार को तय समय के भीतर MPS लक्ष्य हासिल करने में मदद करेगा।
OFS में सरकार एक फ्लोर प्राइस तय करती है, जो शेयर बेचने की न्यूनतम कीमत होती है। निवेशक इससे कम कीमत पर बोली नहीं लगा सकते।
हालांकि, अंतिम आवंटन मूल्य निवेशकों की मांग के आधार पर तय होता है। यह फ्लोर प्राइस के बराबर या उससे अधिक हो सकता है, लेकिन उससे कम नहीं।
रिटेल निवेशकों के पास कट-ऑफ प्राइस पर आवेदन करने का विकल्प भी होता है। इसका मतलब है कि उन्हें अलग से कीमत तय करने की जरूरत नहीं होती और वे अंतिम तय कीमत पर शेयर खरीदने के लिए सहमति दे सकते हैं।
LIC का यह OFS उसके मई 2022 में आए ऐतिहासिक IPO के बाद सबसे बड़ा हिस्सेदारी बिक्री कार्यक्रम है। उस समय सरकार ने 3.5% हिस्सेदारी बेचकर करीब 21,000 करोड़ रुपये जुटाए थे। IPO का प्राइस बैंड 902 से 949 रुपये प्रति शेयर था।
IPO के बाद से LIC के शेयर में उतार-चढ़ाव देखने को मिला है, क्योंकि निवेशक कंपनी की ग्रोथ, वैल्यूएशन और नियामकीय बदलावों पर नजर बनाए हुए हैं।
LIC का यह OFS सरकार की व्यापक विनिवेश (Disinvestment) रणनीति का हिस्सा है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, चालू वित्त वर्ष में सरकार सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों में हिस्सेदारी बेचकर और SUUTI से प्राप्तियों के जरिए 21,000 करोड़ रुपये से अधिक जुटा चुकी है।
यदि LIC का यह OFS पूरी तरह सब्सक्राइब हो जाता है, तो यह चालू वित्त वर्ष में सरकार के लिए सबसे बड़ा विनिवेश सौदा साबित हो सकता है।
अब निवेशकों की नजर इस बात पर रहेगी कि इस OFS को कितना अच्छा रिस्पॉन्स मिलता है और क्या LIC न्यूनतम सार्वजनिक हिस्सेदारी के लक्ष्य की ओर एक बड़ा कदम बढ़ा पाती है।
देश की सबसे बड़ी बीमा कंपनी LIC (लाइफ इंश्योरेंस कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया) के शेयर मंगलवार को दबाव में रहे। इसकी वजह केंद्र सरकार की ओर से कंपनी में 6.5% हिस्सेदारी बेचने (Offer for Sale - OFS) का ऐलान है। सरकार ने इस OFS के लिए 382 रुपये प्रति शेयर का फ्लोर प्राइस तय किया है, जो सोमवार के बंद भाव 424.35 रुपये से करीब 10% कम है।
मंगलवार सुबह कारोबार के दौरान LIC का शेयर करीब 6.5% की गिरावट के साथ कारोबार करता दिखा। कंपनी का मार्केट कैप करीब 2.53 लाख करोड़ रुपये है।
अगर यह OFS पूरी तरह सफल रहता है तो सरकार 82.22 करोड़ शेयर, यानी 6.5% हिस्सेदारी बेचकर करीब 31,000 करोड़ रुपये जुटा सकती है।
इस ऑफर को दो हिस्सों में बांटा गया है—
संस्थागत निवेशकों के लिए OFS मंगलवार से खुल गया है, जबकि रिटेल निवेशक बुधवार को इसमें हिस्सा ले सकेंगे।
इस हिस्सेदारी बिक्री का उद्देश्य केवल राजस्व जुटाना नहीं है। फिलहाल सरकार के पास LIC में 96.5% हिस्सेदारी है। OFS पूरा होने के बाद यह घटकर करीब 90% रह जाएगी।
इससे LIC, SEBI के न्यूनतम सार्वजनिक शेयरधारिता (Minimum Public Shareholding - MPS) नियमों का पालन करने के और करीब पहुंच जाएगी। SEBI ने LIC को 10% सार्वजनिक हिस्सेदारी हासिल करने के लिए मई 2027 तक का समय दिया है।
DIPAM सचिव अरुणिश चावला ने कहा कि यह OFS सरकार को तय समय के भीतर MPS लक्ष्य हासिल करने में मदद करेगा।
OFS में सरकार एक फ्लोर प्राइस तय करती है, जो शेयर बेचने की न्यूनतम कीमत होती है। निवेशक इससे कम कीमत पर बोली नहीं लगा सकते।
हालांकि, अंतिम आवंटन मूल्य निवेशकों की मांग के आधार पर तय होता है। यह फ्लोर प्राइस के बराबर या उससे अधिक हो सकता है, लेकिन उससे कम नहीं।
रिटेल निवेशकों के पास कट-ऑफ प्राइस पर आवेदन करने का विकल्प भी होता है। इसका मतलब है कि उन्हें अलग से कीमत तय करने की जरूरत नहीं होती और वे अंतिम तय कीमत पर शेयर खरीदने के लिए सहमति दे सकते हैं।
LIC का यह OFS उसके मई 2022 में आए ऐतिहासिक IPO के बाद सबसे बड़ा हिस्सेदारी बिक्री कार्यक्रम है। उस समय सरकार ने 3.5% हिस्सेदारी बेचकर करीब 21,000 करोड़ रुपये जुटाए थे। IPO का प्राइस बैंड 902 से 949 रुपये प्रति शेयर था।
IPO के बाद से LIC के शेयर में उतार-चढ़ाव देखने को मिला है, क्योंकि निवेशक कंपनी की ग्रोथ, वैल्यूएशन और नियामकीय बदलावों पर नजर बनाए हुए हैं।
LIC का यह OFS सरकार की व्यापक विनिवेश (Disinvestment) रणनीति का हिस्सा है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, चालू वित्त वर्ष में सरकार सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों में हिस्सेदारी बेचकर और SUUTI से प्राप्तियों के जरिए 21,000 करोड़ रुपये से अधिक जुटा चुकी है।
यदि LIC का यह OFS पूरी तरह सब्सक्राइब हो जाता है, तो यह चालू वित्त वर्ष में सरकार के लिए सबसे बड़ा विनिवेश सौदा साबित हो सकता है।
अब निवेशकों की नजर इस बात पर रहेगी कि इस OFS को कितना अच्छा रिस्पॉन्स मिलता है और क्या LIC न्यूनतम सार्वजनिक हिस्सेदारी के लक्ष्य की ओर एक बड़ा कदम बढ़ा पाती है।