भारत की महत्वाकांक्षी कोयला गैसीकरण योजना को पहले ही दौर में उद्योग जगत से बड़ा समर्थन मिला है। कोयला मंत्रालय के अनुसार, योजना के तहत पहले दौर में कुल सात आवेदन प्राप्त हुए हैं। इनमें अडानी एंटरप्राइजेज, NTPC लिमिटेड, Talcher Fertilisers, Gallantt Ispat और Shyam Sel & Power जैसी कंपनियां शामिल हैं।

भारत की महत्वाकांक्षी कोयला गैसीकरण योजना को पहले ही दौर में उद्योग जगत से बड़ा समर्थन मिला है। कोयला मंत्रालय के अनुसार, योजना के तहत पहले दौर में कुल सात आवेदन प्राप्त हुए हैं। इनमें अडानी एंटरप्राइजेज, NTPC लिमिटेड, Talcher Fertilisers, Gallantt Ispat और Shyam Sel & Power जैसी कंपनियां शामिल हैं।
सरकार ने इन आवेदनों को कोयला गैसीकरण मिशन के प्रति उद्योग के भरोसे का संकेत बताया है। यह प्रतिक्रिया ऐसे समय आई है जब इससे पहले मीडिया रिपोर्टों में योजना को लेकर कंपनियों की कम दिलचस्पी की आशंका जताई गई थी।
पहले दौर में मिले आवेदनों में सार्वजनिक और निजी क्षेत्र की कंपनियां शामिल हैं।
अडानी एंटरप्राइजेज ने तीन यूरिया परियोजनाओं के लिए आवेदन किया है। सरकारी कंपनी Talcher Fertilisers ने भी यूरिया परियोजना का प्रस्ताव दिया है।
वहीं NTPC लिमिटेड ने सिंथेटिक नेचुरल गैस यानी SNG परियोजना का प्रस्ताव रखा है।
Gallantt Ispat ने Direct Reduced Iron यानी DRI और Syngas उत्पादन से जुड़ी परियोजना के लिए आवेदन किया है। Shyam Sel & Power ने Syngas परियोजना का प्रस्ताव रखा है।
पहले दौर में चार परियोजनाओं का लक्ष्य यूरिया उत्पादन है, जिससे पता चलता है कि उर्वरक क्षेत्र कोयला गैसीकरण के संभावित उपयोगों में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
कोयला मंत्रालय के सलाहकार (प्रोजेक्ट्स) आलोक कुमार सिंह ने कहा कि पहले दौर में सात आवेदन मिलना योजना और भारत के कोयला गैसीकरण मिशन के प्रति उद्योग के भरोसे को दर्शाता है।
सरकार की यह प्रतिक्रिया उन रिपोर्टों के बाद आई है जिनमें योजना के लिए कंपनियों की ओर से पर्याप्त रुचि नहीं मिलने की बात कही गई थी।
मंत्रालय का कहना है कि अडानी और NTPC जैसी बड़ी कंपनियों की भागीदारी से यह संकेत मिलता है कि उद्योग अब कोयला गैसीकरण को केवल सरकारी नीति के रूप में नहीं, बल्कि एक गंभीर औद्योगिक निवेश अवसर के तौर पर भी देख रहा है।
कोयला गैसीकरण एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें कोयले को सीधे जलाने के बजाय उसे सिंथेटिक गैस या Syngas में बदला जाता है।
इस Syngas का इस्तेमाल आगे कई महत्वपूर्ण उत्पाद बनाने में किया जा सकता है। इनमें यूरिया, मेथनॉल, अमोनिया, हाइड्रोजन और सिंथेटिक नेचुरल गैस शामिल हैं।
भारत सरकार इस तकनीक के जरिए आयात पर निर्भरता कम करना चाहती है। कोयला मंत्रालय के अनुसार, LNG, यूरिया, अमोनिया और मेथनॉल के आयात पर भारत ने वित्त वर्ष 2024-25 में लगभग 2.77 लाख करोड़ रुपये खर्च किए थे।
पहले दौर के आवेदनों में अडानी एंटरप्राइजेज की भागीदारी खास तौर पर महत्वपूर्ण है।
कंपनी ने तीन यूरिया परियोजनाओं का प्रस्ताव दिया है। इसके अलावा Talcher Fertilisers ने एक यूरिया परियोजना के लिए आवेदन किया है।
इसका मतलब है कि पहले दौर में आए सात प्रस्तावों में से चार सीधे यूरिया उत्पादन से जुड़े हैं।
सरकार के लिए यह महत्वपूर्ण है क्योंकि घरेलू स्तर पर यूरिया उत्पादन बढ़ाने से उर्वरक आयात पर निर्भरता कम करने में मदद मिल सकती है।
NTPC ने इस योजना के तहत सिंथेटिक नेचुरल गैस परियोजना का प्रस्ताव रखा है।
SNG कोयले से तैयार Syngas को आगे प्रोसेस करके बनाया जा सकता है और इसका इस्तेमाल प्राकृतिक गैस के विकल्प के रूप में किया जा सकता है।
NTPC जैसी सरकारी कंपनी का इस योजना में शामिल होना भी सरकार के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि इससे सार्वजनिक क्षेत्र की भागीदारी बढ़ती है।
उद्योग विशेषज्ञों के मुताबिक, केवल आवेदन मिलना इस योजना की सफलता की गारंटी नहीं है।
Dastur Energy के सीईओ अतनु मुखर्जी के अनुसार, कोयला गैसीकरण परियोजनाएं काफी पूंजी-प्रधान होती हैं। इनकी सफलता के लिए भारतीय कोयले के अनुकूल तकनीक, सही परियोजना आकार, लंबे समय के लिए उत्पाद खरीदार यानी ऑफटेक, प्रतिस्पर्धी वित्तपोषण और प्रभावी कार्बन प्रबंधन जरूरी होंगे।
सरकारी प्रोत्साहन शुरुआती जोखिम को कम करने में मदद कर सकता है, लेकिन लंबे समय में परियोजनाओं को सब्सिडी पर स्थायी रूप से निर्भर हुए बिना टिकाऊ रिटर्न देना होगा।
केंद्र सरकार ने मई में इस योजना को मंजूरी दी थी। इसका उद्देश्य वर्ष 2030 तक 75 मिलियन टन कोयला गैसीकरण क्षमता विकसित करने में मदद करना है।
यह राष्ट्रीय स्तर पर वर्ष 2030 तक 100 मिलियन टन कोयला गैसीकरण क्षमता हासिल करने के बड़े लक्ष्य का हिस्सा है।
सरकार का अनुमान है कि इस योजना से करीब 2.5 लाख करोड़ से 3 लाख करोड़ रुपये का निवेश आकर्षित हो सकता है। साथ ही पूरी वैल्यू चेन में प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार के अवसर भी पैदा होने की उम्मीद है।
नई योजना से पहले भी सरकार ने कोयला गैसीकरण को बढ़ावा देने के लिए वित्तीय सहायता का प्रावधान किया था।
जनवरी 2024 में करीब 8,500 करोड़ रुपये की वित्तीय प्रोत्साहन योजना को मंजूरी दी गई थी। इसके तहत आठ कोयला गैसीकरण परियोजनाएं पहले से लागू की जा रही हैं।
नई योजना इसी प्रयास को बड़े स्तर पर आगे बढ़ाने का हिस्सा है।
पहले दौर में प्राप्त आवेदनों की अब योजना के दिशा-निर्देशों और Request for Proposal के तहत विस्तृत जांच की जाएगी।
इस बीच कोयला मंत्रालय ने 8 सितंबर 2026 को आवेदन का दूसरा दौर भी खोल दिया है।
मंत्रालय के अनुसार, योजना के तहत आवेदन की खिड़की हर दो महीने के अंतराल पर खोली जाएगी। इससे उन कंपनियों को भी आगे आवेदन करने का मौका मिलेगा जो अभी अपनी परियोजनाओं की तैयारी के अंतिम चरण में हैं।
भारत दुनिया के बड़े कोयला उत्पादक और उपभोक्ता देशों में शामिल है। ऐसे में सरकार चाहती है कि कोयले का इस्तेमाल केवल बिजली उत्पादन तक सीमित न रहे, बल्कि उससे रासायनिक और औद्योगिक उत्पाद भी बनाए जाएं।
कोयले को Syngas में बदलकर यूरिया, हाइड्रोजन, मेथनॉल और सिंथेटिक नेचुरल गैस जैसे उत्पाद तैयार किए जा सकते हैं।
इससे एक तरफ घरेलू कोयले का वैकल्पिक इस्तेमाल बढ़ सकता है, वहीं दूसरी तरफ कुछ महत्वपूर्ण आयातों पर निर्भरता कम करने में मदद मिल सकती है।
हालांकि, परियोजनाओं की वास्तविक सफलता उनकी लागत, तकनीक, वित्तीय व्यवहार्यता, उत्पाद की मांग और पर्यावरणीय प्रभावों को नियंत्रित करने की क्षमता पर निर्भर करेगी।
अडानी एंटरप्राइजेज और NTPC जैसी बड़ी कंपनियों के साथ कुल सात आवेदन मिलना भारत की कोयला गैसीकरण योजना के लिए शुरुआती तौर पर सकारात्मक संकेत है।
पहले दौर में यूरिया परियोजनाओं की बड़ी हिस्सेदारी यह भी दिखाती है कि कंपनियां कोयला गैसीकरण को उर्वरक उत्पादन से जोड़ने में रुचि रखती हैं।
अब अगली चुनौती इन प्रस्तावों को व्यावहारिक और आर्थिक रूप से टिकाऊ परियोजनाओं में बदलने की होगी। आने वाले दौर में और कंपनियों की भागीदारी यह तय करने में महत्वपूर्ण होगी कि भारत 2030 तक अपने बड़े कोयला गैसीकरण लक्ष्य के कितने करीब पहुंच पाता है।