भारत में पेट्रोल डीजल की कीमतों में इजाफा पिछले कुछ महीनों में आम नागरिकों की सबसे बड़ी परेशानी बन चुका है। दिल्ली में पेट्रोल इस समय ₹94.72 प्रति लीटर है, जबकि मुंबई में यह आंकड़ा ₹103.44 तक पहुंच गया है। डीजल की कीमतें भी ₹87 से ₹92 के बीच बनी हुई हैं। यह सिर्फ पंप पर चुकाई जाने वाली कीमत नहीं है इसका असर सब्जी से लेकर माल ढुलाई तक, हर चीज पर पड़ता है।
पेट्रोल डीजल की कीमतों में इजाफा क्यों हो रहा है?
इसका सबसे बड़ा कारण है अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की कीमत। भारत अपनी जरूरत का करीब 85% कच्चा तेल विदेश से आयात करता है। जब वैश्विक बाजार में ब्रेंट क्रूड की कीमत 80 डॉलर प्रति बैरल के ऊपर जाती है, तो घरेलू कीमतें भी ऊपर खिंचती हैं। 2024 के अंत और 2025 की शुरुआत में ओपेक+ देशों ने उत्पादन कटौती का फैसला किया। इससे वैश्विक आपूर्ति घटी। उसी दौरान डॉलर के मुकाबले रुपया कमजोर हुआ , फरवरी 2025 में ₹87.6 प्रति डॉलर तक। इन दोनों कारणों ने मिलकर तेल कंपनियों की लागत एकाएक बढ़ा दी।
असली खेल टैक्स का है, जिसे लोग अक्सर भूल जाते हैं
बहुत से लोगों को लगता है कि पेट्रोल सिर्फ कच्चे तेल की वजह से महंगा होता है, लेकिन सच्चाई इससे कहीं ज्यादा बड़ी है। भारत में पेट्रोल और डीजल की कीमत का बड़ा हिस्सा टैक्स होता है। केंद्र सरकार एक्साइज ड्यूटी लेती है, जबकि राज्य सरकारें अलग-अलग VAT वसूलती हैं। इसी कारण हर राज्य में कीमत अलग दिखाई देती है। दिलचस्प बात यह है कि कई बार तेल सस्ता होने के बावजूद पंप पर कीमत ज्यादा कम नहीं होती, क्योंकि टैक्स का बोझ बना रहता है। यही वजह है कि आम आदमी को राहत महसूस नहीं होती।
डीजल महंगा होते ही क्यों बढ़ जाती है हर चीज की कीमत?
भारत में ज्यादातर माल ढुलाई ट्रकों के जरिए होती है और उनमें डीजल का इस्तेमाल होता है। जब डीजल महंगा होता है, तो ट्रांसपोर्ट का खर्च बढ़ जाता है। फिर वही खर्च सब्जियों, फलों, राशन और बाकी सामान की कीमतों में जुड़ जाता है। किसान भी इससे बुरी तरह प्रभावित होते हैं क्योंकि ट्रैक्टर, सिंचाई पंप और खेती के कई उपकरण डीजल पर निर्भर हैं। यानी पेट्रोल डीजल की कीमत बढ़ना सिर्फ गाड़ी चलाने वालों की परेशानी नहीं, बल्कि पूरे बाजार की महंगाई से जुड़ा मामला है।
तेल कंपनियों का घाटा और कीमत संशोधन की प्रक्रिया

भारत में पेट्रोल-डीजल की कीमतें तकनीकी रूप से ‘डायनेमिक प्राइसिंग’ पर हैं। यानी हर रोज सुबह 6 बजे कीमतें बदल सकती हैं। लेकिन व्यवहार में ऐसा नहीं होता।इंडियन ऑयल, भारत पेट्रोलियम और हिंदुस्तान पेट्रोलियम ये तीनों सरकारी कंपनियां कीमत बढ़ाने से पहले सरकार की अनुमति का इंतजार करती हैं। इसका मतलब यह है कि जब अंतरराष्ट्रीय कीमतें तेजी से बढ़ती हैं, तो कंपनियां घाटे में काम करती रहती हैं। और जब संशोधन होता है, तो एकमुश्त बड़ी बढ़ोतरी दिखती है जो आम जनता को झटका लगती है।
आम जनता पर क्या पड़ता है असर?
डीजल सिर्फ ट्रकों का ईंधन नहीं है। देश में 70% माल परिवहन सड़क मार्ग से होता है और उसमें डीजल इंजन का दबदबा है। जब डीजल महंगा होता है, ट्रांसपोर्टेशन लागत बढ़ती है। यह लागत दुकानदार उठाता है और अंततः ग्राहक। अप्रैल 2025 में थोक महंगाई दर (WPI) में ईंधन का योगदान 2.3 प्रतिशत अंक रहा। खुदरा सब्जियों और फलों की कीमतों में भी 8-12% तक उछाल आया, जिसकी एक बड़ी वजह माल ढुलाई लागत थी। किसानों को भी नुकसान है। सिंचाई पंप और ट्रैक्टर का खर्च सीधे डीजल से जुड़ा है।
दूसरे देशों के मुकाबले भारत में तेल इतना महंगा क्यों है?
| देश | पेट्रोल (₹ प्रति लीटर) | टैक्स हिस्सा |
|---|---|---|
| भारत | ₹94–₹103 | ~55-60% |
| पाकिस्तान | ₹72 (अनुमानित) | ~30% |
| अमेरिका | ₹86 (मई 2025) | ~18% |
| नॉर्वे | ₹190+ | ~60% |
| सऊदी अरब | ₹25–₹30 | ~5% |
कई लोग सोशल मीडिया पर सऊदी अरब या अमेरिका की कीमतें देखकर हैरान हो जाते हैं। वहां पेट्रोल भारत के मुकाबले काफी सस्ता दिखता है। असल फर्क टैक्स और उत्पादन का है। सऊदी अरब खुद तेल उत्पादक देश है, इसलिए वहां कीमतें कम हैं। अमेरिका में टैक्स कम होने से लोगों पर बोझ कम पड़ता है। भारत में सरकारों की बड़ी कमाई ईंधन टैक्स से होती है। इसलिए कीमतें कम करना आर्थिक और राजनीतिक दोनों स्तरों पर आसान फैसला नहीं होता।
इलेक्ट्रिक वाहन भविष्य में क्या बदल सकते हैं?
- पेट्रोल-डीजल को GST के दायरे में लाना: अगर 28% GST स्लैब लागू हो, तो टैक्स एकरूप होगा और राज्यों का मनमाना वैट खत्म होगा। 15वें वित्त आयोग ने भी इसकी सिफारिश की थी।
- रणनीतिक तेल भंडार बढ़ाना: भारत के पास अभी 9.5 दिन का रिजर्व है। इसे 90 दिन तक ले जाने की जरूरत है, जैसा कि IEA के सदस्य देश करते हैं।
- इलेक्ट्रिक वाहनों को बढ़ावा: FAME-III योजना के तहत सब्सिडी बढ़ाना और चार्जिंग नेटवर्क को ग्रामीण इलाकों तक पहुंचाना।













