भोपाल के प्रतिष्ठित बरकतउल्लाह विश्वविद्यालय का नाम बदलने की प्रक्रिया एक महत्वपूर्ण चरण में पहुंच गई है। विश्वविद्यालय की कार्य परिषद (Executive Council) ने विश्वविद्यालय का नाम बदलकर ‘वाग्देवी भोजपाल विश्वविद्यालय’ करने के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है। अब यह प्रस्ताव अंतिम स्वीकृति के लिए राज्य सरकार और राज्यपाल के पास भेजा गया है।

यदि सभी आवश्यक मंजूरियां मिल जाती हैं, तो मध्य प्रदेश के सबसे प्रमुख उच्च शिक्षण संस्थानों में से एक नई पहचान के साथ आगे बढ़ेगा।

क्यों बदला जा रहा है विश्वविद्यालय का नाम?

विश्वविद्यालय प्रशासन के अनुसार, प्रस्ताव का उद्देश्य क्षेत्र की ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और बौद्धिक विरासत को सम्मान देना है। अधिकारियों का कहना है कि ‘भोजपाल’ शब्द भोपाल के प्राचीन इतिहास और महान परमार शासक राजा भोज से जुड़ा हुआ है, जबकि ‘वाग्देवी’ ज्ञान और विद्या की देवी मां सरस्वती का प्रतीक है।

प्रस्ताव में राजा भोज के साहित्य, शिक्षा, वास्तुकला और ज्ञान परंपरा में योगदान का भी उल्लेख किया गया है।

बरकतउल्लाह विश्वविद्यालय

कौन थे मौलाना बरकतउल्लाह?

विश्वविद्यालय का वर्तमान नाम स्वतंत्रता संग्राम सेनानी मौलाना बरकतउल्लाह भोपाली के सम्मान में रखा गया था। उनका जन्म 1854 में भोपाल में हुआ था और वे भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के प्रमुख क्रांतिकारियों में गिने जाते हैं।

मौलाना बरकतउल्लाह ने विदेशों में रहकर ब्रिटिश शासन के खिलाफ आंदोलन चलाया। वर्ष 1915 में अफगानिस्तान के काबुल में स्थापित भारत की पहली निर्वासित अस्थायी सरकार में उन्हें प्रधानमंत्री बनाया गया था। वे गदर आंदोलन से भी जुड़े रहे और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की आजादी की आवाज उठाते रहे।

बरकतउल्लाह विश्वविद्यालय

1970 से 2026 तक: विश्वविद्यालय के नाम की कहानी

इस विश्वविद्यालय की स्थापना वर्ष 1970 में भोपाल विश्वविद्यालय के रूप में हुई थी। बाद में 1988 में स्वतंत्रता संग्राम में मौलाना बरकतउल्लाह के योगदान को सम्मान देने के लिए इसका नाम बदलकर बरकतउल्लाह विश्वविद्यालय कर दिया गया।

अब लगभग 38 साल बाद एक बार फिर विश्वविद्यालय के नाम में बदलाव का प्रस्ताव सामने आया है।

बरकतउल्लाह विश्वविद्यालय

नाम परिवर्तन पर शुरू हुई बहस

जहां कुछ लोग इस कदम को भोपाल और राजा भोज की ऐतिहासिक विरासत को सम्मान देने वाला निर्णय बता रहे हैं, वहीं विरोध करने वाले इसे स्वतंत्रता सेनानी मौलाना बरकतउल्लाह की विरासत को कमजोर करने वाला कदम मान रहे हैं।

कार्य परिषद की सदस्य डॉ. ताहिरा अब्बासी ने प्रस्ताव का विरोध करते हुए कहा कि यदि नए नाम की आवश्यकता है तो उसके लिए अलग विश्वविद्यालय स्थापित किया जाना चाहिए, जबकि मौजूदा नाम को बरकरार रखा जाना चाहिए।

दूसरी ओर, भाजपा नेताओं का कहना है कि यह कदम क्षेत्र की संस्कृति और ऐतिहासिक पहचान को सम्मान देने के लिए उठाया गया है। वहीं कांग्रेस नेताओं ने सवाल उठाया है कि विश्वविद्यालय में खाली पदों और शैक्षणिक चुनौतियों जैसे मुद्दों पर अधिक ध्यान दिया जाना चाहिए।

बरकतउल्लाह विश्वविद्यालय

आगे क्या होगा?

विश्वविद्यालय का नाम बदलने के लिए केवल कार्य परिषद की मंजूरी पर्याप्त नहीं है। इसके लिए राज्य सरकार को संबंधित कानून में संशोधन करना होगा। विधानसभा में संशोधन विधेयक पारित होने और राज्यपाल की मंजूरी मिलने के बाद ही नया नाम कानूनी रूप से लागू हो सकेगा।

इसके बाद विश्वविद्यालय की वेबसाइट, डिग्रियां, प्रमाणपत्र, रिकॉर्ड और अन्य आधिकारिक दस्तावेजों में नया नाम दर्ज किया जाएगा।

बरकतउल्लाह विश्वविद्यालय का संभावित नाम परिवर्तन केवल एक प्रशासनिक फैसला नहीं, बल्कि इतिहास, संस्कृति और पहचान से जुड़ा मुद्दा बन गया है। अब सबकी नजर राज्य सरकार और राजभवन के अगले कदम पर टिकी है। यदि मंजूरी मिलती है, तो भोपाल का यह ऐतिहासिक विश्वविद्यालय एक नए नाम और नई पहचान के साथ आगे बढ़ेगा।

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