मध्य प्रदेश में महामारी से आम आदमी लड़ाई में किसी तरह का बदलाव नहीं हुआ है। कुछ हफ्ते पहले जहां आम आदमी कोरोना के इलाज में काम आने वाली रेमडिसिविर के लिए लड़ रहा था। वहीं अब यह लड़ाई म्यूकरमाइकोसिस (Mucormycosis) या ब्लैक फंगस (Black_Fungus) के इलाज में काम आने वाली दवा एंफोटेरिसिन बी लाइपोसोमोल (Amphotericin_B_Liposomal) के लिए हो रही है। 

कुछ दिनों से सोशल मीडिया पर एक ऐसा ही वीडियो जबरदस्त तरीके से वायरल हो रहा है। इस वीडियो में ब्लैक फंगस से पीड़ित एक मरीज के परिजन इसके इंजेक्शन के लिए एक अधिकारी के सामने रोते हुए दिख रहे हैं। हालांकि इस दौरान अधिकारी उस व्यक्ति की किसी भी तरह से मदद नहीं कर सकते हैं।

ये वीडियो भोपाल के सबसे बड़े सरकारी अस्पताल हमीदिया का बताया जा रहा है, हालांकि StackUmbrella इस वीडियो की पुष्टि नहीं करता है।

एक मरीज को 75 इंजेक्शन की तक की आवश्यकता : 
इस वीडियो के सामने आने के बाद लोगों में निराशा का भाव है। दरअसल कोरोना के इलाज में काम आने वाली रेमडिसिविर के केवल 5 डोज की ही आवश्यकता होती है, जबकि ब्लैक फंगस की ड्रग एंफोटेरिसिन बी लाइपोसोमोल के 75 से 100 डोज एक मरीज को दिए जा रहे हैं। ऐसे में इस ड्रग की कमी किसी मरीज की जान भी ले सकती है। क्योंकि ब्लैक फंगस कोरोना की तुलना में ज्यादा जाने ले रहा है।

समय पर इंजेक्शन उपलब्ध करवाने के सरकार के दावे फैल : 
हमें अपनी पड़ताल में पता चला कि एंफोटेरिसिन बी लाइपोसोमोल को समय पर उपलब्ध करवाने के सरकार के सभी दावे फैल साबित हो रहे हैं। रविवार को एम्स में एडमिट एक पेशेंट के परिजन दिनभर हमीदिया और एम्स के बीच इंजेक्शन के लिए चक्कर काटते रहे। हालांकि रात तक उन्हें इंजेक्शन नहीं मिल सके थे। उन्हें इलाज के लिए 10 डोज की जरूरत थी। 

वहीं कोरोना को मात देकर अभी स्वस्थ हुए डॉ. बलराम धाकड़ ने भी बातचीत में हमें बताया कि सरकार भले ही इस ड्रग की समय पर उपलब्धता के दावे करे, लेकिन सच्चाई यह है कि इस ड्रग को समय पर हासिल करना रेमडिसिविर से ज्यादा मुश्किल है।

यह भी पढ़ें : रेमडिसिविर के बाद ब्लैक फंगस की दवा का टोटा, कालाबाजारी रोकने प्रदेश सरकार की सख्ती शुरू