जेंटल पेरेंटिंग की समस्या: सोशल मीडिया पर आजकल कई नए-नए टर्म सुनने को मिल रहे हैं। उनमें से एक है जेंटल पेरेंटिंग, जेंटल पेरेंटिंग बच्चों को पालने का एक तरीका है जिसमें माता-पिता अपना तनाव और दबाव बच्चों पर नहीं निकालते। बल्कि प्यार से बच्चों को जिम्मेदार बंना की कोशिश करते हैं। आजकल सोशल मीडिया, पेरेंटिंग ब्लॉग्स और एक्सपर्ट्स के बीच में यह शब्द बहुत लोकप्रिय हो चुका है। कई लोग तो इस शब्द का इस्तेमाल कर आदर्श परिवार बनने की होड़ में भी जुड़ चुके हैं। लेकिन कुछ लोग इसे बच्चों को ज्यादा छूट देने वाला तरीका कहकर खारिज कर रहे हैं। अब सवाल यह उठता है कि क्या जेंटल पेरेंटिंग सच में सही है या सिर्फ एक ट्रेंड है?
क्या है जेंटल पेरेंटिंग
जेंटल पेरेंटिंग असल में परवरिश का एक साधारण सा फार्मूला है जिसमें बच्चों को सम्मान, संवाद और भावनात्मक जुड़ाव के साथ पाला जाता है। इसमें माता-पिता को बच्चों को मारने, डांटने, चिल्लाने, सजा देने से रोका जाता है। यहां हर काम के पीछे बच्चे की भावना समझने पर जोर दिया जाता है। जेंटल पेरेंटिंग मुख्य रूप से चार स्तंभों पर टिकी होती है
- बच्चों को एक इंसान की तरह देखना ना कि उन्हें कंट्रोल करना
- बच्चों की भावनाओं को समझने की कोशिश करना
- बच्चों के व्यवहार के पीछे का कारण जानना
- और प्यार के साथ स्पष्ट नियम बनाना
क्या जेंटल पेरेंटिंग सच में फायदेमंद है?
सोशल मीडिया पर चलने वाले ट्रेंड को देखते हुए और पेरेंटिंग ब्लॉग को देखते हुए यही लगता है कि जेंटल पेरेंटिंग सच में बहुत फायदेमंद है।
- क्योंकि जेंटल पेरेंटिंग बच्चों को भावनात्मक रूप से मजबूत बनाती है। उन्हें एक्सप्रेस करने का मौका देती है।
- इस प्रकार की परवरिश में बच्चे संवाद करना जानते हैं। झूठ बोलने और डरने की बजाय बच्चे माता-पिता से खुलकर बात करते हैं।
- ऐसे बच्चों में आत्मविश्वास बढ़ जाता है और वह खुद को गलत नहीं मानते। बल्कि अपनी गलती से सीखते हैं।
- जेंटल पेरेंटिंग से बच्चों के मन में डर नहीं आता, तनाव नहीं आता बल्कि समझ पैदा होती है।
जेंटल पेरेंटिंग को लेकर सबसे बड़ी गलतफहमियां
- जेंटल पेरेंटिंग को लेकर सबसे बड़ी गलतफहमी यह है कि इसमें डिसिप्लिन नहीं होता, बल्कि असल में जेंटल पेरेंटिंग का आधार ही डिसिप्लिन है।
- कई अभिभावकों का मानना है कि इस प्रकार की पेरेंटिंग से बच्चे जिद्दी हो जाते हैं बल्कि इस केस में बच्चे जिद करते ही नहीं वह शेयर करना सीख जाते हैं।
- एक और मान्यता भारत के परिवारों में देखी जा रही है कि जेंटल पेरेंटिंग भारत में काम नहीं करता असल में भारत में जेंटल पेरेंटिंग की कॉन्सेप्ट तो सदियों से रही है जहां बच्चों को बोलने और वाद विवाद में हिस्सा लेने का अधिकार दिया जाता था।
जेंटल पेरेंटिंग में आने वाली समस्याएं और उनके निदान
जेंटल पेरेंटिंग को परवरिश का सबसे सही तरीका बताया जा रहा है। इसमें बच्चों की भावनाओं को समझने की बात कही जाती है। उन्हें बिना डांट और मार के अनुशासन सीखाने की कोशिश की जाती है। परंतु इस पूरी प्रक्रिया में कुछ गंभीर समस्याओं का सामना भी करना पड़ रहा है जैसे की,
सीमाओं की कमी होना: जेंटल पेरेंटिंग की सबसे बड़ी कमी है सीमाओं का स्पष्ट न होना, माता-पिता बच्चों से नर्म पेश आने के चक्कर में केवल बच्चों की भावना को ही प्राथमिकता देते हैं। इस चक्कर में वह उनके व्यवहार को सुधारना भूल जाते हैं। जिसका नतीजा यह होता है कि बच्चा समझ ही नहीं पता कि रुकना कहां है? यह बच्चों को सुरक्षा नहीं बल्कि भ्रम देता है।
माता-पिता में थकावट: जेंटल पेरेंटिंग में माता-पिता यह नहीं समझ पाते कि केवल बच्चों के पॉइंट ऑफ व्यू को ही नहीं सुनना है। कई बार माता-पिता शांत समझदार और नियंत्रित होने की पूरी कोशिश करते हैं लेकिन हर व्यक्ति की एक सीमा होती है। ऐसे में लगातार खुद को शांत बनाए रखने के चक्कर में माता-पिता मेंटली एग्जास्ट हो जाते हैं जो की साइकोलॉजी के अनुसार माता-पिता के लिए गलत है।
अनुशासन की कमी: जेंटल पेरेंटिंग के चक्कर में माता-पिता बच्चों को अनुशासन सीखाना भूल जाते हैं। वे समझते हैं कि बच्चों को हर बात समझाने से बच्चा समझ जाएगा। लेकिन उसे उदाहरण देकर नहीं समझाते। प्रत्येक इंसान की साइकोलॉजी है कि गलती से ही व्यक्ति सीखता है ऐसे में जेंटल पेरेंटिंग में भी उदाहरण देकर ठोस परिणाम बताने चाहिए।
उम्र के अनुसार पेरेंटिंग के प्रकार में बदलाव: जेंटल पेरेंटिंग का अर्थ यह नहीं होता कि सभी बच्चों पर एक जैसा स्ट्रक्चर अपनाया जाए। कुछ बच्चों के स्वभाव के अनुसार इसके स्ट्रक्चर में बदलाव लाना पड़ता है। खासकर ऐसे बच्चे जिन्हें बिहेवियर इशू या स्पेशल नीड्स है उनके साथ जेंटल बातचीत काफी नहीं होती।
माता-पिता का खुद इमोशनल हील न होना: कई बार ऐसे माता-पिता जिन्हें बचपन में खुद ही मार और दंड झेलनी पड़ी हो वह काफी एग्रेसिव हो जाते हैंम इसीलिए ऐसे माता-पिता के लिए जेंटल पेरेंटिंग स्ट्रक्चर अपनाना काफी कठिन हो जाता है। इसीलिए जरूरी है की माता-पिता पहले खुद के साथ व्यवहार बदलें और फिर बच्चों के साथ जेंटल बने।
जेंटल पेरेंटिंग की सोच गलत नहीं है, परंतु इसे लागू करने के नियम अलग-अलग होने चाहिए। जेंटल पेरेंटिंग कोई फैशन नहीं है एक जागरूक परवरिश है। जहां बच्चों को आपका प्रोजेक्ट नहीं बनाया जाता बल्कि बच्चों को उनका मत रखना, उन्हें उनकी समझ से काम करने की छूट दी जाती है। जेंटल पेरेंटिंग में भरपूर सब्र की आवश्यकता होती है। इसलिए जेंटल पेरेंटिंग वे माता-पिता ही अपना पाते हैं जो खुद इमोशनली हील हैं, संवेदनशील है और मानसिक रूप से स्वस्थ हैं।
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