गेहूं भारत की सबसे ज़रूरी मुख्य फ़सलों में से एक है, जो देश की खाद्य सुरक्षा में बहुत बड़ा योगदान देती है। 30 मिलियन हेक्टेयर से ज़्यादा ज़मीन पर खेती के साथ, भारत दुनिया में गेहूं का दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक है। किसानों के लिए, गेहूं सिर्फ़ एक फ़सल नहीं है, बल्कि स्थिर इनकम का एक ज़रिया है, खासकर पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और राजस्थान जैसे राज्यों में।
ज़्यादा से ज़्यादा पैदावार और अच्छी क्वालिटी पाने के लिए, गेहूं की खेती में सबसे अच्छे तरीकों को अपनाना ज़रूरी है। आइए, ज़्यादा प्रोडक्टिविटी हासिल करने के मुख्य तरीकों के बारे में जानें।
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गेहूं की खेती के लिए जलवायु और मिट्टी
- जलवायु: गेहूं ठंडी, सूखी सर्दियों में अच्छी तरह उगता है और बोते समय 15–20°C और दाना भरते समय 20–25°C तापमान की ज़रूरत होती है। पकने के समय ज़्यादा गर्मी से दाने की क्वालिटी खराब हो जाती है।

- मिट्टी: अच्छी जल निकासी वाली दोमट और चिकनी-दोमट मिट्टी जिसका pH 6.0–7.5 हो, सबसे अच्छी होती है। रेतीली मिट्टी में ज़्यादा ऑर्गेनिक पदार्थ की ज़रूरत होती है, जबकि क्षारीय मिट्टी का इलाज जिप्सम से करना चाहिए।
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सही बीज का चुनाव क्यों जरूरी है?
सही किस्म चुनने से बेहतर पैदावार और बीमारियों से लड़ने की क्षमता मिलती है।
- लोकप्रिय किस्में: HD 2967, HD 3086, PBW 550, DBW 187 (उत्तर भारत के लिए), GW 322 (गुजरात के लिए), MP 1203 (मध्य प्रदेश क्षेत्र के लिए)।
- बीज की मात्रा: सिंचित क्षेत्रों के लिए 100–125 kg/ha; वर्षा आधारित क्षेत्रों के लिए 125–150 kg/ha।
- बीज उपचार: बीज से होने वाली बीमारियों को रोकने के लिए बीजों को कार्बेन्डाजिम (2 g/kg) या ट्राइकोडर्मा (बायो-ट्रीटमेंट) से उपचारित करें।
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खेत की तैयारी कैसे करें

- खेत को 2-3 बार जोतकर मिट्टी को बारीक कर लें।
- मिट्टी को उपजाऊ बनाने के लिए प्रति हेक्टेयर 5-10 टन गोबर की खाद या कम्पोस्ट डालें।
- एक जैसी सिंचाई के लिए खेत को अच्छी तरह से समतल करें।
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गेहूं में खाद और उर्वरक प्रबंधन
- संतुलित पोषण ज़्यादा पैदावार के लिए ज़रूरी है।
- सुझाई गई मात्रा (प्रति हेक्टेयर):
- नाइट्रोजन (N): 120–150 kg
- फॉस्फोरस (P₂O₅): 60 kg
- पोटेशियम (K₂O): 40 kg
- आवेदन:
- बेसल: बुवाई के समय 50% N + पूरा P + पूरा K
- टॉप ड्रेसिंग: बचा हुआ 50% N दो बार में (पहला क्राउन रूट बनने के स्टेज पर ~20 DAS, दूसरा बूटिंग स्टेज पर ~45 DAS)
- सूक्ष्म पोषक तत्व: जिंक की कमी वाली मिट्टी में जिंक सल्फेट (25 kg/ha) डालें।
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गेहूं की सिंचाई का सही शेड्यूल
गेहूं को अपने जीवन चक्र के दौरान 5-6 बार सिंचाई की ज़रूरत होती है।
महत्वपूर्ण चरण:
- क्राउन रूट इनिशिएशन (20-25 DAS) – सबसे महत्वपूर्ण
- टिलरिंग स्टेज
- जॉइंटिंग स्टेज
- फूल आने का स्टेज
- दाना भरने का स्टेज

CRI और दाना भरने के समय पानी की कमी से बचें, क्योंकि इससे पैदावार बहुत कम हो सकती है।
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गेहूं की फसल में खरपतवार नियंत्रण
- खरपतवार नियंत्रण:
- मुख्य खरपतवार: फेलारिस माइनर, चेनोपोडियम एल्बम, एवेना लुडोविशियाना।
- बुवाई से पहले इस्तेमाल होने वाली हर्बिसाइड: पेंडिमेथालिन (1 kg a.i./ha)।
- बुवाई के बाद: 30-35 DAS पर क्लोडिनाफॉप या सल्फोसल्फ्यूरॉन।
- कीट/रोग नियंत्रण:
- रतुआ (पील, भूरा, काला): प्रतिरोधी किस्मों का उपयोग करें और ज़रूरत पड़ने पर प्रोपिकोनाज़ोल स्प्रे करें।
- दीमक: दीमक वाले क्षेत्रों में बुवाई के समय क्लोरपाइरीफॉस 20 EC डालें।
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कटाई और भंडारण का सही तरीका

- गेहूं तब कटाई के लिए तैयार होता है जब दाने सख्त और सुनहरे-पीले हो जाते हैं (नमी ~20%)।
- कटाई के लिए कंबाइन हार्वेस्टर या हंसिया का इस्तेमाल करें।
- फफूंदी के हमले से बचाने के लिए भंडारण से पहले दानों को 10-12% नमी तक सुखा लें।
- साफ, सूखे गोदाम में नमी-रोधी बोरियों में स्टोर करें।
कैसे बढ़ाएं गेहूं की फसल और मुनाफ़ा
सही समय पर बुवाई: उत्तरी भारत में सबसे अच्छा समय 10 नवंबर से 25 नवंबर है।
ज़ीरो टिलेज: समय, नमी बचाता है, और मिट्टी की सेहत सुधारता है।
इंटीग्रेटेड न्यूट्रिएंट मैनेजमेंट (INM): ऑर्गेनिक खाद, बायोफर्टिलाइज़र और केमिकल फर्टिलाइज़र को मिलाएं।
इंटीग्रेटेड पेस्ट मैनेजमेंट (IPM): जैविक, सांस्कृतिक और रासायनिक तरीकों का मिश्रण इस्तेमाल करें।
नई टेक्नोलॉजी अपनाएं: ज़्यादा पैदावार देने वाली, बीमारी प्रतिरोधी किस्में और सटीक सिंचाई सिस्टम का इस्तेमाल करें।
भारत में गेहूं की खेती में बहुत ज़्यादा संभावना है, लेकिन ज़्यादा पैदावार पाने के लिए किसानों को वैज्ञानिक तरीके, बेहतर किस्में, संतुलित पोषण और सही समय पर फसल का मैनेजमेंट अपनाना होगा। सही तरीके से गेहूं के किसान न सिर्फ़ पैदावार बढ़ा सकते हैं, बल्कि अनाज की क्वालिटी और मुनाफ़ा भी बढ़ा सकते हैं।
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