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बक्सवाहा जंगल बचाओ अभियान : निजी स्वार्थ और पद की लालसा में कहीं दम न तोड़ दे राष्ट्रीय स्तर का आंदोलन 

Dhananjay by Dhananjay
November 25, 2022
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मप्र के छतरपुर से निकलकर अचानक की अंतर्राष्ट्रीय पटल पर छा चुका बक्सवाहा का मुद्दा कुछ लोगों के निजी स्वार्थ और पद की लालसा में अपने उद्देश्य से भटकता हुआ दिखाई दे रहा है। पिछले एक सप्ताह से अलग-अलग अभियानों में फूट डलती हुई दिखाई दे रही है। इन अभियानों को शुरू करने वाले लोगों को ही इन अभियानों से अलग करने की तैयारी कर ली गई है। जिसके कारण भविष्य में इन अभियानों के अस्तित्व पर ही प्रश्न चिन्ह लग रहा है।

हालांकि देशभर में लाखों लोग सोशल मीडिया के माध्यम से बक्सवाहा के जंगलों के कटने का लगातार विरोध कर रहे हैं, लेकिन जंगल को बचाने के लिए कुछ लोगों के द्वारा बड़े अभियान चलाए जा रहे हैं। इन अभियानों में कुछ महीने पहले जुड़े लोग ही निजी लालसा और पद की चाह में ही भटकाने का प्रयास कर रहे हैं। 

1. नाम के आगे लिख दिया अध्यक्ष : 
भाेपाल के समाजसेवी और पर्यावरण को बचाने के लिए कई मंचों पर अपनी मुहिम चला चुके शरद सिंह कुमरे ने अप्रैल के अंतिम सप्ताह में बक्सवाहा जंगल बचाओ आंदोलन की नींव रखी। इस दौरान तय हुआ कि आंदोलन में सहभागिता कर रहे किसी भी व्यक्ति को न कोई पद दिया जाएगा और न ही किसी को संरक्षक बनाया जाएगा। सब आपस में एक रहते हुए इस जंगल को बचाने के लिए काम करेंगे।

लेकिन कुछ दिन पहले इस आंदोलन से जुड़े एक व्यक्ति ने अपने नाम के आगे अध्यक्ष लिखना शुरू किया। इस बात को लेकर कई लोगों ने कुमरे के समक्ष आपत्ति दर्ज कराई, जिसके बाद कुमरे ने उन्हें अध्यक्ष का पद हटाने को कहा। लेकिन इस बात को लेकर बहुत खींचतान हुई। बड़ी मुश्किल से उस व्यक्ति को बक्सवाहा जंगल बचाओ आंदोलन से अलग किया गया।

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2. आंदोलन प्रमुख को बताए बिना अन्य को बनाया संरक्षक : 
सालों से पीपल नीम तुलसी अभियान चला रहे पटना के पर्यावरणविद और समाज सेवी डॉ. धर्मेंद्र कुमार ने 3 मई को जंगल बचाओ अभियान को शुरू किया था। इस अभियान में पूरे भारत से कई बड़ी संस्थाएं जुड़ीं। जिनमें से लगभग 60 संस्थाएं पिछले कई सालों से जंगलों को बचाने का काम कर रही हैं। इस दौरान कुमरे के आंदोलन से अलग होकर एक महिला डॉ. कुमार के अभियान में शामिल हो गईं।

ये महिला पिछले काफी समय से एक संत को इस अभियान का संरक्षक बनाने का प्रयास कर रही थीं। जिसका डॉ. कुमार ने विरोध किया। तो कुछ दिन पहले वह अभियान के दो पुरुष सदस्यों के साथ मिलकर अकेले ही उन संत से मिलने उनके आश्रम पहुंच गई और उन्हें अभियान का प्रमुख बना दिया। हालांकि इस दौरान डॉ. कुमार ने तीनों व्यक्तियों को अपने अभियान से पूरी तरह अलग कर दिया।

जिसका उल्लेख वे सोशल मीडिया पर अपनी कई पोस्ट में कर चुके हैं। उसके बाद भी अभियान से अलग हुए तीनों लोग संत को भ्रम में रखकर उन्हें अभियान का संरक्षक बता रहे हैं। जबकि वास्तविकता में डॉ. कुमार तीनों को ही अपने आंदोलन से अलग कर चुके हैं। 

महत्वाकांक्षी लोग अभियान को हथियाना चाह रहे : 
कुछ लोग इस आंदोलन को भटकाने का प्रयास कर रहे हैं। उन लोगों के साथ कोई भी संस्था नहीं जुड़ी है। यदि जुड़ी है, तो उन्हें सहमति पत्र दिखाना चाहिए। ये लोग महत्वकांक्षी लोग हैं। इन तीनों में से कोई भी व्यक्ति जमीनी स्तर का व्यक्ति नहीं है। ये लाेग जबरदस्ती अभियान पर अपना आधिपत्य जमाना चाहते हैं। अभियान में अभी कुछ काम ही नहीं हुआ और ये लोग पता नहीं किस बात का सम्मान समारोह आयोजित कर रहे हैं।
– डॉ. धर्मेंद्र कुमार, पर्यावरणविद, पटना

गलत लोगों पर नजर रखें वास्तविक पर्यावरणप्रेमी : 
इस तरह के आंदोलन जब भी होते हैं तो कुछ लोग सरकार के समर्थन में होते हैं, जबकि कुछ लोग मुद्दों के समर्थन में होते हैं। साथ ही कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो अपनी कीमत तय कराने के लिए कुछ करते हैं। बक्सवाहा के मुद्दे में भी ऐसे लोग हैं। लेकिन अब समय आ गया है कि पर्यावरण के मुद्दे पर काम करने वाले लोग मिलकर काम करें और ऐसे लोगों पर अपनी नजर रखें। मीडिया को भी ऐसे लोगों को तवज्जो नहीं देना चाहिए। असल में यह लड़ाई राष्ट्र के लिए, पर्यावरण के लिए और भावी पीड़ी के लिए है। इसलिए इनमें बहुत ही पवित्र भावना से काम करना चाहिए।
– शरद सिंह कुमरे, समाजसेवी, भोपाल

कुछ लोग अपनी प्लानिंग पूरे अभियान पर थोप रहे : 
इस अभियान में कुछ लोग पद और नाम की लालसा में काम कर रहे हैं। ये लोग बिना किसी से सलाह मशविरा लिए अपने स्तर पर प्लानिंग कर रहे हैं। इस अभियान से जुड़ीं 170 समितियों से किसी तरह की सहमति नहीं ली गई। बल्कि ये अपनी प्लानिंग हमारे अभियान पर थोपने का प्रयास कर रहे हैं। जिन संत का उल्लेख किया जा रहा है। वे बक्सवाहा और नर्मदा बचाने के लिए अपने स्तर पर प्रयास कर रहे हैं। ऐसे में अपने आंदोलन को बीच में छोड़ समितियों को बिना बताए संत को आंदोलन का संरक्षक बनाया जाना समझ से परे है।
– आनंद पटेल, पर्यावरणविद, भोपाल

यह भी पढ़ें : बक्सवाहा जंगल बचाओ अभियान : ऑक्सीजन को तरस रहे देश में सवा दो लाख पेड़ काटे जाने की तैयारी

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