ईरान युद्ध शुरू हुए ढाई महीने से ज़्यादा समय बीत चुका है, और इसके खत्म होने के कोई संकेत नहीं दिख रहे हैं। नतीजतन, दुनिया भर में तेल और गैस की सप्लाई बुरी तरह से प्रभावित हुई है। कच्चे तेल की कीमतें $100 प्रति बैरल के निशान को पार कर गई हैं, और युद्ध शुरू होने के बाद से इनमें लगभग 50% की बढ़ोतरी दर्ज की गई है। इसे दुनिया के अब तक के सबसे बड़े ऊर्जा संकटों में से एक माना जा रहा है।
भारत जैसे देश—जो अपनी कच्चे तेल की ज़रूरतों का लगभग 90% और गैस की ज़रूरतों का 50% आयात करते हैं—इस संकट से सीधे तौर पर प्रभावित हो रहे हैं। इस स्थिति के दुष्परिणाम भारतीय अर्थव्यवस्था में साफ तौर पर दिखने भी लगे हैं।
ईरान युद्ध रुपया रिकॉर्ड निचले स्तर पर; चालू खाता घाटा बढ़ा

ईरान युद्ध के चलते, भारतीय रुपया लगातार कमज़ोर होता जा रहा है। इस साल अब तक, रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 6.5% से ज़्यादा गिर चुका है, और पिछले एक साल में इसमें 11% से ज़्यादा की गिरावट देखी गई है। रुपया अब डॉलर के मुकाबले 96 के निशान को पार कर चुका है; अगर मौजूदा हालात ऐसे ही बने रहे, तो यह 100 के मनोवैज्ञानिक स्तर को भी तोड़ सकता है।
तेल की बढ़ती कीमतों के कारण, भारत का चालू खाता घाटा (CAD) तेज़ी से बढ़ रहा है। पिछले वित्त वर्ष में यह GDP का 0.8% था, लेकिन इस साल इसके 2% से ज़्यादा होने का अनुमान है। इसके अलावा, संघर्ष शुरू होने के बाद से विदेशी निवेशकों ने भारत से लगभग $20 अरब निकाल लिए हैं, जिससे रुपये पर और भी ज़्यादा दबाव पड़ रहा है।
आयात बिल में भारी बढ़ोतरी
पिछले वित्त वर्ष के दौरान, भारत का कुल आयात $775 अरब था, जिसमें से लगभग 31% हिस्सा सिर्फ़ चार चीज़ों का था: कच्चा तेल, सोना, वनस्पति तेल और उर्वरक।
- कच्चा तेल: $134.7 अरब
- सोना: $72 अरब
- वनस्पति तेल: $19.5 अरब
- उर्वरक: $14.5 अरब
सोने और उर्वरकों के आयात में क्रमशः 24% और 77% की बढ़ोतरी देखी गई। इस बढ़ोतरी का देश के विदेशी मुद्रा भंडार और उसके कुल आयात बिल, दोनों पर बुरा असर पड़ा है।
सरकारी कदम और PM मोदी की अपील

हालात को संभालने के लिए सरकार ने कई अहम फैसले लिए हैं। सोने और चांदी पर इंपोर्ट ड्यूटी 6% से बढ़ाकर 15% कर दी गई है। इसके अलावा, पेट्रोल और डीजल की कीमतें ₹3 प्रति लीटर से ज़्यादा बढ़ा दी गई हैं।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नागरिकों से अपील की है कि वे एक साल तक सोना न खरीदें, पेट्रोल, डीजल और खाने के तेल का इस्तेमाल कम करें, केमिकल फर्टिलाइजर का इस्तेमाल सीमित करें और विदेश यात्रा से बचें। इसका मकसद विदेशी मुद्रा बचाना और रुपये पर दबाव कम करना है।
क्या विदेशी मुद्रा बचाना ही एकमात्र उपाय है?
अनुमान है कि 2026 में भारतीय विदेश यात्रा पर लगभग $23.4 बिलियन खर्च करेंगे। अगर इस खर्च में कटौती की जाए, तो देश काफी विदेशी मुद्रा बचा सकता है। इससे चालू खाता घाटा (Current Account Deficit) कम करने में मदद मिलेगी और संभवतः रुपये को स्थिरता मिलेगी।
हालांकि, जानकारों का मानना है कि पश्चिम एशिया में शांति बहाल होने के बाद भी, तेल की सप्लाई को सामान्य होने में कुछ समय लगेगा। ऐसे हालात में, भारत को ऊर्जा बचाने, इंपोर्ट पर कंट्रोल करने और घरेलू उत्पादन बढ़ाने को प्राथमिकता देनी चाहिए।
ईरान से जुड़े संघर्ष ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि ऊर्जा के मामले में आत्मनिर्भरता अब भारत के लिए सिर्फ एक विकल्प नहीं रह गई है, बल्कि यह एक परम आवश्यकता बन गई है।
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