पाकिस्तान के लिए एक नई आर्थिक और कूटनीतिक मुश्किल खड़ी होती दिख रही है। खाड़ी का अहम साझेदार यूएई अब इस्लामाबाद पर सीधा दबाव बना रहा है और मामला सिर्फ पैसों का नहीं, बल्कि लाखों पाकिस्तानी मजदूरों के भविष्य से भी जुड़ गया है। UAE ने Pakistan से $3.5 Bi...

पाकिस्तान के लिए एक नई आर्थिक और कूटनीतिक मुश्किल खड़ी होती दिख रही है। खाड़ी का अहम साझेदार यूएई अब इस्लामाबाद पर सीधा दबाव बना रहा है और मामला सिर्फ पैसों का नहीं, बल्कि लाखों पाकिस्तानी मजदूरों के भविष्य से भी जुड़ गया है।
ताज़ा रिपोर्ट्स के मुताबिक, यूएई ने पाकिस्तान से साफ तौर पर कह दिया है कि वह तुरंत 3.5 बिलियन डॉलर का कर्ज वापस करे। इस मांग के बाद इस्लामाबाद ने भी जल्दी भुगतान की तैयारी शुरू कर दी है। पाकिस्तान के एक वरिष्ठ अधिकारी ने साफ कहा कि “राष्ट्रीय सम्मान” किसी भी हालत में समझौता नहीं किया जा सकता, भले ही इससे विदेशी मुद्रा भंडार पर अतिरिक्त दबाव क्यों न पड़े। यानी एक तरफ देश की इकोनॉमी पहले से ही दबाव में है, और दूसरी तरफ इतनी बड़ी रकम लौटाना पाकिस्तान के लिए आसान नहीं होगा। फिर भी सरकार इस फैसले को प्रतिष्ठा से जोड़कर देख रही है।
इस पूरे विवाद के बीच एक और बड़ा झटका पाकिस्तान को तब लगा, जब यूएई ने इस्लामाबाद इंटरनेशनल एयरपोर्ट के संचालन से जुड़ी बातचीत से खुद को अलग कर लिया।
यह डील अगस्त 2025 से चर्चा में थी और इससे पाकिस्तान को बड़ी आर्थिक उम्मीदें थीं। लेकिन आखिरकार यूएई को कोई मजबूत लोकल पार्टनर नहीं मिला, जिसके चलते यह योजना आगे नहीं बढ़ सकी।
दिलचस्प बात यह भी है कि यह घटनाक्रम उस समय सामने आया, जब यूएई के वरिष्ठ नेता शेख नहयान बिन मुबारक अल नहयान की नई दिल्ली की छोटी लेकिन अहम यात्रा हुई थी। इससे क्षेत्रीय समीकरणों को लेकर भी कई सवाल उठने लगे हैं।
इसी बीच पाकिस्तान ने सऊदी अरब के साथ अपने रिश्तों को और मजबूत किया है। सितंबर 2025 में दोनों देशों के बीच एक रक्षा समझौता हुआ, जिसमें एक देश पर हमला दूसरे पर हमला माना जाएगा। ऐसे में यूएई और पाकिस्तान के बीच बढ़ती दूरी को क्षेत्रीय राजनीति के नजरिए से भी देखा जा रहा है।
सबसे बड़ी चिंता अब उन लाखों पाकिस्तानी कामगारों को लेकर है, जो खाड़ी देशों खासतौर पर यूएई और सऊदी अरब में काम करते हैं। करीब 55 लाख से ज्यादा पाकिस्तानी इस क्षेत्र में काम कर रहे हैं, जिनमें बड़ी संख्या में असंगठित और कम स्किल वाले मजदूर शामिल हैं। ये लोग जो पैसा अपने देश भेजते हैं, वही पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था की रीढ़ माना जाता है।
एक्सपर्ट्स के मुताबिक, ये रेमिटेंस पाकिस्तान की GDP का करीब 3 से 5 प्रतिशत हिस्सा बनाते हैं। अगर यूएई के साथ रिश्ते और बिगड़ते हैं, तो इसका असर सीधे इन कामगारों पर पड़ सकता है चाहे वो नौकरी की सुरक्षा हो या वीज़ा पॉलिसी।
फिलहाल पाकिस्तान एक मुश्किल संतुलन बनाने की कोशिश में है एक तरफ आर्थिक दबाव, दूसरी तरफ अंतरराष्ट्रीय रिश्तों की साख।
यूएई के साथ यह तनाव अगर लंबा खिंचता है, तो इसका असर सिर्फ दोनों देशों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पूरे दक्षिण एशिया की अर्थव्यवस्था और लाखों परिवारों की रोजी-रोटी पर भी पड़ सकता है।
कुल मिलाकर, यह मामला सिर्फ 3.5 बिलियन डॉलर का नहीं है यह पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था, विदेश नीति और आम लोगों के भविष्य से जुड़ा एक बड़ा सवाल बन चुका है।
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