CSEAM और बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र को नोटिस जारी किया है। कोर्ट ने बच्चों के लिए “firewalls” को जरूरी बताया और 4 हफ्ते में जवाब मांगा।

बच्चों को सोशल मीडिया और दूसरे डिजिटल प्लेटफॉर्म पर मौजूद ऑनलाइन खतरों से बचाने को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने अहम कदम उठाया है। Child Sexual Exploitation and Abuse Material (CSEAM) से जुड़े मामले की सुनवाई के दौरान जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने टिप्पणी की कि “बच्चों के लिए firewalls बहुत जरूरी हैं।”
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में केंद्र सरकार को नोटिस जारी करते हुए चार हफ्ते के भीतर जवाब मांगा है। याचिका में सवाल उठाया गया है कि जब भारतीय कानून 18 साल से कम उम्र के व्यक्ति को बच्चा/नाबालिग मानता है, तो डिजिटल प्लेटफॉर्म 13 साल की उम्र से बच्चों को स्वतंत्र रूप से अकाउंट बनाने की अनुमति कैसे दे सकते हैं।
यह याचिका NGO Just Rights for Children Alliance की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता एच. एस. फूलका के माध्यम से दायर की गई है।
याचिका में कहा गया है कि बच्चों की डिजिटल प्लेटफॉर्म तक स्वतंत्र पहुंच उन्हें कई तरह के ऑनलाइन जोखिमों के सामने ला सकती है। इनमें online grooming, sexual exploitation, trafficking, behavioural profiling, personal data का misuse, cyberbullying और age-inappropriate content प्रमुख हैं।
याचिकाकर्ता का तर्क है कि बच्चों की सुरक्षा के लिए केवल सामान्य terms and conditions पर्याप्त नहीं हैं। डिजिटल वातावरण में बच्चों की कानूनी स्थिति को प्रभावी तरीके से लागू करने के लिए एक uniform और practically enforceable mechanism की आवश्यकता है।
याचिका में सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म की उम्र संबंधी नीतियों का भी उल्लेख किया गया है।
याचिका के अनुसार, Facebook और Snapchat के भारतीय प्लेटफॉर्म 13 साल की उम्र से यूजर अकाउंट बनाने की अनुमति देते हैं, जबकि भारत में 18 वर्ष से कम उम्र के व्यक्ति को नाबालिग माना जाता है।
याचिका इसी अंतर को लेकर सवाल उठाती है कि क्या 18 वर्ष से कम उम्र के बच्चों को डिजिटल प्लेटफॉर्म के साथ स्वतंत्र रूप से contractual relationship में प्रवेश करने की अनुमति होनी चाहिए।
याचिका में सुप्रीम कोर्ट से Information Technology (Intermediary Guidelines and Digital Media Ethics Code) Rules, 2021 में संशोधन करने या अलग से specific guidelines तैयार करने का निर्देश देने की मांग की गई है।
याचिका की प्रमुख मांगों में यह सुनिश्चित करना शामिल है कि:
याचिका में बच्चों की digital access से जुड़े कई संभावित खतरों पर चिंता जताई गई है।
Online grooming में अपराधी या शोषण करने वाला व्यक्ति डिजिटल माध्यम से बच्चे का विश्वास जीतने और धीरे-धीरे उसका शोषण करने की कोशिश कर सकता है।
इसके अलावा बच्चों के सामने sexual exploitation, trafficking, cyberbullying और inappropriate content का खतरा भी रहता है।
याचिका ने behavioural profiling और personal data के misuse को भी गंभीर चिंता का विषय बताया है। डिजिटल प्लेटफॉर्म पर बच्चों की गतिविधियों से जुड़ा डेटा उनकी privacy और सुरक्षा पर असर डाल सकता है।
यह मामला भारतीय संविधान के Article 32 के तहत public interest में दायर किया गया है।
याचिका का उद्देश्य 18 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के लिए संविधान द्वारा सुनिश्चित fundamental rights के प्रभावी संरक्षण की मांग करना है।
याचिकाकर्ता का कहना है कि बच्चों को डिजिटल दुनिया में मिलने वाली स्वतंत्र access और उनके लिए मौजूद statutory protections के बीच जो gap है, उसे दूर करने की जरूरत है।
मामला केवल age verification तक सीमित नहीं है। इसमें social media intermediaries की mandatory reporting और due diligence obligations का भी मुद्दा शामिल है।
याचिका में digital platforms द्वारा Information Technology Act और Protection of Children from Sexual Offences (POCSO) Act के तहत लागू होने वाली जिम्मेदारियों के अनुपालन पर भी सवाल उठाए गए हैं।
इसका सीधा संबंध इस बात से है कि platforms बच्चों के sexual exploitation से जुड़ी सामग्री या गतिविधियों का पता चलने पर कितनी तेजी और प्रभावी तरीके से कार्रवाई करते हैं।
बच्चों से जुड़ी sexual abuse सामग्री को लेकर Meta के platforms भी पहले जांच और आलोचना के दायरे में रहे हैं।
Meta Facebook और Instagram जैसे platforms का संचालन करता है। याचिका में उठाए गए broader concerns के बीच social media platforms पर harmful content की monitoring और removal की जिम्मेदारी भी महत्वपूर्ण हो जाती है।
हाल में Washington-based Tech Transparency Project (TTP) ने दावा किया कि उसे Facebook और Instagram पर CSAM से संबंधित 332 advertisements मिले। रिपोर्ट के मुताबिक इनमें से बड़ी संख्या में advertisements अगस्त 2026 में दिखाई दिए।
इन दावों के बाद भारत में भी बच्चों से संबंधित harmful content और उसके promotion को लेकर regulatory scrutiny बढ़ी है।
CSAM से जुड़े content और advertisements को लेकर सरकार की ओर से भी सख्त रुख अपनाया गया है।
सरकार ने Meta को ऐसे ads और content को हटाने का निर्देश दिया है जो CSAM को promote करते हैं। वहीं National Commission for Protection of Child Rights (NCPCR) ने भी मामले की विस्तृत जांच शुरू करने की दिशा में कदम उठाया है।
इससे यह संकेत मिलता है कि बच्चों की online safety अब केवल social media moderation का मुद्दा नहीं रह गया है, बल्कि यह child protection, privacy, law enforcement और platform accountability से जुड़ा व्यापक regulatory issue बन चुका है।
सुनवाई के दौरान जस्टिस जॉयमाल्या बागची की यह टिप्पणी कि “firewalls are very necessary for children” डिजिटल प्लेटफॉर्म पर बच्चों के लिए preventive safeguards की आवश्यकता को रेखांकित करती है।
यह केवल harmful content को हटाने का सवाल नहीं है। असली चुनौती यह है कि बच्चों को ऐसे content, users और online interactions तक पहुंचने से पहले ही किस तरह सुरक्षित किया जाए जो उनके लिए जोखिम पैदा कर सकते हैं।
यही वजह है कि याचिका में parental या lawful guardian involvement, verification और risk-based safeguards की मांग की गई है।
सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल केंद्र सरकार को नोटिस जारी कर चार सप्ताह में जवाब मांगा है।
आगे की सुनवाई में यह स्पष्ट हो सकता है कि मौजूदा IT Rules और अन्य कानूनी प्रावधान बच्चों की digital safety के लिए पर्याप्त हैं या उनमें अतिरिक्त safeguards की जरूरत है।
यदि अदालत इस दिशा में कोई व्यापक guideline जारी करती है, तो इसका असर social media platforms और दूसरे digital services पर बच्चों के account creation, parental verification, age assurance और content safety mechanisms पर पड़ सकता है।
बच्चों की digital दुनिया में बढ़ती मौजूदगी के साथ उनकी online safety एक गंभीर कानूनी और सामाजिक चुनौती बन चुकी है। CSEAM, online grooming, cyberbullying, privacy violations और age-inappropriate content जैसे जोखिमों के बीच यह मामला इस मूल सवाल को सामने लाता है कि डिजिटल प्लेटफॉर्म पर बच्चों की सुरक्षा की जिम्मेदारी किस तरह तय की जाए।
सुप्रीम कोर्ट का केंद्र से जवाब मांगना इस दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। अब नजर इस बात पर रहेगी कि सरकार मौजूदा कानूनों और IT Rules के तहत बच्चों की सुरक्षा को मजबूत करने के लिए क्या framework पेश करती है।