पूर्वी भारत से आई एक अहम रिसर्च बताती है कि छोटे पारिवारिक खेतों पर अपनाई गई एग्रोफॉरेस्ट्री (Agroforestry) न सिर्फ जलवायु परिवर्तन से लड़ने में कारगर है, बल्कि किसानों की आमदनी और आजीविका को भी मजबूत करती है। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के वैज्ञानिकों द्वारा किए गए नौ साल लंबे अध्ययन में सामने आया है कि सिर्फ एक एकड़ का एग्रोफॉरेस्ट्री फार्म बड़ी मात्रा में कार्बन सोख सकता है, वो भी बिना खाद्य उत्पादन को नुकसान पहुंचाए।
एक एकड़ खेत, बड़ा असर

अध्ययन के मुताबिक, एग्रोफॉरेस्ट्री अपनाने वाले एक एकड़ खेत ने नौ साल में 154.5 मेगाग्राम (Mg) कार्बन डाइऑक्साइड को अवशोषित किया। खास बात यह रही कि इस दौरान किसानों की खेती जारी रही और उन्हें अच्छी आमदनी भी हुई।
साल 2015 में, ICAR के इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ सॉइल एंड वाटर कंज़र्वेशन (देहरादून और कोरापुट) के वैज्ञानिकों ने ओडिशा के ईस्टर्न घाट्स क्षेत्र में 15 किसानों के साथ मिलकर यह मॉडल शुरू किया था। इसमें किसानों के मौजूदा खेतों में पेड़ों को फसलों के साथ जोड़ा गया।
जलवायु संकट से जूझता ईस्टर्न घाट्स क्षेत्र
ईस्टर्न घाट्स इलाका लगातार बदलते मौसम के दबाव में है। अनियमित मानसून, अचानक तेज बारिश और बढ़ती फसल खराबी ने यहां खेती को जोखिम भरा बना दिया है। इसका सबसे ज्यादा असर आदिवासी समुदायों पर पड़ा है, जहां खाद्य असुरक्षा और आजीविका का संकट गहराता जा रहा है।
ऐसे हालात में वैज्ञानिकों का मानना है कि पेड़, फसल और पशुपालन को जोड़ने वाला ‘इको-विलेज’ आधारित एग्रोफॉरेस्ट्री मॉडल टिकाऊ समाधान बनकर उभर रहा है। यह मॉडल पोषण, आमदनी और पर्यावरण—तीनों को एक साथ संभालता है।
ढलान की स्थिति तय करती है कार्बन क्षमता
इस अध्ययन में वैज्ञानिकों ने ओडिशा की जलवायु के अनुकूल 12 स्थानीय पेड़ प्रजातियों को चुना। इन्हें रायगढ़ा जिले के मलिगांव, डुरुखाल और दंडाबाद गांवों में लगाया गया और वर्षों तक उनकी वृद्धि, बायोमास और कार्बन स्टोरेज पर नजर रखी गई।
रिसर्च में साफ सामने आया कि खेत की ढलान (Slope Position) कार्बन स्टोरेज में अहम भूमिका निभाती है। निचले ढलान वाले खेतों में नमी और पोषक तत्व ज्यादा टिकते हैं, जिससे पेड़ों की ग्रोथ बेहतर होती है।
निचले ढलानों पर एक एकड़ में औसतन 82 पेड़ पाए गए, जिनकी ऊंचाई करीब 4.27 मीटर और फैलाव 4.5 मीटर था। यहां कार्बन अवशोषण 73.1 Mg CO₂ प्रति एकड़ दर्ज किया गया। वहीं, ऊपरी ढलानों पर मिट्टी कटाव और पानी की कमी के कारण यह आंकड़ा घटकर 27.2 Mg CO₂ प्रति एकड़ रह गया।
पेड़ का चुनाव, किसान की कमाई तय करता है

यह मॉडल सिर्फ पर्यावरण के लिए नहीं, बल्कि किसानों की जेब के लिए भी फायदेमंद साबित हुआ। 12 प्रजातियों में से काजू और आम सबसे ज्यादा लाभ देने वाले पेड़ बने। ये पेड़ कार्बन स्टोरेज के साथ-साथ अच्छी आमदनी भी देते हैं।
तीनों गांवों के किसानों ने अपने एकीकृत खेतों से सालाना 1.10 लाख से 1.13 लाख रुपये तक की कमाई की। आम की पैदावार डुरुखाल में 26.4 क्विंटल और मलिगांव में 26.2 क्विंटल प्रति किसान तक पहुंची। काजू की पैदावार भी सभी गांवों में स्थिर रही।
सबसे अहम बात यह रही कि पेड़ लगाने से धान, मोटा अनाज, दालें और सब्जियों की पैदावार पर कोई खास असर नहीं पड़ा।
कार्बन क्रेडिट से अतिरिक्त कमाई की संभावना

स्टडी में कार्बन क्रेडिट की संभावनाओं का भी आकलन किया गया। मौजूदा स्वैच्छिक बाजार दरों के हिसाब से, अगर 20 डॉलर प्रति Mg CO₂ की दर मानी जाए, तो नौ साल में एक एकड़ खेत से करीब 2.56 लाख रुपये के कार्बन क्रेडिट मिल सकते हैं।
हालांकि वैज्ञानिकों ने यह भी साफ किया कि यह कमाई बाजार की मांग, वेरिफिकेशन खर्च और रजिस्ट्रेशन प्रक्रिया पर निर्भर करेगी। इसके अलावा, इन खेतों से नौ साल में 112.4 Mg ऑक्सीजन भी उत्सर्जित हुई, जो पर्यावरण के लिए अतिरिक्त लाभ है।
भारत के जलवायु लक्ष्यों से जुड़ता मॉडल
यह रिसर्च भारत की पेरिस समझौते के तहत की गई जलवायु प्रतिबद्धताओं से भी मेल खाती है, जहां देश ने 2.5 से 3 अरब टन कार्बन अवशोषण का लक्ष्य रखा है। वैज्ञानिकों का मानना है कि अगर ऐसे छोटे किसानों वाले एग्रोफॉरेस्ट्री मॉडल को बड़े स्तर पर अपनाया जाए, तो यह लक्ष्य हासिल करने में बड़ी भूमिका निभा सकता है।
छोटा खेत, बड़ा समाधान
यह अध्ययन साफ दिखाता है कि एग्रोफॉरेस्ट्री छोटे किसानों के लिए एक मजबूत, टिकाऊ और फायदेमंद रास्ता है। यह न सिर्फ जलवायु परिवर्तन से लड़ने में मदद करता है, बल्कि किसानों की आय, खाद्य सुरक्षा और भविष्य की स्थिरता भी सुनिश्चित करता है। आने वाले समय में अगर नीति स्तर पर ऐसे मॉडल को समर्थन मिला, तो ग्रामीण भारत के लिए यह एक गेम-चेंजर साबित हो सकता है।
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