मकर संक्रांति पर्व: हिंदू धर्म में सूर्य उपासना और प्रकृति के साथ तालमेल का प्रतीक मकर संक्रांति पर्व अब आने वाले कई दशकों तक एक ही तारीख पर मनाया जाएगा। ज्योतिषीय गणनाओं के अनुसार वर्ष 2026 से लेकर 2080 तक मकर संक्रांति 15 जनवरी को ही मनाई जाएगी। यह बदलाव सूर्य की गति और उसके राशि परिवर्तन के सूक्ष्म अंतर के कारण हो रहा है।
इस वर्ष 14 जनवरी की रात 9:39 बजे सूर्य धनु राशि से निकलकर मकर राशि में प्रवेश करेंगे। यही क्षण मकर संक्रांति कहलाता है। चूंकि संक्रांति का पुण्यकाल 16 घंटे तक माना गया है, इसलिए इसका धार्मिक महत्व अगले दिन यानी 15 जनवरी को सूर्योदय के बाद दोपहर तक रहेगा। इसी कारण धार्मिक अनुष्ठान, दान-पुण्य और स्नान आदि 15 जनवरी को किए जाएंगे।
मकर संक्रांति पर्व सूर्य की चाल से तय होती है

ज्योतिषविद् आचार्य दैवज्ञ कृष्ण शास्त्री बताते हैं कि सूर्य हर वर्ष अपनी राशि परिवर्तन की गति में लगभग 20 मिनट की देरी करता है। यही छोटा-सा अंतर वर्षों में बड़ा बदलाव लेकर आता है। तीन वर्षों में यह अंतर लगभग एक घंटे का हो जाता है, जबकि 72 वर्षों में पूरे 24 घंटे यानी एक दिन का अंतर बन जाता है।
यही कारण है कि मकर संक्रांति पर्व की तिथि समय-समय पर आगे खिसकती रहती है। वर्तमान में जो बदलाव चल रहा है, उसकी शुरुआत वर्ष 2008 से मानी जाती है और यह सिलसिला 2080 तक जारी रहेगा। इसके बाद मकर संक्रांति 16 जनवरी को मनाई जाने लगेगी।
मकर संक्रांति पर्व का तारीख इतिहास में समय-समय पर बदलती रही है
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1936 से 2007 तक यह पर्व 14 जनवरी को मनाया जाता रहा।
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वहीं 1792 से 1863 तक यह पर्व 12 जनवरी को मनाया जाता था।
- इससे पहले 1864 से 1936 तक मकर संक्रांति 13 जनवरी को पड़ती थी।
मकर संक्रांति पर्व की धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व

तारीख में बदलाव के बावजूद मकर संक्रांति पर्व का धार्मिक, सामाजिक और सांस्कृतिक महत्व पहले की तरह ही बना रहेगा। यह पर्व सूर्य के उत्तरायण होने का प्रतीक है, जिसे शुभ समय की शुरुआत माना जाता है। इसी दिन से दिन बड़े और रातें छोटी होने लगती हैं।
देशभर में यह पर्व अलग-अलग नामों और परंपराओं के साथ मनाया जाता है। उत्तर भारत में इसे खिचड़ी, गुजरात और राजस्थान में उत्तरायण, तमिलनाडु में पोंगल, असम में भोगाली बिहू और पंजाब में लोहड़ी के रूप में मनाया जाता है। दान, स्नान, तिल-गुड़ का सेवन और पतंगबाजी इस पर्व की खास पहचान हैं।
आने वाली पीढ़ियों के लिए एक तय कैलेंडर होगा
ज्योतिषाचार्यों के अनुसार अगले 54 वर्षों तक तारीख स्थिर रहने से धार्मिक कैलेंडर और पर्व-त्योहारों की योजना बनाना आसान रहेगा। हालांकि इसके बाद फिर से बदलाव आएगा, जो कि खगोलीय नियमों के अनुसार पूरी तरह स्वाभाविक है।
मकर संक्रांति की तारीख भले बदले, लेकिन इसका संदेश , प्रकृति से जुड़ाव, सकारात्मकता और नए आरंभ हमेशा एक जैसा रहेगा।
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