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पीरियड लीव पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: कहा- अनिवार्य छुट्टी से महिलाओं की नौकरी पर पड़ सकता है असर

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पीरियड लीव पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: कहा- अनिवार्य छुट्टी से महिलाओं की नौकरी पर पड़ सकता है असर

Menstrual Leave पर सुप्रीम कोर्ट की बड़ी टिप्पणी, कहा- कानून बना तो महिलाओं की भर्ती घट सकती है

Raj Chouhan Rb by Raj Chouhan Rb
March 13, 2026
in Health
पीरियड लीव महिलाओं के अधिकार और सुप्रीम कोर्ट के फैसले
362
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देशभर में महिलाओं के लिए हर महीने पीरियड लीव (Menstrual Leave) को अनिवार्य करने की मांग को लेकर दायर याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाया है। कोर्ट ने साफ कहा कि अगर इसे कानून बनाकर अनिवार्य कर दिया गया तो इसका उल्टा असर महिलाओं की नौकरी और करियर पर पड़ सकता है।

दरअसल सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका (PIL) दायर की गई थी जिसमें मांग की गई थी कि देश के सभी कार्यस्थलों और शैक्षणिक संस्थानों में महिलाओं को मासिक धर्म के दौरान छुट्टी दी जाए। लेकिन अदालत ने इस मांग को स्वीकार करने से इनकार कर दिया और कहा कि यह सरकार की नीति का विषय है।

सुप्रीम कोर्ट ने क्यों जताई चिंता ?

Supreme Court ruling on period leave

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इस मामले की सुनवाई भारत के मुख्य न्यायाधीश सीजेआई सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की बेंच कर रही थी। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने कहा कि अगर हर महीने पीरियड लीव को कानून बनाकर अनिवार्य कर दिया गया, तो कई नियोक्ता महिलाओं को नौकरी देने से हिचक सकते हैं। कोर्ट ने यह भी कहा कि इससे कार्यस्थलों पर एक ऐसा माहौल बन सकता है जिसमें महिलाओं को कम सक्षम या कमजोर समझा जाने लगे। न्यायाधीशों के मुताबिक, ऐसी व्यवस्था अनजाने में महिलाओं के रोजगार के अवसरों को नुकसान पहुंचा सकती है।

सीजेआई ने साफ शब्दों में कहा कि अगर कानून में अनिवार्य छुट्टी का प्रावधान कर दिया गया तो कई संस्थान यह सोच सकते हैं कि महिलाओं को नियुक्त करने से अतिरिक्त जिम्मेदारियां बढ़ जाएंगी।

पीरियड लीव याचिका में क्या मांग की गई थी?

Supreme Court decision on period leave

यह याचिका वकील शैलेन्द्र मणि त्रिपाठी ने दायर की थी। इसमें मांग की गई थी कि केंद्र और राज्य सरकारें ऐसी नीति बनाएँ जिससे महिलाओं और छात्राओं को मासिक धर्म के दौरान छुट्टी मिल सके। याचिका में यह भी कहा गया था कि कई महिलाओं को पीरियड्स के दौरान गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं का सामना करना पड़ता है, जैसे:

  • तेज मासिक धर्म दर्द

  • एंडोमेट्रियोसिस

  • यूटेराइन फाइब्रॉइड

  • एडेनोमायोसिस

  • पेल्विक इंफ्लेमेटरी डिजीज

इन स्थितियों में कई महिलाओं के लिए काम करना या पढ़ाई करना बेहद मुश्किल हो जाता है। इसलिए याचिकाकर्ता का तर्क था कि उन्हें विशेष छुट्टी या अन्य सहायता दी जानी चाहिए।

कोर्ट ने क्या समाधान सुझाया?

सुप्रीम कोर्ट ने यह याचिका खारिज जरूर कर दी, लेकिन साथ ही केंद्र सरकार को यह सुझाव दिया कि वह इस मुद्दे पर विचार कर सकती है। अदालत ने कहा कि सरकार चाहे तो विभिन्न पक्षों से चर्चा करके इस विषय पर कोई नीति बना सकती है।  कोर्ट ने यह भी कहा कि अगर कंपनियां या संस्थान अपनी इच्छा से ऐसी छुट्टी देना चाहें तो यह अच्छी पहल है, लेकिन इसे कानून के जरिए अनिवार्य बनाना सही नहीं होगा।

कुछ राज्यों और कंपनियों में पहले से है पीरियड लीव

  • ओडिशा में 1992 से पीरियड लीव नीति लागू है

  • केरल के कुछ विश्वविद्यालयों में छात्राओं को राहत दी जाती है

  • कई निजी कंपनियां भी स्वेच्छा से ऐसी छुट्टी देती हैं

कोर्ट ने कहा कि अगर संस्थान स्वेच्छा से यह सुविधा देते हैं तो यह स्वागत योग्य कदम है।

कोर्ट की बड़ी टिप्पणी

सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि ऐसे मामलों में संतुलन बनाए रखना जरूरी है। एक तरफ महिलाओं के स्वास्थ्य और गरिमा का सवाल है, तो दूसरी तरफ रोजगार के अवसरों पर भी ध्यान देना होगा। अदालत का मानना है कि अगर बिना व्यापक चर्चा के ऐसा कानून बना दिया गया, तो इससे महिलाओं को फायदा कम और नुकसान ज्यादा हो सकता है।

Also Read – Menstrual Hygiene Day: Periods के दौरान साफ-सफाई रखना जरुरी, हो सकता बीमारियों का खतरा!!

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