वृश्चिक संक्रांति 16 नवंबर 2026 को है। जानें पति-पत्नी के नियम, सूर्य को अर्घ्य, स्नान-दान, पितृ तर्पण और शारीरिक संबंधों से जुड़ी धार्मिक मान्यताएं भी।

हिंदू पंचांग के अनुसार, वृश्चिक संक्रांति सोमवार, 16 नवंबर 2026 को मनाई जाएगी। इस दिन सूर्य तुला राशि से निकलकर वृश्चिक राशि में प्रवेश करेंगे। सूर्य के एक राशि से दूसरी राशि में प्रवेश करने की इस खगोलीय घटना को संक्रांति कहा जाता है। हिंदू सौर कैलेंडर में सालभर में कुल 12 संक्रांतियां होती हैं।
द्रिक पंचांग के अनुसार, 16 नवंबर को सूर्य का वृश्चिक राशि में प्रवेश शाम 7:48 बजे होगा। चूंकि इस बार संक्रांति का क्षण सूर्यास्त के बाद है, इसलिए स्नान, दान और दूसरे धार्मिक कार्यों के लिए दिन के पुण्यकाल का विशेष महत्व रहेगा। पुण्यकाल का सटीक समय शहर और पंचांग की गणना के अनुसार अलग हो सकता है।
धार्मिक मान्यताओं में संक्रांति को आत्मशुद्धि, पुण्य कर्म और दान का विशेष अवसर माना जाता है। इस दिन पवित्र स्नान, सूर्य देव को अर्घ्य, जरूरतमंदों को दान और पितरों के निमित्त तर्पण करने की परंपरा है।
वृश्चिक संक्रांति को लेकर सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या शादीशुदा जोड़ों को इस दिन कोई विशेष नियम मानने चाहिए?
इसका सीधा जवाब है कि सामान्य हिंदू धार्मिक परंपराओं में वृश्चिक संक्रांति के लिए पति-पत्नी का कोई अलग विवाह संबंधी व्रत या विशेष अनुष्ठान निर्धारित नहीं है।
यानी यह दिन करवाचौथ या हरतालिका तीज की तरह पति-पत्नी के रिश्ते के लिए निर्धारित कोई विशेष व्रत नहीं है।
हालांकि, धर्मशास्त्रीय परंपराओं में संक्रांति के समय को सामान्य मांगलिक कार्यों के लिए अनुकूल नहीं माना गया है। इस अवधि में विवाह, गृह प्रवेश और अन्य बड़े शुभ आयोजनों से बचने की सलाह दी जाती है।
पति-पत्नी इस दिन कुछ सामान्य धार्मिक परंपराओं का पालन एक साथ कर सकते हैं।
सुबह जल्दी उठकर स्नान करना।
सूर्य देव को जल अर्पित करना।
घर में पूजा-पाठ और मंत्र जाप करना।
जरूरतमंद लोगों को भोजन, अनाज और कपड़े दान करना।
परिवार में शांति बनाए रखना और विवादों से बचना।
ध्यान देने वाली बात है कि ये सामान्य धार्मिक observances हैं, पति-पत्नी के लिए कोई अनिवार्य विशेष नियम नहीं।

वृश्चिक संक्रांति से जुड़ा एक संवेदनशील सवाल शारीरिक संबंधों को लेकर भी है। कई धार्मिक मान्यताओं में संक्रांति के दिन पति-पत्नी को शारीरिक संबंधों से दूर रहने और संयम बरतने की सलाह दी जाती है।
इस मान्यता के पीछे धार्मिक दृष्टिकोण यह है कि संक्रांति का समय स्नान, दान, तप, पूजा और आध्यात्मिक गतिविधियों के लिए समर्पित माना जाता है।
कुछ आयुर्वेदिक और धर्मशास्त्रीय परंपराओं में संक्रांति जैसे पर्वकाल को मैथुन से परहेज करने वाले समय में शामिल किया गया है। भावप्रकाश और अष्टांग संग्रह से जुड़े पारंपरिक संदर्भों में भी पर्व के दिनों में संयम की चर्चा मिलती है।
लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण अंतर समझना जरूरी है।
वृश्चिक संक्रांति के दिन हर विवाहित जोड़े के लिए शारीरिक संबंध बनाना अनिवार्य रूप से निषिद्ध है, ऐसा कोई स्पष्ट सार्वभौमिक नियम स्थापित नहीं किया जा सकता।
अलग-अलग धार्मिक परंपराओं, क्षेत्रीय मान्यताओं और परिवारों में इस विषय पर अलग-अलग विचार हो सकते हैं।
इसलिए इसे धार्मिक आस्था और व्यक्तिगत विश्वास का विषय समझना चाहिए, न कि ऐसा नियम जिसका उल्लंघन करने पर पति-पत्नी के रिश्ते या परिवार पर अनिवार्य रूप से कोई बुरा प्रभाव पड़ेगा।
संक्रांति का सीधा संबंध सूर्य देव से है। इसलिए इस दिन सूर्य उपासना को विशेष महत्व दिया जाता है।
पति-पत्नी चाहें तो एक साथ पूजा कर सकते हैं।
पूजा की सामान्य विधि इस प्रकार है:
सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और साफ कपड़े पहनें।
सूर्य देव के सामने स्वच्छ जल से भरा तांबे का लोटा लें।
जल में लाल फूल और अक्षत डाल सकते हैं।
सूर्य देव को अर्घ्य अर्पित करें।
इस दौरान 'ॐ सूर्याय नमः' मंत्र का जाप करें।
परिवार की सुख-समृद्धि और अच्छे स्वास्थ्य की प्रार्थना करें।
इस दिन आदित्य हृदय स्तोत्र और विष्णु सहस्रनाम का पाठ भी किया जा सकता है।
यह जरूरी नहीं कि पति-पत्नी दोनों को अलग-अलग पूजा करनी हो। अपनी श्रद्धा और पारिवारिक परंपरा के अनुसार साथ में भी पूजा की जा सकती है।
हिंदू धर्म में संक्रांति के दिन स्नान और दान को विशेष पुण्यदायी माना गया है।
मान्यता है कि इस दिन पवित्र नदी में स्नान करने से आध्यात्मिक शुद्धि होती है। हालांकि, हर व्यक्ति के लिए नदी में स्नान करना जरूरी नहीं है। घर पर स्वच्छ पानी से स्नान करके भी धार्मिक परंपरा का पालन किया जा सकता है।
दान की बात करें तो वृश्चिक संक्रांति के लिए धर्मसिंधु में दीपदान का उल्लेख मिलता है।
इस दिन अपनी क्षमता और श्रद्धा के अनुसार निम्न चीजों का दान किया जा सकता है:
जरूरतमंदों को भोजन और अनाज।
गरीब परिवारों को कपड़े।
जरूरतमंदों को आर्थिक सहायता।
मंदिर में दीपदान।
जरूरतमंद लोगों की दैनिक आवश्यकताओं की वस्तुएं।
पति-पत्नी साथ मिलकर दान करें तो इसे परिवार के लिए एक सकारात्मक धार्मिक गतिविधि माना जा सकता है।
यहां दिखावे से ज्यादा महत्व दान की भावना और जरूरतमंद की सहायता करने को दिया जाता है।
हिंदू धार्मिक परंपरा में संक्रांति को पितरों के निमित्त धार्मिक कर्म करने के लिए भी महत्वपूर्ण माना गया है।
इस दिन कुछ परिवार अपने पूर्वजों की शांति और उनके प्रति श्रद्धा व्यक्त करने के लिए तर्पण और श्राद्ध संबंधी कर्म करते हैं।
हालांकि, पितृ तर्पण की विधि और नियम परिवार की परंपरा तथा स्थानीय धार्मिक मान्यताओं के अनुसार अलग हो सकते हैं।
यदि परिवार में पहले से पितृ कर्म करने की परंपरा है तो योग्य पंडित के मार्गदर्शन में इसे किया जा सकता है।
इस दिन घर में सात्विक वातावरण बनाए रखने और धार्मिक गतिविधियों पर ध्यान देने की सलाह दी जाती है।
क्या करें?
सुबह स्नान के बाद सूर्य देव को अर्घ्य दें।
घर के मंदिर में दीपक जलाएं।
जरूरतमंद लोगों की मदद करें।
भोजन और अनाज का दान करें।
परिवार के सदस्यों के साथ अच्छा व्यवहार करें।
अपनी श्रद्धा के अनुसार मंत्र जाप और धार्मिक पाठ करें।
किन बातों से बचें?
संक्रांति के पुण्यकाल में विवाह और अन्य बड़े मांगलिक आयोजन करने से बचें।
पूजा-पाठ के समय अपवित्रता और लापरवाही से बचें।
किसी जरूरतमंद का अपमान न करें।
परिवार में बेवजह के विवाद और क्रोध से दूर रहें।
अपनी धार्मिक मान्यताओं के अनुसार संयम का पालन करें।
ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, वृश्चिक राशि का स्वामी मंगल है और इसे जल तत्व की राशि माना जाता है। सूर्य के इस राशि में प्रवेश को लेकर ज्योतिषीय परंपराओं में अलग-अलग फल बताए गए हैं।
द्रिक पंचांग में 2026 की वृश्चिक संक्रांति के लिए ध्वांक्षी नाम, महिष वाहन और वाणिज्य करण जैसी विशेषताएं दर्ज हैं।
पंचांग आधारित संक्रांति फल में आने वाले समय के लिए वस्तुओं की कीमतों, सामाजिक परिस्थितियों, स्वास्थ्य और अनाज के भंडार से जुड़े पारंपरिक संकेत भी बताए जाते हैं।
हालांकि, इन ज्योतिषीय फलों को धार्मिक और पारंपरिक मान्यताओं के रूप में ही देखना चाहिए। इन्हें भविष्य की घटनाओं की वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित भविष्यवाणी नहीं माना जा सकता।
नहीं। वृश्चिक संक्रांति पर विवाहित महिलाओं या पुरुषों के लिए कोई सार्वभौमिक अनिवार्य व्रत निर्धारित नहीं है।
कोई महिला अपनी श्रद्धा के अनुसार उपवास रख सकती है और कोई पुरुष भी धार्मिक नियमों का पालन कर सकता है। लेकिन केवल इसलिए व्रत रखना जरूरी नहीं है कि उस दिन संक्रांति है।
धार्मिक परंपराओं में स्नान, दान, सूर्य पूजा और संयम को अधिक महत्व दिया गया है।
वृश्चिक संक्रांति 2026 सोमवार, 16 नवंबर को है। इस दिन पति-पत्नी के लिए कोई अलग विवाह संबंधी व्रत या विशेष पूजा अनिवार्य नहीं है। हालांकि, हिंदू धार्मिक मान्यताओं के अनुसार दोनों साथ मिलकर स्नान, सूर्य पूजा, दीपदान और जरूरतमंदों की सहायता जैसे पुण्य कार्य कर सकते हैं।
शारीरिक संबंधों को लेकर कुछ परंपराओं में संयम की सलाह जरूर मिलती है, लेकिन इसे सभी विवाहित जोड़ों पर लागू होने वाला एक समान और अनिवार्य नियम बताना सही नहीं होगा।
आखिरकार, संक्रांति का वास्तविक धार्मिक संदेश आत्मशुद्धि, दान, सेवा और अच्छे कर्मों से जुड़ा है।