केंद्र सरकार ने देश की ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करने की दिशा में एक बड़ा कदम उठाते हुए ₹84,084 करोड़ की 'समुद्र मंथन (Samudra Manthan)' योजना को मंजूरी दे दी है। यह अब तक का भारत का सबसे बड़ा ऑफशोर ऑयल और गैस एक्सप्लोरेशन प्रोग्राम माना जा रहा है। इस योजना का उद्देश्य समुद्र के भीतर छिपे नए तेल और प्राकृतिक गैस के भंडारों की खोज करना है, ताकि देश की आयातित कच्चे तेल पर बढ़ती निर्भरता को कम किया जा सके।

केंद्र सरकार ने देश की ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करने की दिशा में एक बड़ा कदम उठाते हुए ₹84,084 करोड़ की 'समुद्र मंथन (Samudra Manthan)' योजना को मंजूरी दे दी है। यह अब तक का भारत का सबसे बड़ा ऑफशोर ऑयल और गैस एक्सप्लोरेशन प्रोग्राम माना जा रहा है। इस योजना का उद्देश्य समुद्र के भीतर छिपे नए तेल और प्राकृतिक गैस के भंडारों की खोज करना है, ताकि देश की आयातित कच्चे तेल पर बढ़ती निर्भरता को कम किया जा सके।
सरकार का मानना है कि अगर भारतीय समुद्री क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर तेल और गैस के नए भंडार मिलते हैं, तो आने वाले वर्षों में देश की ऊर्जा जरूरतों को काफी हद तक घरेलू संसाधनों से पूरा किया जा सकेगा।
'समुद्र मंथन' नाम भारतीय पौराणिक कथा से प्रेरित है, जिसमें समुद्र मंथन से कई अमूल्य रत्न प्राप्त हुए थे। इसी सोच को आधुनिक रूप देते हुए सरकार समुद्र की गहराइयों में मौजूद ऊर्जा संसाधनों की खोज पर बड़ा निवेश कर रही है।
इस योजना की घोषणा की प्रेरणा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 2025 के स्वतंत्रता दिवस संबोधन से जुड़ी मानी जा रही है, जिसमें उन्होंने भारत के समुद्री संसाधनों का बेहतर उपयोग करने पर जोर दिया था।
सरकार ने इस योजना के लिए कुल ₹84,084 करोड़ का बजट तय किया है, जिसे कई बड़े हिस्सों में खर्च किया जाएगा।
सबसे पहले समुद्र के नीचे संभावित तेल और गैस भंडारों की पहचान करने के लिए आधुनिक सीस्मिक सर्वे कराए जाएंगे। इस काम पर ₹28,534 करोड़ खर्च किए जाएंगे।
इसके अलावा गहरे समुद्री क्षेत्रों में 60 डीपवॉटर एक्सप्लोरेशन वेल (Deepwater Exploration Wells) खोदे जाएंगे। इसके लिए ₹43,200 करोड़ निर्धारित किए गए हैं। सरकार प्रत्येक योग्य कुएं की ड्रिलिंग लागत का 50 प्रतिशत तक वहन करेगी, जिसकी अधिकतम सीमा ₹675 करोड़ प्रति कुआं होगी।
ऑफशोर इंफ्रास्ट्रक्चर विकसित करने के लिए ₹10,000 करोड़ और ऑयल-गैस सेक्टर से जुड़े मैन्युफैक्चरिंग एवं सर्विस हब तैयार करने के लिए ₹2,000 करोड़ का प्रावधान किया गया है।
भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल उपभोक्ता देश है, लेकिन घरेलू उत्पादन लगातार घटता जा रहा है।
सरकारी आंकड़ों के अनुसार, 2014-15 में भारत अपनी जरूरत का लगभग 78.5 प्रतिशत कच्चा तेल आयात करता था, जो 2025-26 में बढ़कर 88.7 प्रतिशत तक पहुंच गया है।
इसकी सबसे बड़ी वजह देश के पुराने तेल क्षेत्रों का धीरे-धीरे कम उत्पादन देना है। मुंबई हाई जैसे बड़े ऑफशोर ऑयल फील्ड, जिन्होंने दशकों तक भारत की ऊर्जा जरूरतों को पूरा किया, अब अपने चरम उत्पादन से काफी आगे निकल चुके हैं। वहीं असम सहित कई पुराने ऑनशोर ऑयल फील्ड भी प्राकृतिक रूप से कम उत्पादन दे रहे हैं।
दूसरी तरफ देश में ऊर्जा की मांग लगातार बढ़ रही है, जिससे आयात पर निर्भरता और अधिक बढ़ती जा रही है।
समुद्र के भीतर तेल और गैस की खोज जमीन पर ड्रिलिंग करने की तुलना में कहीं ज्यादा जटिल और महंगी होती है।
सबसे पहले वैज्ञानिक ध्वनि तरंगों (Seismic Survey) की मदद से समुद्र के नीचे मौजूद चट्टानों का अध्ययन करते हैं। हालांकि, किसी जगह उपयुक्त संरचना मिलने का मतलब यह नहीं होता कि वहां व्यावसायिक स्तर पर तेल या गैस भी मिलेगी।
एक डीपवॉटर एक्सप्लोरेशन वेल की ड्रिलिंग पर आमतौर पर 80 से 150 मिलियन डॉलर तक का खर्च आ सकता है। विशेषज्ञों के अनुसार, ऐसे नए क्षेत्रों में खोदे गए हर चार कुओं में से औसतन केवल एक ही व्यावसायिक रूप से सफल साबित होता है।
यही कारण है कि सरकार निजी कंपनियों के साथ जोखिम साझा करने के लिए ड्रिलिंग लागत में आर्थिक सहायता देने का फैसला कर रही है।
सरकार का लक्ष्य इस योजना के जरिए भारत के हाइड्रोकार्बन भंडार में करीब 600 मिलियन मीट्रिक टन ऑयल इक्विवेलेंट (MMTOE) की बढ़ोतरी करना है।
इसके साथ ही देश के घरेलू तेल और गैस उत्पादन को मौजूदा 62 MMTOE से बढ़ाकर 80 MMTOE प्रति वर्ष तक ले जाने का लक्ष्य रखा गया है। वहीं कुल हाइड्रोकार्बन रिजर्व को 1.6 बिलियन टन ऑयल इक्विवेलेंट से बढ़ाकर 2.2 बिलियन टन तक पहुंचाने की योजना है।
अगर बड़े पैमाने पर व्यावसायिक रूप से उपयोगी भंडार मिलते हैं, तो भारत हर साल कच्चे तेल के आयात पर होने वाले करीब ₹1 लाख करोड़ तक के खर्च में बचत कर सकता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि ऑफशोर एक्सप्लोरेशन हमेशा जोखिम भरा होता है। भारी निवेश के बावजूद यह जरूरी नहीं कि हर ड्रिलिंग सफल हो। यहां तक कि अगर बड़े भंडार मिल भी जाएं, तब भी उन्हें व्यावसायिक उत्पादन तक पहुंचने में कई साल लग सकते हैं।
यानी यह योजना लंबी अवधि का निवेश है, जिसका वास्तविक फायदा भविष्य में मिलने की उम्मीद की जा रही है।
'समुद्र मंथन' सिर्फ एक एक्सप्लोरेशन प्रोजेक्ट नहीं, बल्कि भारत की ऊर्जा नीति में एक बड़ा बदलाव भी माना जा रहा है।
पिछले कुछ वर्षों में सरकार ने नए एक्सप्लोरेशन ब्लॉक जारी किए, लाइसेंसिंग नियमों में बदलाव किए और निजी निवेश को बढ़ावा देने की कोशिश की। लेकिन इस बार सरकार खुद सीस्मिक सर्वे, ड्रिलिंग जोखिम और ऑफशोर इंफ्रास्ट्रक्चर पर बड़ी रकम खर्च कर रही है।
इसका मकसद साफ है—निजी कंपनियों के लिए जोखिम कम करना और समुद्र के उन इलाकों में भी खोज को बढ़ावा देना, जहां अब तक निवेश करना बेहद महंगा और चुनौतीपूर्ण माना जाता था।
'समुद्र मंथन' योजना की असली सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि भारतीय समुद्री क्षेत्र में कितने बड़े और व्यावसायिक रूप से उपयोगी तेल एवं गैस भंडार मिलते हैं। यदि सरकार की यह रणनीति सफल होती है, तो आने वाले वर्षों में भारत न केवल अपनी ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत कर सकेगा, बल्कि आयातित कच्चे तेल पर निर्भरता कम करने की दिशा में भी एक बड़ा कदम बढ़ा सकेगा।
केंद्र सरकार ने देश की ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करने की दिशा में एक बड़ा कदम उठाते हुए ₹84,084 करोड़ की 'समुद्र मंथन (Samudra Manthan)' योजना को मंजूरी दे दी है। यह अब तक का भारत का सबसे बड़ा ऑफशोर ऑयल और गैस एक्सप्लोरेशन प्रोग्राम माना जा रहा है। इस योजना का उद्देश्य समुद्र के भीतर छिपे नए तेल और प्राकृतिक गैस के भंडारों की खोज करना है, ताकि देश की आयातित कच्चे तेल पर बढ़ती निर्भरता को कम किया जा सके।
सरकार का मानना है कि अगर भारतीय समुद्री क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर तेल और गैस के नए भंडार मिलते हैं, तो आने वाले वर्षों में देश की ऊर्जा जरूरतों को काफी हद तक घरेलू संसाधनों से पूरा किया जा सकेगा।
'समुद्र मंथन' नाम भारतीय पौराणिक कथा से प्रेरित है, जिसमें समुद्र मंथन से कई अमूल्य रत्न प्राप्त हुए थे। इसी सोच को आधुनिक रूप देते हुए सरकार समुद्र की गहराइयों में मौजूद ऊर्जा संसाधनों की खोज पर बड़ा निवेश कर रही है।
इस योजना की घोषणा की प्रेरणा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 2025 के स्वतंत्रता दिवस संबोधन से जुड़ी मानी जा रही है, जिसमें उन्होंने भारत के समुद्री संसाधनों का बेहतर उपयोग करने पर जोर दिया था।
सरकार ने इस योजना के लिए कुल ₹84,084 करोड़ का बजट तय किया है, जिसे कई बड़े हिस्सों में खर्च किया जाएगा।
सबसे पहले समुद्र के नीचे संभावित तेल और गैस भंडारों की पहचान करने के लिए आधुनिक सीस्मिक सर्वे कराए जाएंगे। इस काम पर ₹28,534 करोड़ खर्च किए जाएंगे।
इसके अलावा गहरे समुद्री क्षेत्रों में 60 डीपवॉटर एक्सप्लोरेशन वेल (Deepwater Exploration Wells) खोदे जाएंगे। इसके लिए ₹43,200 करोड़ निर्धारित किए गए हैं। सरकार प्रत्येक योग्य कुएं की ड्रिलिंग लागत का 50 प्रतिशत तक वहन करेगी, जिसकी अधिकतम सीमा ₹675 करोड़ प्रति कुआं होगी।
ऑफशोर इंफ्रास्ट्रक्चर विकसित करने के लिए ₹10,000 करोड़ और ऑयल-गैस सेक्टर से जुड़े मैन्युफैक्चरिंग एवं सर्विस हब तैयार करने के लिए ₹2,000 करोड़ का प्रावधान किया गया है।
भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल उपभोक्ता देश है, लेकिन घरेलू उत्पादन लगातार घटता जा रहा है।
सरकारी आंकड़ों के अनुसार, 2014-15 में भारत अपनी जरूरत का लगभग 78.5 प्रतिशत कच्चा तेल आयात करता था, जो 2025-26 में बढ़कर 88.7 प्रतिशत तक पहुंच गया है।
इसकी सबसे बड़ी वजह देश के पुराने तेल क्षेत्रों का धीरे-धीरे कम उत्पादन देना है। मुंबई हाई जैसे बड़े ऑफशोर ऑयल फील्ड, जिन्होंने दशकों तक भारत की ऊर्जा जरूरतों को पूरा किया, अब अपने चरम उत्पादन से काफी आगे निकल चुके हैं। वहीं असम सहित कई पुराने ऑनशोर ऑयल फील्ड भी प्राकृतिक रूप से कम उत्पादन दे रहे हैं।
दूसरी तरफ देश में ऊर्जा की मांग लगातार बढ़ रही है, जिससे आयात पर निर्भरता और अधिक बढ़ती जा रही है।
समुद्र के भीतर तेल और गैस की खोज जमीन पर ड्रिलिंग करने की तुलना में कहीं ज्यादा जटिल और महंगी होती है।
सबसे पहले वैज्ञानिक ध्वनि तरंगों (Seismic Survey) की मदद से समुद्र के नीचे मौजूद चट्टानों का अध्ययन करते हैं। हालांकि, किसी जगह उपयुक्त संरचना मिलने का मतलब यह नहीं होता कि वहां व्यावसायिक स्तर पर तेल या गैस भी मिलेगी।
एक डीपवॉटर एक्सप्लोरेशन वेल की ड्रिलिंग पर आमतौर पर 80 से 150 मिलियन डॉलर तक का खर्च आ सकता है। विशेषज्ञों के अनुसार, ऐसे नए क्षेत्रों में खोदे गए हर चार कुओं में से औसतन केवल एक ही व्यावसायिक रूप से सफल साबित होता है।
यही कारण है कि सरकार निजी कंपनियों के साथ जोखिम साझा करने के लिए ड्रिलिंग लागत में आर्थिक सहायता देने का फैसला कर रही है।
सरकार का लक्ष्य इस योजना के जरिए भारत के हाइड्रोकार्बन भंडार में करीब 600 मिलियन मीट्रिक टन ऑयल इक्विवेलेंट (MMTOE) की बढ़ोतरी करना है।
इसके साथ ही देश के घरेलू तेल और गैस उत्पादन को मौजूदा 62 MMTOE से बढ़ाकर 80 MMTOE प्रति वर्ष तक ले जाने का लक्ष्य रखा गया है। वहीं कुल हाइड्रोकार्बन रिजर्व को 1.6 बिलियन टन ऑयल इक्विवेलेंट से बढ़ाकर 2.2 बिलियन टन तक पहुंचाने की योजना है।
अगर बड़े पैमाने पर व्यावसायिक रूप से उपयोगी भंडार मिलते हैं, तो भारत हर साल कच्चे तेल के आयात पर होने वाले करीब ₹1 लाख करोड़ तक के खर्च में बचत कर सकता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि ऑफशोर एक्सप्लोरेशन हमेशा जोखिम भरा होता है। भारी निवेश के बावजूद यह जरूरी नहीं कि हर ड्रिलिंग सफल हो। यहां तक कि अगर बड़े भंडार मिल भी जाएं, तब भी उन्हें व्यावसायिक उत्पादन तक पहुंचने में कई साल लग सकते हैं।
यानी यह योजना लंबी अवधि का निवेश है, जिसका वास्तविक फायदा भविष्य में मिलने की उम्मीद की जा रही है।
'समुद्र मंथन' सिर्फ एक एक्सप्लोरेशन प्रोजेक्ट नहीं, बल्कि भारत की ऊर्जा नीति में एक बड़ा बदलाव भी माना जा रहा है।
पिछले कुछ वर्षों में सरकार ने नए एक्सप्लोरेशन ब्लॉक जारी किए, लाइसेंसिंग नियमों में बदलाव किए और निजी निवेश को बढ़ावा देने की कोशिश की। लेकिन इस बार सरकार खुद सीस्मिक सर्वे, ड्रिलिंग जोखिम और ऑफशोर इंफ्रास्ट्रक्चर पर बड़ी रकम खर्च कर रही है।
इसका मकसद साफ है—निजी कंपनियों के लिए जोखिम कम करना और समुद्र के उन इलाकों में भी खोज को बढ़ावा देना, जहां अब तक निवेश करना बेहद महंगा और चुनौतीपूर्ण माना जाता था।
'समुद्र मंथन' योजना की असली सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि भारतीय समुद्री क्षेत्र में कितने बड़े और व्यावसायिक रूप से उपयोगी तेल एवं गैस भंडार मिलते हैं। यदि सरकार की यह रणनीति सफल होती है, तो आने वाले वर्षों में भारत न केवल अपनी ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत कर सकेगा, बल्कि आयातित कच्चे तेल पर निर्भरता कम करने की दिशा में भी एक बड़ा कदम बढ़ा सकेगा।