महाराष्ट्र सरकार ने किसानों के हक में एक ऐसा कदम उठाने की तैयारी की है जो सालों से लटका हुआ था। राज्य के कृषि मंत्री दत्तात्रय भरणे ने मंगलवार को मंत्रालय में हुई समीक्षा बैठक में ऐलान किया कि महाराष्ट्र अब एक अलग बीज कानून लाएगा जो किसानों को यह कानून...

महाराष्ट्र सरकार ने किसानों के हक में एक ऐसा कदम उठाने की तैयारी की है जो सालों से लटका हुआ था। राज्य के कृषि मंत्री दत्तात्रय भरणे ने मंगलवार को मंत्रालय में हुई समीक्षा बैठक में ऐलान किया कि महाराष्ट्र अब एक अलग बीज कानून लाएगा जो किसानों को यह कानूनी अधिकार देगा कि वे अपनी फसल के बीज खुद रख सकें, उनका इस्तेमाल कर सकें, आपस में बदल सकें और किसी ब्रांडेड नाम के बिना उन्हें बेच भी सकें।
यह कोई नई बात नहीं है महाराष्ट्र विधानमंडल के 2025 के मानसून सत्र में इसका वादा किया गया था। अब कृषि मंत्री भरणे ने Seed Act 1966 में बदलाव के प्रस्तावों की समीक्षा की और साफ कहा कि नया कानून जल्द आएगा। इसमें किसानों को घटिया बीज मिलने पर तुरंत मुआवज़े का प्रावधान होगा, बीज कंपनियों की जवाबदेही तय होगी और नियम तोड़ने वाली कंपनियों पर सख्त कार्रवाई होगी। इसके साथ ही महाबीज यानी महाराष्ट्र राज्य बीज निगम के कामकाज को भी दुरुस्त करने पर ज़ोर दिया जाएगा।
मंत्री ने अधिकारियों को यह भी निर्देश दिए कि ज़िला स्तर पर बीज शिकायत निवारण केंद्र स्थापित किए जाएं। यानी अगर किसान को घटिया बीज मिला तो उसे दर-दर भटकना नहीं पड़ेगा अपने ज़िले में ही शिकायत दर्ज करा सकेगा और उसका हल मिलेगा। इसके अलावा सत्य बीज Truthful Seeds का रजिस्ट्रेशन साथी पोर्टल पर शुरू करने के भी निर्देश दिए गए हैं। कृषि विश्वविद्यालयों द्वारा किए गए शोध से जुड़े प्रावधान भी नए कानून में स्पष्ट रूप से शामिल किए जाएंगे।
एक अच्छी खबर यह भी है कि सरकार ने साथी पोर्टल पर बीज उत्पादन से जुड़ी सभी संस्थाओं का 100% रजिस्ट्रेशन पूरा कर लिया है। अब खरीफ 2026 सीज़न से बीज का उत्पादन, वितरण और बिक्री सब कुछ इसी पोर्टल के ज़रिए होगा। इससे certification, traceability और accountability तीनों बेहतर होंगे।
सीधी भाषा में कहें तो अब किसान की मेहनत से उगे बीजों पर उसका खुद का हक होगा। बड़ी कंपनियाँ मनमाने दाम नहीं वसूल पाएंगी। घटिया बीज बेचने पर तुरंत जवाबदेही होगी। और शिकायत करने के लिए दूर नहीं जाना पड़ेगा। यह कानून अगर सही तरीके से लागू हुआ तो महाराष्ट्र के किसानों की ज़िंदगी में सच में बड़ा बदलाव आ सकता है। अब देखना यह है कि यह कागज़ों से निकलकर ज़मीन तक कब और कैसे पहुँचता है।
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