Agriculture

Grass livelihood: घास बन रही लोगों की आजीविका का जरिया, रस्सी बनाकर 200 परिवार हुए आत्मनिर्भर

Grass livelihood

वन विभाग की योजना से संवर रहा है गांव के लोगों का जीवन

उज्जैन। मप्र में अब घास लोगों की आजीविका (Grass livelihood) का जरिया बन रही है। घास से रस्सी बनाकर 200 परिवार हुए आत्मनिर्भर हुए हैं। वन विभाग द्वारा आयोजित श्री महाकाल वन मेले में वन परिक्षेत्र गाडरवारा वन मंडल नरसिंहपुर के ग्राम गोटीटोरिया गांव की सतपुड़ा बावेर हस्तकला केंद्र द्वारा वन उत्पाद के तहत बावेर घास से रस्सी बनाने और लकड़ी के माध्यम से सजावटी सामान बनाने का स्टॉल लगाया है। परंपरागत रूप से पहाड़ी क्षेत्र में मिलने वाली बावेर घास का उपयोग कर गोटीटोरिया गांव के करीब 200 परिवारों ने हैंडीक्राफ्ट निर्माण कार्य शुरु किया है। कलात्मक वस्तुओं का निर्माण कर महिलाएं भी आत्मनिर्भर बनी है।

Read Also- विलुप्त हो रहे बीजों के संरक्षण के लिए सागर में बनेगा बीज बैंक, बी सखियां करेंगी संचालित

2003 से बावेर घास से रस्‍सी का निर्माण की शुरु की थी कार्ययोजना

दशहरा मैदान पर आयोजित श्री महाकाल वन मेले में वन परिक्षेत्र गाडरवारा वन मंडल नरसिंहपुर के सतपुड़ा बावेर हस्तकला केंद्र का स्‍टॉल लगा है। वन परिक्षेत्र गाडरवारा के वन रंक्षक अमन खरे ने बताया कि वन विभाग द्वारा समिति बनाकर वर्ष 2003 से बावेर घास से रस्‍सी का निर्माण की कार्ययोजना शुरु की थी। इस कार्य में ग्राम गोटीटोरिया के लोगों को जोड़कर परंपरागत रुप से पहाड पर मिलने वाली बावेर घास के माध्‍यम से रस्‍सी बनाने की प्रक्रिया शुरु की गई।

Grass livelihood

Grass livelihood

वार्षिक टर्नओवर करीब 50 लाख रुपए

समिति द्वारा 19 गांव के 200 परिवार को 41 हस्तचलित व इलेक्ट्रिक घास बनाने की मशीन देने के बाद प्रतिवर्ष 1 हजार क्विंटल बावेर घास की रस्‍सी का उत्‍पादन हो किया जाता है। जिसका वार्षिक टर्नओवर करीब 50 लाख रुपए है। वनरंक्षक खेर ने बताया कि सामान्‍यत: कच्चे माल के रूप में बावेर घास वन विभाग की समिति द्वारा ₹22 किलो पर खरीदी कर समिति के माध्यम से रस्सी बनाने के काम में जुटे लोगों को दी जाती है। करीब 100 किलो घास में 95 किलो रस्सी का निर्माण किया जाता है। खास बात यह है कि रस्सी बनने के बाद इसकी खरीदी भी वन विभाग द्वारा की जाती है। बावेर की रस्सी वन विभाग द्वारा बांस बंडल बांधने के काम में उपयोग लाई जाती है।

 

गांव वालों को केवल रस्सी बनाने के काम के एवज में ही 10 से ₹12000 प्रति माह की आमदनी हो रही है। वन विभाग की समिति द्वारा गांव की महिलाओं को एनटीपीसी के माध्यम से प्रशिक्षण भी दिलाया गया। इसके बाद घरेलू कामकाज के बाद महिलाएं घास और लकड़ी से रोटी टोकरी, गुलदस्ते सहित सजावटी सामान बनाने के काम में जुटी रहती है। जिससे महिलाओं की आर्थिक स्थिति भी सुदृढ हुई है।

 

Read Also- इस आइडिया को अपनाएं किसान भाई, सब्जियों से होगा डबल मुनाफा

लोगों को मिल रहा रोजगार

खेर ने बताया कि समिति द्वारा तैयार बावेर रस्सी खरीदने के बाद प्रदेश के वन विभाग को सप्लाई की जाती है। आमतौर पर पहाड़ी क्षेत्र में मिलने वाली बावेर घास को परंपरागत रूप से भारिया जाति के लोग कटाई करते हैं। वनरक्षक खेर ने बताया कि घास खरीदी 22 रुपए रस्‍सी बनवाई मजदूरी 33 रुपए कुल खर्च 55 रुपए होता है। वन विभाग के माध्‍यम से 59 रुपए प्रतिकिलों की दर से विभाग द्वारा रस्‍सी विक्रय की जाती है। इससे समिति को 4 रूपए प्रति किलो के हिसाब से आय प्राप्त होती है जिससे बिजली, गोदाम सुरक्षा और मशीनों के रखरखाव का कार्य किया जाता है।

Share post: facebook twitter pinterest whatsapp