Farmers’ Growth: छत्तीसगढ़ में किसानों की आय बढ़ाने के लिए अब पारंपरिक खेती के साथ-साथ औषधीय पौधों की खेती को भी बढ़ावा दिया जा रहा है। इसी दिशा में, छत्तीसगढ़ आदिवासी, स्थानीय स्वास्थ्य परंपराएं और औषधीय पादप बोर्ड ने “खेतों की मेड़ पर पैसों का पेड़” नामक एक योजना शुरू की है।
वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्री, केदार कश्यप के निर्देशों के तहत शुरू की गई यह योजना किसानों को शतावरी के पौधे मुफ्त में उपलब्ध कराती है, जिसका उद्देश्य खेतों की उन मेड़ों और सुरक्षा बाड़ों को आय के स्रोत में बदलना है, जिनका अन्यथा कोई उपयोग नहीं होता था।
खेतों की सुरक्षा के साथ-साथ अतिरिक्त कमाई
शतावरी एक कांटेदार औषधीय बेल है जो खेतों की मेड़ों पर लगाए जाने पर किसानों को दोहरा लाभ देती है। इसकी कांटेदार बनावट खेतों को आवारा पशुओं और मवेशियों से बचाने में मदद करती है। साथ ही, उन मेड़ों पर औषधीय फसल उगाकर, जो पहले बंजर पड़ी रहती थीं, किसान अब अतिरिक्त आय अर्जित कर सकते हैं। शतावरी की भरपूर पैदावार किसानों के लिए कमाई का एक मजबूत और दीर्घकालिक स्रोत बन सकती है।
दवा कंपनियों में शतावरी की बढ़ती मांग
अपने औषधीय गुणों के कारण आयुर्वेदिक और हर्बल दवा उद्योगों में शतावरी की मांग लगातार बढ़ रही है। इसकी जड़ों (कंदों) का उपयोग विभिन्न दवाएं बनाने में किया जाता है। इसका मुख्य रूप से उपयोग शारीरिक कमजोरी दूर करने, ताकत बढ़ाने, तनाव कम करने और दूध पिलाने वाली महिलाओं में दूध उत्पादन बढ़ाने के लिए किया जाता है। यही कारण है कि इस पौधे की बाजार में मांग लगातार बनी रहती है और इस बात के प्रबल संकेत हैं कि किसानों को अपनी उपज के लिए लाभकारी मूल्य मिल सकेंगे।

किसानों के लिए मुफ्त पौधे और तकनीकी सहायता
छत्तीसगढ़ जनसंपर्क विभाग के अनुसार, यह योजना किसानों को उनकी विशिष्ट आवश्यकताओं के अनुरूप *शतावरी* के पौधे पूरी तरह से मुफ्त में उपलब्ध कराती है। इस लाभ को प्राप्त करने के लिए, किसानों को औषधीय पादप बोर्ड से संपर्क करना होगा।
इसके अलावा, किसानों को न केवल पौधे मिलेंगे, बल्कि रोपण से लेकर अंतिम कटाई तक की पूरी प्रक्रिया को कवर करने वाला व्यापक तकनीकी मार्गदर्शन और प्रशिक्षण भी मिलेगा। साथ ही, यह सुनिश्चित करने के लिए कि किसानों को अपनी उपज बेचने में कोई कठिनाई न हो, बोर्ड ने पहले ही ऐसे खरीदारों की व्यवस्था कर ली है जो सीधे किसानों से फसल खरीदेंगे।
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फसल 16 महीनों में तैयार हो जाएगी
शतावरी की फसल लगभग 16 महीनों में पककर तैयार हो जाती है। एक बार इसकी खेती शुरू हो जाने के बाद, यह आने वाले कई सालों तक किसानों के लिए नियमित आय का ज़रिया बनी रह सकती है। बोर्ड का मानना है कि खेती की बढ़ती लागत के बीच, किसानों के लिए अतिरिक्त और सुरक्षित कमाई का ज़रिया बनने के लिहाज़ से यह योजना एक बेहतरीन विकल्प साबित होगी।
ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मज़बूती
औषधीय पादप बोर्ड के अध्यक्ष विकास मरकाम ने इस योजना को किसानों के लिए “दूधारू गाय” जितना ही फायदेमंद बताया है। वहीं, बोर्ड के उपाध्यक्ष अंजय शुक्ला ने कहा कि यह पहल किसानों के लिए सुनिश्चित आय पक्की करने की दिशा में एक अहम कदम साबित हो सकती है। यह योजना न सिर्फ़ औषधीय पौधों के संरक्षण को बढ़ावा देगी, बल्कि ग्रामीण इलाकों में आर्थिक गतिविधियों को भी मज़बूती प्रदान करेगी।













