Natural Farming: ‘प्राकृतिक खेती मिशन’ ने कृषि का परिदृश्य बदल दिया है। रासायनिक उर्वरकों और महंगे कीटनाशकों के जाल से बाहर निकलकर किसान अब अपनी ज़मीन पर देसी संसाधनों का इस्तेमाल करके खेती कर रहे हैं। यह बदलाव उन्हें आत्मनिर्भर बनने के लिए सशक्त बना रहा है। उत्तर प्रदेश में प्राकृतिक खेती के लिए समर्पित ज़मीन का रकबा और इसे अपनाने वाले किसानों की संख्या दोनों में काफ़ी बढ़ोतरी हुई है।
उत्तर प्रदेश में 2.60 लाख किसानों की कमाई में काफ़ी बढ़ोतरी हुई है। राज्य सरकार द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार, किसान वर्तमान में विभिन्न प्राकृतिक खेती योजनाओं के तहत सभी 75 ज़िलों में फैले 2,356 क्लस्टर्स में 1.14 लाख हेक्टेयर ज़मीन पर प्राकृतिक खेती कर रहे हैं। इसके अलावा ‘गौ-आधारित प्राकृतिक खेती योजना’ के तहत बुंदेलखंड क्षेत्र के सात ज़िलों में 470 प्राकृतिक खेती क्लस्टर्स वर्तमान में काम कर रहे हैं।
उत्तर प्रदेश में कृषि अब केवल गुज़ारा करने का ज़रिया नहीं रह गई है। यह एक लाभदायक उद्यम में बदल रही है, जिससे कम लागत पर ज़्यादा मुनाफा मिल रहा है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में ‘प्राकृतिक खेती मिशन’ कृषि क्षेत्र को नया रूप दे रहा है। रासायनिक उर्वरकों और महंगे कीटनाशकों के चंगुल से निकलकर, किसान अब खेती के लिए देसी संसाधनों पर निर्भर हैं। यह बदलाव उनकी आत्मनिर्भरता का मार्ग प्रशस्त कर रहा है।
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UP में प्राकृतिक खेती के तहत ज़मीन का रकबा बढ़ा
वर्तमान में राज्य के 75 ज़िलों में, 1.14 लाख हेक्टेयर से ज़्यादा का क्षेत्र जिसमें 2,356 क्लस्टर्स शामिल हैं। प्राकृतिक खेती के दायरे में लाया गया है। इस पहल से सीधे तौर पर 2.60 लाख किसानों को फ़ायदा हो रहा है। महत्वपूर्ण बात यह है कि खेती का यह तरीका न केवल उत्पादन के तरीकों को बदल रहा है। बल्कि यह किसानों की परिचालन लागत को काफ़ी कम करके उनकी आय बढ़ाने के नए रास्ते भी खोल रहा है।

बुंदेलखंड इस अभियान के एक मज़बूत चेहरे के रूप में उभरा
बुंदेलखंड प्राकृतिक खेती अभियान की प्रेरक शक्ति और एक शानदार उदाहरण के रूप में उभरा है। झाँसी, ललितपुर, जालौन, हमीरपुर, महोबा, बांदा और चित्रकूट जैसे ज़िलों में, ‘गाय-आधारित प्राकृतिक खेती’ ने आशा की एक नई किरण जगाई है। बुंदेलखंड क्षेत्र में 23,000 हेक्टेयर से अधिक क्षेत्र में फैली इस पहल ने सूखे और संसाधनों की कमी से जूझ रहे क्षेत्र को विकास के एक नए मॉडल में बदल दिया है। इस पहल से 22,000 किसानों को लाभ हुआ है। गाय-आधारित जीवामृत और घनजीवामृत के उपयोग से खेती की लागत में तेज़ी से कमी आई है और साथ ही फ़सल की गुणवत्ता में भी सुधार हुआ है।
किसान कम लागत पर बेहतर पैदावार हासिल कर रहे हैं
गौ सेवा आयोग के अध्यक्ष श्याम बिहारी गुप्ता का कहना है कि यह मॉडल जिसकी शुरुआत बुंदेलखंड में हुई थी। अब पूरे राज्य के लिए एक मिसाल बन गया है। किसान कम लागत पर बेहतर पैदावार हासिल कर रहे हैं और प्राकृतिक उपज की बढ़ती बाज़ार मांग उनके लिए अतिरिक्त मुनाफ़ा पैदा कर रही है। किसानों पर आर्थिक बोझ कम करते हुए उनकी आय बढ़ाना और जनता को रसायन-मुक्त भोजन उपलब्ध कराना, योगी सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता बनी हुई है।
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रसायनों के विकल्प के रूप में गाय-आधारित खेती
रासायनिक इनपुट के बजाय गाय-आधारित खेती के तरीकों को अपनाकर, किसान धीरे-धीरे आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ रहे हैं। गौ सेवा आयोग के अध्यक्ष श्याम बिहारी गुप्ता ज़ोर देकर कहते हैं कि योगी सरकार की यह पहल न केवल किसानों की आर्थिक स्थिति को मज़बूत कर रही है, बल्कि राज्य को सुरक्षित और पौष्टिक खाद्यान्न के उत्पादन की दिशा में भी आगे बढ़ा रही है।

















