Agriculture

Crisis for farmers: मिडिल-ईस्ट युद्ध ने किसानों की आय पर डाला संकट, बासमती और प्याज की कीमतें गिरीं

Crisis for Farmers

Crisis for farmers: अमेरिका, इज़राइल और ईरान के बीच बढ़ते युद्ध का वैश्विक व्यापार पर गहरा असर पड़ा है। भारत में कई राज्यों से LPG, डीज़ल और पेट्रोल की कमी की खबरें आ रही हैं, या हो सकता है कि आने वाले समय में इनकी कमी हो जाए। हालांकि, ऐसी भी खबरें हैं कि इस कमी का सीधा असर किसानों की जेब पर पड़ रहा है।

इस युद्ध का भारत के कृषि निर्यात पर भी सीधा असर पड़ रहा है, खासकर बासमती चावल और प्याज जैसे मुख्य कृषि उत्पादों के व्यापार पर। मध्य-पूर्व भारत के कृषि उत्पादों के लिए एक बड़ा बाज़ार रहा है, लेकिन युद्ध के कारण समुद्री रास्ते बंद हो गए हैं, बंदरगाहों पर रुकावटें आ गई हैं और लॉजिस्टिक्स से जुड़ी समस्याएं पैदा हो गई हैं। इससे निर्यात रुक गया है और भारतीय बाज़ार में इन उत्पादों की कीमतों में गिरावट आई है। विशेषज्ञों का मानना ​​है कि अगर यह स्थिति लंबे समय तक बनी रही, तो इसका असर किसानों की आय और कृषि अर्थव्यवस्था, दोनों पर पड़ेगा।

 

बासमती चावल के निर्यात पर असर

भारत दुनिया में बासमती चावल का सबसे बड़ा निर्यातक है, और इसका एक बड़ा हिस्सा मध्य-पूर्व के देशों में जाता है। हाल की रिपोर्टों के अनुसार, भारत के बासमती निर्यात का एक बड़ा हिस्सा पश्चिम एशियाई देशों में जाता है, जिनमें मुख्य रूप से ईरान, सऊदी अरब, इराक और संयुक्त अरब अमीरात शामिल हैं।

हालांकि, युद्ध ने समुद्री व्यापार मार्गों को बाधित कर दिया है। जहाज़ रुक गए हैं, और बीमा तथा माल ढुलाई की लागत बढ़ गई है, जिससे निर्यात लगभग ठप हो गया है। अनुमान है कि लगभग 400,000 टन बासमती चावल बंदरगाहों या समुद्री मार्गों में फंसा हुआ है।

Crisis for Farmers

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घरेलू बाज़ार में बासमती की आपूर्ति बढ़ी

निर्यात रुकने के कारण, भारत के घरेलू बाज़ार में बासमती चावल की आपूर्ति बढ़ गई है, जिससे कीमतों में गिरावट आई है। रिपोर्टों के अनुसार, हाल के दिनों में बासमती चावल की कीमतों में लगभग 5 से 6 प्रतिशत की गिरावट आई है।

इसका सीधा असर किसानों और चावल मिल मालिकों पर पड़ रहा है। जिन किसानों ने बासमती चावल की खेती की थी, उन्हें उम्मीद थी कि निर्यात के ज़रिए उन्हें बेहतर कीमतें मिलेंगी, लेकिन अब बाज़ार में मांग कम होने के कारण उन्हें कम कीमतें मिल रही हैं। अगर यह स्थिति लंबे समय तक बनी रही, तो आने वाले सीज़न में बासमती की खेती पर भी असर पड़ सकता है।

 

प्याज के निर्यात पर संकट

युद्ध का असर न सिर्फ बासमती चावल पर पड़ रहा है, बल्कि प्याज के निर्यात पर भी पड़ रहा है। भारत बड़ी मात्रा में प्याज मध्य-पूर्वी देशों को निर्यात करता है, जिसमें दुबई एक प्रमुख व्यापारिक केंद्र है। आंकड़ों के अनुसार, भारत के प्याज निर्यात का लगभग 22 प्रतिशत हिस्सा मध्य-पूर्वी देशों को जाता है।

हालांकि, युद्ध के कारण दुबई और खाड़ी बाजारों में व्यापार काफी धीमा हो गया है। कई जहाजों की आवाजाही रुक गई है, और कंटेनर बंदरगाहों पर फंसे हुए हैं। रिपोर्टों के अनुसार, भारत से भेजे गए प्याज के कई कंटेनर बंदरगाहों पर फंसे हुए हैं, और नए निर्यात सौदे भी रोक दिए गए हैं।

 

घरेलू बाजार में प्याज की आपूर्ति बढ़ गई

निर्यात में रुकावट के कारण घरेलू बाजार में प्याज की आपूर्ति बढ़ गई है। जहां पहले किसानों को प्याज के लिए लगभग 14 से 15 रुपये प्रति किलोग्राम मिलते थे, वहीं अब कई बाजारों में कीमतें गिरकर 9 से 10 रुपये प्रति किलोग्राम हो गई हैं। इसका सबसे अधिक असर महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश और कर्नाटक जैसे राज्यों के प्याज उत्पादक किसानों पर पड़ा है।

 

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किसानों की आय पर बढ़ता दबाव

कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि भारत के कृषि निर्यात का एक बड़ा हिस्सा खाड़ी देशों पर निर्भर करता है। इसलिए, यदि मध्य-पूर्व में युद्ध लंबे समय तक जारी रहता है, तो इसका असर केवल बासमती और प्याज तक ही सीमित नहीं रहेगा, बल्कि अंगूर, अनार, दालों और अन्य कृषि उत्पादों के निर्यात पर भी पड़ सकता है।

जब निर्यात रुक जाता है, तो देश के भीतर उत्पादों की आपूर्ति बढ़ जाती है, जिससे कीमतों में गिरावट आती है। इससे किसानों की आय कम हो जाती है और उनके लिए अपनी लागत निकालना भी मुश्किल हो जाता है। कई किसान पहले से ही मौसम और बढ़ती लागत के कारण मुश्किलों का सामना कर रहे हैं, और अंतरराष्ट्रीय बाजार में आया यह संकट उनकी मुश्किलों को और भी बढ़ा सकता है।

 

भविष्य में क्या हो सकता है इसका असर ?

विशेषज्ञों का मानना ​​है कि यदि युद्ध जल्द ही समाप्त नहीं होता है, तो भारत के कृषि निर्यात क्षेत्र को एक बड़ा झटका लग सकता है। सरकार और निर्यातकों को नए बाजार खोजने होंगे ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि किसानों को बेहतर कीमतें मिलें। बंदरगाहों पर फंसे माल को जल्द से जल्द निकालने और व्यापार को फिर से शुरू करने के लिए कूटनीतिक प्रयासों की भी आवश्यकता होगी।

कुल मिलाकर, मध्य-पूर्व में चल रहा युद्ध केवल एक राजनीतिक या सैन्य संकट नहीं है; वैश्विक खाद्य व्यापार और भारतीय किसानों की आय पर इसका असर भी साफ तौर पर दिखाई दे रहा है। यदि स्थिति जल्द ही सामान्य नहीं होती है, तो आने वाले महीनों में कृषि बाजारों पर इसका असर और भी गहरा हो सकता है।

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