दुनिया के कई हिस्सों में मौसम को लेकर नई चिंता सामने आई है। मौसम वैज्ञानिकों का कहना है कि प्रशांत महासागर में जल्द ही अल नीनो (El Nino) की स्थिति विकसित हो सकती है, जिसका असर वैश्विक मौसम पर पड़ने की आशंका है। विशेषज्ञों के मुताबिक अगर यह चक्र मजबूत होता है तो कई देशों में सूखा, भीषण गर्मी और कृषि संकट जैसी समस्याएं देखने को मिल सकती हैं। सबसे बड़ी चिंता यह है कि इस बार पृथ्वी का औसत तापमान पहले के मुकाबले काफी अधिक है, ऐसे में अल नीनो के प्रभाव और भी गंभीर हो सकते हैं।
संयुक्त राष्ट्र के खाद्य और कृषि संगठन (FAO) ने पिछले कई दशकों के सैटेलाइट आंकड़ों का अध्ययन कर उन क्षेत्रों की पहचान की है जहां सूखे का खतरा सबसे ज्यादा हो सकता है। रिपोर्ट के अनुसार ऐसे कई इलाके पहले से ही गरीबी, खाद्य संकट और संघर्ष जैसी समस्याओं का सामना कर रहे हैं। यदि वहां बारिश सामान्य से कम होती है तो हालात और बिगड़ सकते हैं।
भारत के लिए भी यह चेतावनी महत्वपूर्ण मानी जा रही है। देश की खेती का बड़ा हिस्सा आज भी मानसून पर निर्भर है और अल नीनो का सीधा असर मानसूनी बारिश पर पड़ता है। मौसम विशेषज्ञों का मानना है कि यदि मानसून कमजोर रहता है तो धान और मक्का जैसी खरीफ फसलों की पैदावार प्रभावित हो सकती है। बढ़ती गर्मी के कारण खेतों की नमी पहले ही तेजी से कम हो रही है, ऐसे में बारिश में थोड़ी सी भी कमी किसानों की चिंता बढ़ा सकती है।
सिर्फ भारत ही नहीं, बल्कि पाकिस्तान, म्यांमार, थाईलैंड, वियतनाम, फिलीपींस और इंडोनेशिया जैसे देशों पर भी सूखे का खतरा मंडरा रहा है। ये देश कृषि उत्पादन के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण माने जाते हैं। खासकर वियतनाम और थाईलैंड दुनिया के प्रमुख चावल निर्यातकों में शामिल हैं। यदि यहां उत्पादन प्रभावित होता है तो इसका असर अंतरराष्ट्रीय बाजार पर भी देखने को मिल सकता है और खाद्यान्न कीमतों में बढ़ोतरी हो सकती है।
इस बार किसानों के सामने चुनौती केवल मौसम की नहीं है। खेती की लागत भी लगातार बढ़ रही है। डीजल, उर्वरक और अन्य कृषि संसाधनों की कीमतों में बढ़ोतरी पहले से ही किसानों पर दबाव बना रही है। ऐसे में यदि बारिश कम हुई तो उत्पादन घटने के साथ-साथ लागत का बोझ भी बढ़ेगा। कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि मौसम और बढ़ती लागत की यह दोहरी मार किसानों के लिए मुश्किलें खड़ी कर सकती है।
अफ्रीका के कई देशों को भी लेकर गंभीर आशंकाएं जताई जा रही हैं। साहेल क्षेत्र के देशों में पहले से खाद्य संकट और जल संकट की स्थिति बनी हुई है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि सूखा गहराता है तो लाखों लोगों की आजीविका प्रभावित हो सकती है। इसी तरह मध्य अमेरिका के कुछ हिस्सों में भी सामान्य से काफी कम बारिश का अनुमान लगाया जा रहा है।
हालांकि वैज्ञानिकों का कहना है कि समय रहते तैयारी करके नुकसान को काफी हद तक कम किया जा सकता है। किसानों को मौसम संबंधी सटीक जानकारी, कम पानी में तैयार होने वाली फसलों के बीज और जल संरक्षण की बेहतर व्यवस्था उपलब्ध कराई जाए तो संभावित संकट का असर कम किया जा सकता है। अब नजर इस बात पर रहेगी कि विभिन्न देशों की सरकारें इस चेतावनी को कितनी गंभीरता से लेती हैं और किसानों तक राहत पहुंचाने के लिए कितनी तेजी से कदम उठाती हैं।
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