ऑस्ट्रेलिया, भारत, जापान और अमेरिका के विदेश मंत्री, जिन्हें क्वाड के नाम से जाना जाता है, मंगलवार को नई दिल्ली में इंडो-पैसिफिक स्ट्रेटेजी के बारे में अपने सहयोग को बढ़ाने और इस क्षेत्र में चीन के बढ़ते प्रभाव पर साझा चिंताओं को दूर करने के लिए मिले।
इस मीटिंग में भारत के विदेश मंत्री सुब्रह्मण्यम जयशंकर, अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो, जापानी विदेश मंत्री तोशिमित्सु मोटेगी और ऑस्ट्रेलियाई विदेश मंत्री पेनी वोंग शामिल थे। भारत के विदेश मंत्रालय के अनुसार, एजेंडा में इंडो-पैसिफिक में हाल के डेवलपमेंट और चारों देशों के बीच सहयोग को मजबूत करने के तरीकों पर चर्चा शामिल है।
| देश (Country) | प्रतिनिधित्व (Represented By) | मुख्य पद (Designation) |
| भारत (India) | डॉ. सुब्रह्मण्यम जयशंकर | विदेश मंत्री (External Affairs Minister) |
| अमेरिका (USA) | मार्को रुबियो | विदेश मंत्री (US Secretary of State) |
| जापान (Japan) | तोशिमित्सु मोटेगी | विदेश मंत्री (Foreign Minister of Japan) |
| ऑस्ट्रेलिया (Australia) | पेनी वोंग | विदेश मंत्री (Foreign Minister of Australia) |
| आयोजन स्थल व समय | हैदराबाद हाउस, नई दिल्ली | मई 2026 (मंगलवार) |
इंडो-पैसिफिक बैठक के मुख्य रणनीतिक बिंदु
सख्त कूटनीतिक संदेश: नई दिल्ली में हुई इस बैठक का मुख्य उद्देश्य हिंद-प्रशांत (Indo-Pacific) क्षेत्र में अंतरराष्ट्रीय कानूनों का सम्मान सुनिश्चित करना है। चारों देशों के विदेश मंत्रियों ने एक सुर में कहा कि इस महत्वपूर्ण समुद्री व्यापार मार्ग पर किसी भी एक देश का प्रभुत्व या दबाव स्वीकार नहीं किया जाएगा, जो सीधे तौर पर दक्षिण चीन सागर में चीन की आक्रामक गतिविधियों की ओर इशारा करता है।
भू-राजनीतिक विश्लेषण
यह बैठक ऐसे समय में हो रही है जब वैश्विक स्तर पर कई मोर्चों पर तनाव बढ़ा हुआ है। अमेरिकी विदेश मंत्री के रूप में मार्को रुबियो की भारत यात्रा और क्वाड में उनकी भागीदारी यह दर्शाती है कि वाशिंगटन में नेतृत्व बदलने के बावजूद भारत-अमेरिका रणनीतिक साझेदारी और क्वाड की प्रासंगिकता में कोई कमी नहीं आई है। भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने स्पष्ट किया कि क्वाड का उद्देश्य केवल समस्याओं पर चर्चा करना नहीं, बल्कि आपूर्ति श्रृंखला (Supply Chains), बुनियादी ढांचे और समुद्री सुरक्षा में व्यावहारिक सहयोग को बढ़ाना है।
नई दिल्ली में क्वाड देशों की यह एकजुटता यह साबित करती है कि आने वाले समय में हिंद-प्रशांत क्षेत्र की सुरक्षा और स्वतंत्रता को बनाए रखने के लिए यह कूटनीतिक मंच कितना महत्वपूर्ण होने वाला है।













