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Public Wi-Fi को लेकर छिड़ी बड़ी बहस: Jio-Airtel क्यों कर रहे विरोध, 1.06 लाख करोड़ रुपये के फंड पर क्या है पूरा मामला?

Public Wi-Fi

Public Wi-Fi को लेकर छिड़ी बड़ी बहस: भारत में इंटरनेट कनेक्टिविटी को और बेहतर बनाने के लिए शुरू की गई PM-WANI स्कीम फिर से चर्चा में है। देश भर में मुफ़्त या सस्ते पब्लिक वाई-फ़ाई हॉटस्पॉट लगाने की योजना को लेकर टेलीकॉम कंपनियों, टेक फ़र्मों और सैटेलाइट इंटरनेट सर्विस प्रोवाइडर्स के बीच मतभेद सामने आए हैं।

इस विवाद के केंद्र में ₹1.06 लाख करोड़ का एक फंड है, जिसका मकसद डिजिटल कनेक्टिविटी को बढ़ावा देना है। अब सवाल यह है कि क्या इस फंड का इस्तेमाल पब्लिक वाई-फ़ाई का विस्तार करने के लिए किया जाना चाहिए या मोबाइल नेटवर्क को मज़बूत करने के लिए।

PM-WANI स्कीम क्या है?

PM-WANI (प्राइम मिनिस्टर वाई-फ़ाई एक्सेस नेटवर्क इंटरफ़ेस) स्कीम का मकसद देश भर में लाखों पब्लिक वाई-फ़ाई हॉटस्पॉट बनाना है, ताकि लोगों को सस्ता और आसान इंटरनेट एक्सेस मिल सके।

PM-WANI स्कीम

इस स्कीम के तहत छोटी दुकानों, कैफ़े, रेलवे स्टेशनों, बस स्टैंड और दूसरी सार्वजनिक जगहों पर वाई-फ़ाई सर्विस उपलब्ध कराई जा सकती है। सरकार ने 2030 तक लगभग 50 मिलियन (5 करोड़) वाई-फ़ाई हॉटस्पॉट बनाने का लक्ष्य रखा था। हालांकि, स्कीम शुरू होने के कई साल बाद भी उम्मीद के मुताबिक प्रगति नहीं हुई है; अब तक सिर्फ़ 4.10 लाख हॉटस्पॉट ही लगाए गए हैं।

टेलीकॉम कंपनियाँ इसका विरोध क्यों कर रही हैं?

Jio, Airtel और Vodafone Idea जैसी कंपनियों का मानना ​​है कि पब्लिक वाई-फ़ाई पर भारी खर्च करने की कोई ज़रूरत नहीं है। उनका तर्क है कि भारत में 4G और 5G डेटा पहले से ही दुनिया के सबसे सस्ते इंटरनेट विकल्पों में से हैं। इसलिए, एक अलग, बड़े पैमाने पर वाई-फ़ाई नेटवर्क बनाने की ज़रूरत कम हो गई है।

इसके अलावा, टेलीकॉम कंपनियाँ यह भी बताती हैं कि जिस फंड की बात हो रही है, उसमें उनका अपना योगदान भी शामिल है। इसलिए, वे नहीं चाहतीं कि उनके योगदान का इस्तेमाल ऐसी सर्विस के लिए किया जाए जो भविष्य में उनके लिए कॉम्पिटिशन पैदा कर सकती हैं। इन कंपनियों का यह भी मानना ​​है कि फंड का इस्तेमाल मोबाइल नेटवर्क टावर लगाने और ग्रामीण व दूर-दराज़ के इलाकों में नेटवर्क कवरेज बढ़ाने के लिए किया जाना चाहिए।

Public Wi-Fi का समर्थन कौन करता है?

दूसरी ओर, कई टेक कंपनियाँ और इंटरनेट सेक्टर से जुड़ी संस्थाएँ पब्लिक वाई-फ़ाई को ज़रूरी मानती हैं। उनका तर्क है कि ज़्यादातर इंटरनेट का इस्तेमाल घरों, ऑफ़िसों और इमारतों के अंदर होता है, जहाँ मोबाइल नेटवर्क सिग्नल अक्सर कमज़ोर हो सकते हैं। ऐसे हालात में वाई-फ़ाई बेहतर और ज़्यादा स्थिर इंटरनेट अनुभव दे सकती है। जानकारों का यह भी मानना ​​है कि लंबे समय में मोबाइल डेटा के मुकाबले फाइबर-बेस्ड वाई-फाई नेटवर्क ज़्यादा किफायती साबित हो सकते हैं।

सैटेलाइट इंटरनेट कंपनियाँ क्या चाहती हैं?

सैटेलाइट इंटरनेट सेवाएँ देने वाली कंपनियाँ चाहती हैं कि इस फंड का इस्तेमाल दूर-दराज़ और ग्रामीण इलाकों में इंटरनेट कनेक्टिविटी पहुँचाने के लिए किया जाए। उनका मानना ​​है कि जिन जगहों पर मोबाइल टावर लगाना मुश्किल है, वहाँ सैटेलाइट टेक्नोलॉजी और वाई-फाई नेटवर्क का मिला-जुला इस्तेमाल करके बेहतर तरीके से इंटरनेट सुविधा दी जा सकती है।

आगे क्या होगा?

जानकारों का मानना ​​है कि Public Wi-Fi को लेकर छिड़ी बड़ी बहस: और मोबाइल नेटवर्क, दोनों की अपनी-अपनी भूमिका है। जहाँ मोबाइल इंटरनेट चलते-फिरते लोगों को कनेक्टिविटी देता है, वहीं वाई-फाई नेटवर्क घरों और सार्वजनिक जगहों पर बेहतर स्पीड और स्टेबिलिटी दे सकता है।

अब सरकार और रेगुलेटरी संस्थाओं को यह तय करना होगा कि ₹1.06 लाख करोड़ के फंड का इस्तेमाल कैसे किया जाए, ताकि देश के हर नागरिक तक तेज़ और आसानी से मिलने वाला इंटरनेट पहुँच सके। आखिरकार, पब्लिक वाई-फाई को लेकर चल रही बहस भारत के डिजिटल भविष्य की दिशा तय कर सकती है।

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