कैंसर के मरीजों की ही तरह रेडिएशन से होगा कोरोना संक्रमित के फेफड़ों का इलाज  

बड़े पैमाने पर उपयोग हुए स्टीयरॉइड और बिना चिकित्सीय सलाह के ली गई ऑक्सीजन ने म्यूकोरमाइकोसिस का खतरा भी बड़ा दिया, लेकिन अब देश के वरिष्ठ चिकित्सा विशेषज्ञ फेफड़ाें के संक्रमित होने पर एक नए इलाज को ही खोज रहे हैं। इस इलाज में न रेमडिसिविर की जरूरत होगी और न ही मेड्रॉल जैसे स्टीयरॉइड की।

कैंसर के मरीजों की ही तरह रेडिएशन से होगा कोरोना संक्रमित के फेफड़ों का इलाज  

कोरोना की दूसरी लहर ने पूरे देश में हाहाकार मचा दिया था। इस दौरान पूरे देश में कोविड मरीजों की बड़े पैमाने पर मौत हुई। क्योंकि बड़ी संख्या में आए मरीजों के कारण देश में दवाओं की कमी हो गई थी। वहीं डायबिटीज के मरीजों को समय पर दवाएं न मिलने के कारण बड़ी संख्या में डायबिटिक पेशेंट्स की मौत हुई।

इसके अलावा इस बार बड़े पैमाने पर उपयोग हुए स्टीयरॉइड और बिना चिकित्सीय सलाह के ली गई ऑक्सीजन ने म्यूकोरमाइकोसिस का खतरा भी बड़ा दिया, लेकिन अब देश के वरिष्ठ चिकित्सा विशेषज्ञ फेफड़ाें के संक्रमित होने पर एक नए इलाज को ही खोज रहे हैं। इस इलाज में न रेमडिसिविर की जरूरत होगी और न ही मेड्रॉल जैसे स्टीयरॉइड की।

पिछले साल से ही ओहियो स्टेट यूनिवर्सिटी में चल रहे हैं शोध : 
दरअसल कोलंबस, यूनाइटेड स्टेट्स स्थित द ओहियो स्टेट यूनिवर्सिटी (The Ohio State University) में किए गए एक शोध के मुताबिक फेफड़ों में संक्रमण को कम करने के लिए सीने में दिया गया लो डोज चेस्ट रेडिएशन (Low Dose chest Radiation) फिलहाल एकमात्र ऐसे उपाय के रूप में सामने आ रहा है, जिन्हें गंभीर रूप से बीमार मरीजों को देने पर कोविड-19 के कारण फेफड़ों में हुई सूजन को कम किया जा सकता है। 

इस उपचार के बाद देखा गया कि वेंटिलेटर सपोर्ट पर जीवित मरीजों का वेंटिलेटर हटा दिया गया। या उन्हें वेंटिलेटर की जरूरत ही नहीं पड़ी। बीमारी पर विजय हासिल करने के लिए इस तरह के परीक्षण जून 2020 से ही यूएस और अन्य देशों में जारी हैं।  


"साइटोकाइन स्टॉर्म" को कम करता है रेडिएशन : 
यूनिवर्सिटी में रेडिएशन एंड ऑन्कोलॉजी डिपार्टमेंट के एचओडी प्रोफेसर अर्नब चक्रवती, एमडी (Arnab Chakravarti, MD) की मानें तो रे
डिएशन ट्रीटमेंट कोविड के दौरान इम्मयून सिस्टम के ओवररिएक्शन जिसे "साइटोकाइन स्टॉर्म" (cytokine storm) कहा जाता है, उसे तेजी से कम करने का काम करता है। इसी "साइटोकाइन स्टॉर्म" के कारण ही पेशेंट के फेफड़ों में न्यूमोनिया हो जाता है।

"साइटोकाइन स्टॉर्म" में, शरीर वायरस से लड़ने के बजाय अपनी कोशिकाओं और ऊतकों पर हमला करना शुरू कर देता है। परिणाम स्वरूप पेशेंट की मौत हो जाती है।

दिल्ली एम्स के बाद अब गुजरात में शुरू होगा यह परिक्षण : 
दिल्ली एम्स (Delhi Aiims) में विगत दिनों इस ट्रीटमेंट का सफल इलाज किया गया है। साथ ही इस ट्रीटमेंट के बाद फंगल इन्फेक्शन होने की आशंका भी बहुत कम हो जाएगी। इस थैरेपी में कैंसर की ही तरह रेडिएशन दिया जाता है। लेकिन इसकी मात्रा बहुत कम होती है।मात्र 40 सेकेंड के लो डोज रेडिएशन को लेने से "साइटोकाइन स्टॉर्म"  का खतरा कम हो जाता है।

लो डोज रेडिएशन इन्फ्लामेंट्री सेल की सक्रियता को कम कर देती है। दिल्ली और पटना एम्स में परिक्षण के दौरान पाया गया कि इस थैरेपी को लेने के बाद मरीजों में एक हफ्ते बाद ही 80 प्रतिशत तक सुधार देखा गया।

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