Impact of Iran-US war on India’s economy: ईरान और अमेरिका के बीच लंबे समय से जारी तनाव और संघर्ष का असर अब पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था पर दिखाई देने लगा है। दोनों देशों के बीच कई बार संघर्ष विराम (Ceasefire) की खबरें आईं, लेकिन स्थिति अब भी गंभीर बनी हुई है। इस तनाव का सबसे बड़ा असर भारत जैसे देशों पर पड़ रहा है, जो कच्चे तेल के लिए विदेशों पर काफी हद तक निर्भर हैं।
भारत में क्यों बढ़ रही है महंगाई?
भारत में रोजमर्रा की जरूरत की लगभग हर चीज महंगी होती जा रही है। चावल, दाल, आटा, चीनी, नमक, खाद्य तेल, दूध, चाय पत्ती, साबुन, टूथपेस्ट से लेकर पेट्रोल और डीजल तक के दाम लगातार बढ़ रहे हैं। इसकी सबसे बड़ी वजह कच्चे तेल की आपूर्ति में आने वाली बाधा मानी जा रही है।

ईरान से आने वाले कच्चे तेल का एक बड़ा हिस्सा स्ट्रेट ऑफ होर्मुज (Strait of Hormuz) रास्ते से होकर गुजरता है। यह दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल व्यापार मार्गों में से एक है। यदि इस मार्ग पर तनाव बढ़ता है या आवाजाही प्रभावित होती है, तो तेल की कीमतों में तेजी आना तय माना जाता है। इसका सीधा असर भारत की अर्थव्यवस्था और आम जनता की जेब पर पड़ता है।
आम नागरिकों पर बढ़ रहा आर्थिक दबाव
तेल की कीमतें बढ़ने से ट्रांसपोर्टेशन महंगा होता है, जिसका असर हर सामान की लागत पर पड़ता है। इससे बाजार में महंगाई तेजी से बढ़ती है। लगातार बढ़ती कीमतों के कारण आम लोगों की बचत कम हो रही है और आर्थिक दबाव बढ़ता जा रहा है।
मानना है कि यदि अंतरराष्ट्रीय तनाव लंबे समय तक जारी रहा, तो आने वाले समय में भारत में आर्थिक संकट और बेरोजगारी जैसी समस्याएं भी बढ़ सकती हैं। ट्रांसपोर्ट, व्यापार और छोटे कारोबारों पर इसका गहरा असर पड़ सकता है।
क्या भारत अभी भी विदेशों पर ज्यादा निर्भर है?

ईरान-अमेरिका तनाव ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि भारत ऊर्जा के मामले में अब भी विदेशों पर कितना निर्भर है। देश को आजाद हुए कई दशक बीत चुके हैं, लेकिन आज भी भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा कच्चे तेल के आयात से पूरा करता है।
कई सरकारें आईं और गईं, लेकिन ऊर्जा आत्मनिर्भरता को लेकर बड़े स्तर पर ठोस बदलाव अभी तक सीमित ही दिखाई देते हैं। सरकारों ने समय-समय पर कई जनकल्याण योजनाएं शुरू कीं, जिन पर हजारों करोड़ रुपये खर्च किए जा रहे हैं।
सरकारी योजनाओं पर भारी खर्च

मध्य प्रदेश में चल रही “मुख्यमंत्री लाड़ली बहना योजना” के तहत महिलाओं को हर महीने आर्थिक सहायता दी जाती है। वर्ष 2025-26 के बजट में इस योजना के लिए लगभग ₹18,669 करोड़ का प्रावधान किया गया है।
वहीं महाराष्ट्र सरकार की “मुख्यमंत्री माझी लाडकी बहिण योजना” के अंतर्गत पात्र महिलाओं को ₹1500 प्रतिमाह सहायता दी जा रही है। राज्य सरकार ने 2025-26 के बजट में इस योजना के लिए करीब ₹36,000 करोड़ आवंटित किए हैं।
ऐसी कई अन्य योजनाओं पर भी सरकारें बड़े स्तर पर खर्च कर रही हैं। हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि देश को लंबे समय में आत्मनिर्भर बनाने के लिए ऊर्जा, उत्पादन और रोजगार जैसे क्षेत्रों में निवेश बढ़ाना भी जरूरी है।
भारत पर कितना है कुल सरकारी कर्ज?
वर्ष 2025 तक भारत पर कुल सरकारी कर्ज (केंद्र और राज्य सरकारों सहित) लगभग ₹205 लाख करोड़ से अधिक अनुमानित है, जो देश की GDP का करीब 82% माना जा रहा है। इसमें केंद्र सरकार का कर्ज लगभग ₹181 लाख करोड़ है, जबकि राज्य सरकारों का कुल कर्ज करीब ₹24–28 लाख करोड़ के बीच है। यदि इसे देश की कुल जनसंख्या के आधार पर देखा जाए, तो औसतन हर भारतीय नागरिक पर लगभग ₹1.4 से ₹1.5 लाख का सरकारी कर्ज बैठता है।
| वित्त वर्ष | कुल आयात (मिलियन टन / MMT) | आयात निर्भरता (%) | अनुमानित आयात बिल (USD) | मुख्य सप्लायर देश |
| 2020–21 | ~196 MMT | ~85% | ~$100–110 अरब | इराक, सऊदी अरब, UAE, USA |
| 2021–22 | ~212 MMT | ~87% | ~$120 अरब | इराक, सऊदी अरब, UAE, रूस |
| 2022–23 | ~232.7 MMT | ~88% | ~$150–157 अरब | रूस, इराक, सऊदी अरब |
| 2023–24 | ~233–234 MMT | ~88.6% | ~$145–150 अरब | रूस, इराक, सऊदी अरब, UAE |
| 2024–25 | ~242.4 MMT | ~89.1% | ~$160–161 अरब | रूस, इराक, सऊदी अरब, UAE, USA |
भारत अपनी लगभग 88–89% कच्चे तेल की जरूरत आयात से पूरी करता है।
2024–25 में आयात बढ़कर लगभग 242 मिलियन टन पहुंच गया।
सबसे बड़े सप्लायर: रूस, इराक, सऊदी अरब, UAE
भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल आयातक देश है।
भारत इतना कर्ज क्यों लेता है?
सरकार विभिन्न विकास कार्यों और योजनाओं के लिए कर्ज लेती है। इसमें शामिल हैं:
- सड़क, रेलवे और एयरपोर्ट जैसे इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट
- मुफ्त राशन और सरकारी योजनाएं
- रक्षा बजट
- सब्सिडी
- राज्यों को आर्थिक सहायता
- पुराने कर्ज का ब्याज भुगतान
भारत की Debt-to-GDP Ratio फिलहाल लगभग 82% बताई जा रही है। यह कई बड़े देशों की तुलना में कम मानी जाती है, लेकिन लगातार बढ़ता कर्ज सरकार के लिए एक बड़ी चुनौती भी बनता जा रहा है।
ईरान और अमेरिका के बीच जारी तनाव ने पूरी दुनिया को यह दिखा दिया है कि वैश्विक संघर्ष का असर आम लोगों की जिंदगी पर कितनी तेजी से पड़ता है। भारत जैसे विकासशील देश के लिए यह समय आत्मनिर्भरता, ऊर्जा सुरक्षा और आर्थिक संतुलन पर गंभीरता से काम करने का है।
आने वाले वर्षों में यदि भारत अपनी विदेशी निर्भरता कम करने में सफल होता है, तो ऐसी वैश्विक परिस्थितियों का असर आम जनता पर कम किया जा सकता है।













