Multicropping Farming : आज के दौर में खेती के तरीकों में तेज़ी से बदलाव आ रहा है। अब किसान एक ही तरह की खेती पर निर्भर नहीं रहते हैं, बल्कि एक ही खेत में एक साथ कई फसलें उगाकर तगड़ा मुनाफा कमा रहे हैं। ऐसा ही कुछ कर दिखाया है मध्य प्रदेश के सीधी ज़िले के किसान ने। यह किसान अब खुद को पारंपरिक फसलों तक ही सीमित नहीं रख रहे हैं, बल्कि वे नई और आधुनिक तकनीकों को अपना रहे हैं। ऐसा ही एक तरीका है इंटरक्रॉपिंग जिसे मल्टी-क्रॉपिंग भी कहा जाता है। इस तरीके से किसान एक ही खेत में एक साथ कई फसलें उगाकर ज़मीन का ज़्यादा से ज़्यादा इस्तेमाल कर रहे हैं।
इस बदलाव का सकारात्मक असर उनकी आमदनी के स्तर पर साफ़ दिखाई दे रहा है। जहाँ पहले वे सिर्फ़ एक फसल पर निर्भर रहते थे, वहीं अब उनके पास अलग-अलग तरह की फसलों से लगातार आमदनी कमाने का मौका है। यह तकनीक एक ही खेत में कई फसलें उगाने की सुविधा देकर ज़्यादा पैदावार और ज़्यादा मुनाफ़ा देती है। बहुत कम निवेश के साथ, एक ही मौसम में ₹1.5 से ₹2 लाख तक कमाना मुमकिन है, जिससे आमदनी का लगातार प्रवाह बना रहता है।
ज़्यादा पैदावार और बेहतर मुनाफ़े की संभावना
कम लागत पर ज़्यादा पैदावार और बेहतर मुनाफ़े की संभावना के कारण, यह तकनीक किसानों के बीच तेज़ी से लोकप्रिय हो रही है। नतीजतन, कई किसान अब अपनी आर्थिक स्थिति को मज़बूत करने के लिए इस तरीके को अपना रहे हैं।

एक खेत में कई फसलें, ज़्यादा कमाई
किसान अब एक ही खेत में कई फसलें उगा रहे हैं। उदाहरण के लिए, भिंडी को मुख्य फसल के तौर पर उगाया जाता है, जिसके साथ-साथ मूली, चुकंदर, पालक और धनिया भी उगाए जाते हैं। इससे ज़मीन का सबसे अच्छा इस्तेमाल सुनिश्चित होता है और कुल पैदावार बढ़ती है।
स्मार्ट खेती के तरीके
इस तकनीक में, फसलों को उनकी खास ज़रूरतों के हिसाब से अलग-अलग गहराई पर लगाया जाता है। उदाहरण के लिए, मूली ज़मीन की सतह के नीचे उगती है, जबकि पालक और धनिया ऊपरी सतह पर उगते हैं। इससे मिट्टी के पोषक तत्वों का ज़्यादा असरदार तरीके से इस्तेमाल हो पाता है।
कम लागत पर ज़्यादा मुनाफ़ा
इस तरीके से एक *बीघा* ज़मीन पर खेती करने की लागत लगभग ₹20,000 से ₹25,000 आती है। सही देखभाल और प्रबंधन के साथ, किसान एक ही मौसम में ₹1.5 से ₹2 लाख तक कमा सकते हैं।
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अलग-अलग समय पर कटाई
खेती के इस तरीके की एक खास बात यह है कि अलग-अलग फसलें अलग-अलग समय पर पकती हैं। मूली 25–30 दिनों में, धनिया 30 दिनों में और पालक 30–35 दिनों में कटाई के लिए तैयार हो जाती है। इससे किसानों को लगातार आमदनी होती रहती है।
कम जोखिम, ज़्यादा मुनाफ़ा
अगर किसी एक फसल की कीमत गिर जाती है, तो दूसरी फसल उस नुकसान की भरपाई कर देती है। इसी वजह से, खेती का यह तरीका अब एक बेहतरीन विकल्प बनता जा रहा है, जिसमें जोखिम कम होता है और मुनाफ़ा ज़्यादा।
















