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कड़वी फसल: कृषि क्षेत्र में बढ़ते NPA बन रहे हैं गंभीर चिंता

कड़वी फसल_ कृषि क्षेत्र में बढ़ते NPA बन रहे हैं गंभीर चिंता (1)

कई वर्षों की चुनौतियों के बाद भारत की बैंकिंग व्यवस्था मजबूत स्थिति में दिखाई देती है, लेकिन आंकड़ों के भीतर झांकने पर कृषि क्षेत्र की तस्वीर चिंता बढ़ाने वाली नजर आती है।

RBI रिपोर्ट में क्या कहती है कृषि क्षेत्र की स्थिति

भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) की 31 दिसंबर को जारी अर्धवार्षिक वित्तीय स्थिरता रिपोर्ट (FSR) के अनुसार, सितंबर 2025 तक बैंकों के कुल ऋण में ग्रॉस एनपीए घटकर 2.2 प्रतिशत रह गए हैं। यह पिछले एक दशक का सबसे निचला स्तर है और बैंकिंग सेक्टर की बेहतर होती सेहत को दर्शाता है। हालांकि, इस सकारात्मक आंकड़े के पीछे कृषि क्षेत्र की एक अलग और गंभीर कहानी छिपी हुई है।

कृषि क्षेत्र में NPA क्यों बन रहा है बड़ी समस्या

FSR के आंकड़े बताते हैं कि सभी क्षेत्रों में कृषि क्षेत्र का खराब कर्ज (NPA) सबसे अधिक है और इसका हिस्सा लगातार बढ़ रहा है। सबसे चिंताजनक बात यह है कि कुल बैंक ऋण में कृषि का हिस्सा कम है, लेकिन एनपीए में उसका हिस्सा कहीं ज्यादा है।

इसका साफ मतलब है कि खेती से जुड़े कर्ज अन्य क्षेत्रों की तुलना में कहीं तेजी से डिफॉल्ट में बदल रहे हैं। यह स्थिति सिर्फ कर्ज के विस्तार का नतीजा नहीं, बल्कि लंबे समय से चली आ रही संरचनात्मक समस्याओं की ओर इशारा करती है।

मिट्टी की सेहत और किसानों की बढ़ती परेशानी

इसी बीच महाराष्ट्र के राज्यपाल आचार्य देवव्रत ने कृषि संकट के एक अहम कारण पर प्रकाश डाला — रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों का अत्यधिक उपयोग। मोहाडी में किसानों को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि वर्षों से रसायनों के अंधाधुंध इस्तेमाल ने मिट्टी की सेहत को गंभीर नुकसान पहुंचाया है। इससे मिट्टी में मौजूद लाभकारी सूक्ष्म जीव नष्ट हो गए हैं, जल धारण क्षमता घटी है और किसानों के स्वास्थ्य पर भी खतरा बढ़ा है। मिट्टी की उर्वरता कम होने से पैदावार घटती है, लागत बढ़ती है और किसान कम आय व बढ़ते कर्ज के दुष्चक्र में फंसते चले जाते हैं।

प्राकृतिक खेती को समाधान क्यों माना जा रहा है

राज्यपाल देवव्रत ने प्राकृतिक और पारंपरिक जैविक खेती को भारतीय कृषि का दीर्घकालिक समाधान बताया। उनका कहना है कि रसायन मुक्त खेती न केवल मिट्टी की सेहत सुधारती है, बल्कि लागत भी घटाती है और किसानों को कर्ज के दबाव से राहत देती है।

उन्होंने पशुपालन को खेती का अहम हिस्सा बताते हुए कहा कि इससे जरूरी जैविक संसाधन मिलते हैं। साथ ही, किसानों को रसायन आधारित खेती से बाहर निकलने के दौरान सरकारी और संस्थागत सहयोग देने पर भी जोर दिया।

गुजरात के डांग जिले का उदाहरण देते हुए उन्होंने उम्मीद जताई कि महाराष्ट्र में भी प्राकृतिक खेती बड़े स्तर पर अपनाई जा सकती है।

कृषि संकट का बैंकिंग सिस्टम पर असर

कृषि क्षेत्र में बढ़ते एनपीए केवल किसानों की समस्या नहीं हैं, बल्कि यह बैंकिंग सिस्टम के लिए भी खतरे की घंटी है। खराब मिट्टी, जलवायु अनिश्चितता, बढ़ती लागत और अस्थिर आय के कारण किसानों के लिए कर्ज चुकाना मुश्किल होता जा रहा है।

अगर इन बुनियादी समस्याओं का समाधान नहीं किया गया, तो बैंकिंग सेक्टर की मौजूदा मजबूती के बावजूद ग्रामीण कर्ज संकट गहराता जा सकता है

भले ही भारत का बैंकिंग सिस्टम आज पहले से कहीं ज्यादा मजबूत दिख रहा हो, लेकिन कृषि क्षेत्र में बढ़ता खराब कर्ज एक साफ चेतावनी है। मिट्टी के क्षरण को रोकना, टिकाऊ खेती को बढ़ावा देना और किसानों की आय को स्थिर करना अब अनिवार्य हो गया है।

प्राकृतिक खेती और सतत कृषि मॉडल न केवल किसानों के भविष्य को सुरक्षित कर सकते हैं, बल्कि देश की दीर्घकालिक वित्तीय स्थिरता के लिए भी अहम भूमिका निभा सकते हैं।

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