भारत में नेचुरल फार्मिंग (प्राकृतिक खेती) को बढ़ावा देने के लिए शुरू की गई सरकारी पहल अब एक अहम मोड़ पर आ खड़ी हुई है। महज चार महीने पहले जारी हुए नेचुरल फार्मिंग सर्टिफिकेशन गाइडलाइंस के बाद से ही यह योजना धीरे-धीरे एक लक्ष्य-पूर्ति की दौड़ में बदलती नजर आ रही है। सर्टिफिकेशन से जुड़े क्षेत्रीय परिषदों (Regional Councils) का कहना है कि उन पर बिना पर्याप्त फंडिंग के हजारों किसानों को जल्द से जल्द सर्टिफाई करने का दबाव बनाया जा रहा है, जिससे पूरे सिस्टम की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े हो रहे हैं।
चार महीने में हजारों किसान, कैसे होगा संभव?
सरकार ने हाल ही में एक सर्कुलर जारी कर क्षेत्रीय परिषदों को निर्देश दिया कि वे छह महीने के भीतर 5,000 से 10,000 गैर-योजना किसानों (जो किसी सरकारी स्कीम में शामिल नहीं हैं) को ऑर्गेनिक या नेचुरल फार्मिंग के तहत रजिस्टर करें। सर्कुलर में यह भी कहा गया कि यदि ये लक्ष्य पूरे नहीं हुए, तो परिषदों की परफॉर्मेंस की समीक्षा होगी और जरूरत पड़ने पर उनकी मान्यता तक रद्द की जा सकती है।
समस्या यह है कि जिस सर्टिफिकेशन फ्रेमवर्क पर यह पूरा मिशन आधारित है, उसे अगस्त में ही अंतिम रूप दिया गया था। इसके बावजूद अक्टूबर से ही परिषदों पर आंकड़े दिखाने का दबाव बनने लगा। कई राज्यों में काम कर रही परिषदों का कहना है कि नेशनल सेंटर ऑफ ऑर्गेनिक एंड नेचुरल फार्मिंग (NCONF) लगातार उनसे ज्यादा से ज्यादा किसानों को सर्टिफाई करने को कह रहा है।
सर्टिफिकेशन कोई फॉर्मैलिटी नहीं, भरोसे की प्रक्रिया है

क्षेत्रीय परिषदों का साफ कहना है कि नेचुरल फार्मिंग का सर्टिफिकेशन सिर्फ ऑनलाइन डेटा भरने का काम नहीं है। इसमें किसानों को ट्रेनिंग देना, मानकों की समझ बनाना, बार-बार खेतों का निरीक्षण करना और स्थानीय किसान समूहों के जरिए पीयर रिव्यू करना शामिल है। यह पूरी प्रक्रिया समय और विश्वास पर आधारित होती है।
सिक्सटीन डोड्डी ट्रस्ट से जुड़ी विशालाक्षी पद्मनाभम बताती हैं कि कुछ महीने पहले 50,000 किसानों को जोड़ने की होड़ मच गई थी। यहां तक कि व्हाट्सएप ग्रुप्स में धमकी भरे मैसेज आए कि जो परिषद 5,000 किसान नहीं जोड़ पाएगी, उसे हटा दिया जाएगा। उनके संगठन ने इस जल्दबाजी में हिस्सा लेने से इनकार कर दिया क्योंकि उनके मुताबिक बिना किसानों की स्पष्ट सहमति और सही जांच के सर्टिफिकेट देना सिस्टम को कमजोर करेगा।
बिना फंडिंग के लक्ष्य, कैसे टिकेगा सिस्टम?
सबसे बड़ी चिंता फंडिंग को लेकर है। परिषदों से कहा जा रहा है कि वे गैर-योजना किसानों का सर्टिफिकेशन अपने खर्च पर करें। जबकि सर्टिफिकेशन की लागत कम नहीं होती। परिषदों के अनुसार, एक किसान पर सालाना खर्च 500 से 700 रुपये, या प्रति हेक्टेयर 1,500 से 2,000 रुपये तक आता है। इसमें स्टाफ सैलरी, खेतों के दौरे, ट्रेनिंग, डॉक्यूमेंटेशन और कई बार मिट्टी व अवशेष जांच जैसे खर्च शामिल हैं।
कुछ परिषदों ने बताया कि उन्हें अभी तक वह फंड मिला ही नहीं है, जिसकी बात मिशन के तहत कही गई थी। नेशनल मिशन ऑन नेचुरल फार्मिंग (NMNF) के तहत 2,481 करोड़ रुपये का बजट तय है, जिसमें केंद्र और राज्य का हिस्सा 60:40 होना था। लेकिन कई राज्यों ने अभी तक अपना 40 प्रतिशत हिस्सा जारी ही नहीं किया है।
छोटे संगठनों पर बढ़ता आर्थिक बोझ
गुजरात और उत्तराखंड जैसे राज्यों में काम कर रहे छोटे गैर-लाभकारी संगठनों का कहना है कि वे लंबे समय तक यह खर्च खुद नहीं उठा सकते। गुजरात की श्रृष्टि ऑर्गेनिक्स के निदेशक फ्रांसिस मैकवान बताते हैं कि उनकी संस्था को पिछले साल 4.5 लाख रुपये का नुकसान उठाना पड़ा। वे ज्यादातर अनुसूचित जाति, जनजाति और महिला किसानों के साथ काम करते हैं, जिनसे अतिरिक्त शुल्क लेना संभव नहीं होता।
योजना के डिजाइन और अमल में खामियां
विशेषज्ञों का मानना है कि यह दबाव केवल लक्ष्य का नहीं, बल्कि योजना के जल्दबाजी में लागू होने का नतीजा है। सेंटर फॉर सस्टेनेबल एग्रीकल्चर (CSA) के जी. वी. रमणजनेयुलु के अनुसार, मिशन को चरणबद्ध तरीके से लागू किया जाना था। राज्य सरकारों को किसानों की पहचान करनी थी, MANAGE को ट्रेनिंग देनी थी और कृषि सखियों के जरिए जमीनी स्तर पर काम होना था। लेकिन कई राज्यों में यह प्रक्रिया अधूरी ही रह गई।
इसके अलावा, अब तक यह भी साफ नहीं है कि नेचुरल फार्मिंग की परिभाषा क्या होगी—क्या यह केवल देसी गाय आधारित होगी या सभी गैर-रासायनिक पद्धतियों को इसमें शामिल किया जाएगा।
विशेषज्ञों की चेतावनी: सिस्टम की साख खतरे में
22 दिसंबर 2025 को देश के कई वरिष्ठ वैज्ञानिकों और प्राकृतिक खेती से जुड़े विशेषज्ञों ने NCONF के निदेशक को पत्र लिखकर चिंता जताई। पत्र में कहा गया कि जल्दबाजी में बिना सही फील्ड वेरिफिकेशन के सर्टिफिकेट जारी किए जा रहे हैं, जिससे PGS सिस्टम की मूल भावना—भरोसा, सामुदायिक भागीदारी और पारदर्शिता—कमजोर हो रही है। उन्होंने भ्रष्टाचार और शॉर्टकट कल्चर के खतरे की भी चेतावनी दी।
संख्या नहीं, गुणवत्ता हो प्राथमिकता

नेचुरल फार्मिंग भारत के कृषि भविष्य के लिए बेहद अहम है, लेकिन अगर सर्टिफिकेशन सिर्फ आंकड़े दिखाने का जरिया बन गया, तो इससे किसानों और उपभोक्ताओं दोनों का भरोसा टूट सकता है। जरूरत इस बात की है कि सरकार लक्ष्य से पहले जमीन पर तैयारी, फंडिंग और प्रशिक्षण को मजबूत करे। वरना प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने की यह अच्छी पहल खुद अपने ही बोझ तले दब सकती है।
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