Bihar Elections 2025: बिहार विधान सभा चुनाव के परिणामों में एनडीए को 200 से अधिक सीटों के साथ उम्मीद से कहीं ज्यादा बंपर जीत मिली है। वहीं, महागठबंधन को महज 35 सीटों पर संतोष करना पड़ा है। लेकिन इस तरह के चुनाव परिणामों के बाद प्रशांत किशोर की नई नवेली जन सुराज पार्टी के प्रदर्शन को लेकर न सिर्फ चुनाव विश्लेषकों के बीच बड़ी चर्चा है, बल्कि आम लोग भी यह जानने को उत्सुक हैं कि आखिर उनके बड़े-बड़े दावे क्यों धराशायी हो गए। हम भी आज बात प्रशांत किशोर और उनकी पार्टी को लेकर ही करेंगे।
Bihar Elections 2025: जन सुराज का प्रदर्शन कैसा रहा?

चुनाव परिणाम के बाद लोग यह जानने में लगे हैं कि आखिर प्रशांत किशोर को कितने फीसदी वोट मिले। उनके उम्मीदवार किन सीटों पर मुकाबले में रहे, किन सीटों पर उनके उम्मीदवार तीसरे पायदान पर रहे। पीके के उम्मीदवारों के चलते कितने सीटों पर दोनों गठबंधन को फायदा या नुकसान हुआ…वगैरह-वगैरह। इस तरह के और भी आंकड़े जुटाए जा रहे हैं। लेकिन क्या इन आंकड़ों के कोई ज्यादा मायने हैं? मेरे हिसाब से इन आंकड़ों पर ज्यादा ध्यान देने की जरूरत नहीं है। क्योंकि परिणामों को देखकर यह साफ कहा जा सकता है कि प्रशांत किशोर के प्रत्याशियों की वजह से दोनों बड़े गठबंधन के प्रदर्शन पर कोई बड़ा असर नहीं पड़ा। यदि दोनों गठबंधन के बीच मुकाबला कांटे का होता, उनके बीच वोट का फासला 2-3 फीसदी का होता, तब तो पीके की पार्टी के प्रदर्शन जरूर मायने रखते। लेकिन जहाँ दोनों गठबंधन के बीच वोट का फासला 10 फीसदी से ज्यादा का हो, वहाँ पीके की पार्टी के आँकड़े कुछ भी मायने नहीं रखते।
लेकिन जो लोग जानना चाहते हैं, उन्हें यह बता दें कि पीके की पार्टी को इस चुनाव में 3 फीसदी के करीब वोट मिले। लेकिन पीके की पार्टी किसी भी सीट पर दूसरे नंबर पर यानी, मुकाबले में नहीं रही। हालांकि, आंकड़े यह जरूर बता रहे हैं कि उनकी पार्टी 90 से ज्यादा सीटों पर तीसरे नंबर पर रही। लेकिन इनमें कुछ ही सीटों पर उनके प्रत्याशियों को 10 हजार के करीब वोट मिले। लेकिन यह भी उन प्रत्याशियों की व्यक्तिगत सफलता रही, न कि इसमें पीके और उनकी पार्टी का ज्यादा योगदान है। इस तरह से प्रदर्शन की बात करें तो यह कहने में कोई संकोच नहीं कि पीके की पार्टी का प्रदर्शन पूरी तरह से कमजोर और बेअसर रहा।
Bihar Elections 2025: क्या प्रदर्शन की विवेचना जरूरी है?

लेकिन क्या पीके की पार्टी के प्रदर्शन की विवेचना करनी चाहिए? मेरे हिसाब से बिल्कुल नहीं। क्योंकि एक ऐसी पार्टी जिसे बने महज 3 साल हुए हों, उससे बेहतर प्रदर्शन की उम्मीद पूरी तरह से बेमानी है। वह भी यह जानते हुए कि पीके की पार्टी का जन्म किसी बड़े जन आंदोलन की कोख से नहीं हुआ या कहिए, वह किसी बड़े सत्ता विरोधी मुद्दे की आँधी पर सवार होकर नहीं आए। पीके किसी बड़े राजनीतिक परिवार का हिस्सा भी नहीं रहे, या कहें, उन्हें राजनीति विरासत में नहीं मिली। उन्होंने स्थापित पार्टियों की तर्ज पर लोकलुभावन वादे भी नहीं किए। हालांकि, कोई नई नवेली पार्टी इस तरह के लोकलुभावन वादे करेगी तो भी जनता का उस पर भरोसा नहीं होगा। इन परिस्थितियों में आप यह उम्मीद नहीं कर सकते कि इतने कम वक्त में बिहार जैसे राज्य की स्थापित राजनीति में कोई नई पार्टी बड़ा उलटफेर कर बेहतर प्रदर्शन करे।
क्या प्रशांत किशोर आत्ममुग्ध थे?
हम यह मान नहीं सकते कि एक सफल चुनावी रणनीतिकार के तौर पर प्रशांत किशोर परिणाम को लेकर किसी मुगालते में होंगे। भले ही सार्वजनिक तौर पर चुनाव से पहले वह कोई भी दावे क्यों न कर रहे हों। कई सारे विश्लेषक आज यह कह रहे हैं कि प्रशांत किशोर और उनकी पार्टी के प्रवक्ता जिस तरह से विभिन्न मंचों पर बड़े-बड़े दावे कर रहे थे, वह उनका बड़बोलापन था। इन दावों को कई लोग उनके अहंकार और उनकी आत्ममुग्धता तक से जोड़ रहे हैं, लेकिन मैं ऐसा नहीं मानता। उनके सारे दावे को मैं सिर्फ उनकी चुनावी रणनीति का हिस्सा मानता हूँ। इतनी बड़ी राजनीतिक बिसात बिछी हो तो इस तरह के आत्मविश्वास और दावे पार्टियों की तरफ से किए ही जाते हैं।
खराब प्रदर्शन के बावजूद किन मायनों में सफल रहे पीके?
चुनाव परिणाम आने के बाद उनको और उनकी पार्टी को लेकर जितनी चर्चा हो रही है, उसे उनकी सफलता के तौर पर क्यों न देखा जाए? बिहार को छोड़ भी दें तो राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पीके की पार्टी को लेकर जो उम्मीद बनी, क्या वह यह नहीं साबित करता है कि प्रशांत किशोर अपनी रणनीति को साधने में एक हद तक सफल रहे? चुनाव परिणाम जैसे भी रहे हों, लेकिन बिहार से बाहर ज्यादातर लोगों की उत्सुकता प्रशांत किशोर के प्रदर्शन को लेकर है। उनमें बहुत सारे लोगों को तो पीके की पार्टी के खराब प्रदर्शन को लेकर ताज्जुब है। अब आप समझ सकते हैं चुनावी हकीकत जो भी रही हो, लेकिन राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उनकी पार्टी के प्रदर्शन को लेकर एक जबरदस्त उम्मीद बनी। एक तरह से कहें तो इतने कम समय में एक नई पार्टी की इससे अच्छी ब्रांडिंग और क्या हो सकती है?
पीके इस मायने में भी सफल रहे कि उन्होंने इतने कम वक्त में एक राजनीतिक मंच तैयार किया। उनके इस मंच से बहुत सारे ऐसे लोग जुड़े जो अपने-अपने क्षेत्रों में काफी सफल रहे हैं। बहुत सारे ऐसे राजनेता भी जुड़े हैं जो एक हद तक बेदाग और स्वच्छ छवि के हैं। हालाँकि, बहुत सारे ऐसे राजनेता भी रातों-रात उनकी पार्टी में आए, जिन्हें अन्य पार्टियों में टिकट नहीं मिला, जिसको लेकर लोगों के मन में सवाल भी हैं। लेकिन यह बात कम नहीं है कि उन्होंने एक ऐसा मंच तैयार कर दिया है, जिससे लोग जुड़ना चाह रहे हैं, जिसको लेकर बात कर रहे हैं। कई लोगों को यह उम्मीद भी है कि भविष्य में बिहार में यह एक राजनीतिक विकल्प के तौर पर उभरे। मेरे हिसाब से प्रशांत किशोर बुनियाद रखने में पूरी तरह से कामयाब हुए हैं। लेकिन हकीकत में उनकी राजनीतिक यात्रा सही मायने में अब शुरू हुई है। अब देखना होगा कि आगे वह इसमें कितना सफल होते हैं।
लेखक: अजीत कुमार
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