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Khalistan आंदोलन की पूरी एनाटॉमी, शांतिपूर्ण मांग से लेकर हिंसात्मक आंदोलन तक जानिए सब कुछ

Ashvani Pal by Ashvani Pal
April 23, 2026
in Top News
Khalistan
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Khalistan: अलगाववादी संगठन खालिस्तान समर्थक अमृतपाल सिंह अब तक फरार है। पंजाब पुलिस और सुरक्षा एजेंसियों का सर्च अभियान जारी है। इसी कड़ी में आज के इस विशेष रिपोर्ट में हम आपको अलगाववादी संगठन के उदय से लेकर वर्तमान परिस्थिती से परिचित करवाएंगें कि आखिर क्या है इस संगठन का इतिहास और उसकी मांग। पढ़ें पूरी रिपोर्ट:

क्या है Khalistan का आनंदपुर कनेक्शन?

गौरतलब है कि पंजाब में अमृतपाल पर लेकर जारी बवाल में आनंदपुर और Khalistan का जिक्र फिर से आ गया है। ऐसे में आइए विस्तार से जानते हैं Khalistan आंदोलन क्या था और इसका प्रसार कैसे हुआ?

Khalistan आंदोलन में धार लाने के लिए अमृतपाल ने भी आनंदपुर खालसा फौज के नाम से एक संगठन बनाया था। इस बात को हम इतनी प्रमुखता से इसलिए आपको बता रहे हैं क्योंकि खालिस्तान आंदोलन में आनंदपुर का नाम बहुत अहम रहा है।

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आनंदपुर साहब में ही सिखों के अंतिम गुरू गोविंद सिंह ने खालसा पंथ की स्थापना की थी। वहीं, Khalistan आंदोलन के अगुवा मास्टर तारा सिंह के निधन के बाद 1973 में पहली बार यहीं पर खालिस्तान को लेकर एक प्रस्ताव पास किया गया था।

Khalistan
photo: stackumbrella

जानिए क्यों उठती है Khalistan की मांग?

खालसा शब्द अरबी भाषा के खालिस से बना है, जिसका अर्थ होता है- शुद्ध। गुरू गोविंद सिंह ने 1699 में सिख में खालसा पंथ की स्थापना की थी। Khalistan इसी खालसा से बना है और इसका मतलब है- खालसाओं का राज।

  • आजादी से पहले 1929 के लाहौर अधिवेशन में कांग्रेस ने पूर्ण स्वराज्य की मांग का प्रस्ताव रखा। इस प्रस्ताव का कांग्रेस के भीतर ही 3 नेताओं ने विरोध किया।
  1. मोहम्मद अली जिन्ना- मुसलमानों के लिए हिस्सेदारी की मांग।
  2. मास्टर तारा सिंह- सिखों के लिए हिस्सेदारी की मांग।
  3. भीमराव अंबेडकर- दलितों के लिए हिस्सेदारी की मांग साथ ही अलग निर्वाचन व्यवस्था की मांग।
  • इन तीन मांगों के बाद कांग्रेस सकते में आ गई। हालांकि अधिवेशन में पूर्ण स्वराज्य का प्रस्ताव पास हो गया, लेकिन तीनों खेमे आंदोलन के दौरान भी अपनी मांगों को पुरजोर तरीके से उठाते रहे।
Khalistan
photo: stackumbrella

मास्टर तारा सिंह और Khalistan!

अब बात करते हैं, अकाली आंदोलन के संस्थापक सदस्य मास्टर तारा सिंह की। जो की Khalistan आंदोलन के अगुवा थे। वरिष्ठ पत्रकार मनमोहन शर्मा के हवाले से तारा सिंह सिखों को राजनीतिक हिस्सेदारी देने के हिमायती रहे हैं। आजादी से पहले उन्हें उस वक्त मोहम्मद अली जिन्ना ने पाकिस्तान की मांग का समर्थन करने के लिए कहा था। बदले में जिन्ना उन्हें उप-प्रधानमंत्री बना देने का वादा किया था, लेकिन तारा सिंह ने इस मांग को ठुकरा दिया।

यह भी पढ़ें: Amritpal Singh: केंद्र सरकार ‘वार‍िस पंजाब दे’ पर लगाएगी प्रतिबंध!, UAPA के तहत होगी कार्रवाई

Khalistan आंदोलन की पुरजोर मांग

आजादी के बाद खालिस्तान की मांग जोर पकड़ ली। इसकी बड़ी वजह पंजाब का विभाजन माना गया। पाकिस्तान के अलग होने के बाद पंजाब दो भागों में बंट गया, सिखों के कई प्रमुख गुरुद्वारे पाकिस्तान शासित पंजाब में चले गए, जिसका मास्टर तारा सिंह ने विरोध किया।

इसके बाद 1956 में पंडित नेहरू और मास्टर तारा सिंह के बीच एक समझौता हुआ। इसमें सिखों के आर्थिक, शैक्षणिक और धार्मिक हितों की रक्षा की बात कही गई। यह समझौता 5 साल तक ही चला और फिर टूट गया। मास्टर तारा सिंह ने 1961 में अलग पंजाबी सूबे की मांग को लेकर आमरण अनशन शुरू कर दिया। तारा सिंह के समर्थन में हजारों सिख एकजुट हो गए।

सिखों का कहना था कि भाषा के आधार पर अलग पंजाब राज्य का गठन हो और गुरुमुखी को भी भाषाओं की सूची में शामिल किया जाए। इस आंदोलन को उनकी बेटी राजेंद्र कौर ने खत्म करवाई। 1966 में भाषा के आधार पर पंजाब को अलग राज्य बना दिया गया। हालांकि, चंडीगढ़ को अलग करते हुए केंद्रशासित प्रदेश बनाया गया।

आनंदपुर अधिवेशन

सन 1967 में अकाली दल ने पंजाब में पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई। गुरनाम सिंह को अकाली दल का नेता चुना गया और वे मुख्यमंत्री बनाए गए, लेकिन 250 दिन बाद ही उनकी सरकार में बगावत हो गई। लक्ष्मण सिंह गिल के नेतृत्व में 16 विधायकों ने अलग गुट बना लिया। इस गुट ने कांग्रेस ने समर्थन दे दिया। पंजाब में 1971 तक राजनीतिक उथल-पुथल का दौर जारी रहा।

वर्ष 1971 में बांग्लादेश विभाजन के बाद पंजाब में इंदिरा गांधी को जबरदस्त सर्मथन मिला। इस चुनाव में अकालियों का पत्ता साफ हो गया। इसके बाद अलग खालिस्तान की मांग फिर से शुरू हुई। 1973 में अकाली दल ने आनंदपुर साहिब में एक प्रस्ताव पास किया। 1978 में भी इस प्रस्ताव को दोहराया गया। प्रस्ताव में 3 मुख्य बातें कही गई थी।

  • पंजाब को जम्मू-कश्मीर की तरह स्वायत्ता मिले। सिर्फ रक्षा, विदेश, संचार और मुद्रा पर केंद्र का दखल रहे।
  • केंद्रशासित प्रदेश चंडीगढ़ को पूरी तरह से पंजाब को सौंप दिया जाए।
  • पूरे देश में गुरुद्वारा समिति का निर्माण हो और सिखों को सेना में अधिक जगह मिले।
Khalistan
photo: stackumbrella

Khalistan की मांग और हिंसात्मक आंदोलन?

मास्टर तारा सिंह Khalistan की मांग को लेकर अहिंसक आंदोलन का सहारा लेते रहे, लेकिन 1967 में उनकी मृत्यु के बाद Khalistan का आंदोलन हिंसा में तब्दील हो गया। इसके पीछे 2 बड़ी वजह थी।

  • पहला ये कि बांग्लादेश हारने के बाद पाकिस्तान ने भारत से बदला लेने के लिए छद्म युद्ध का सहारा लिया। उग्रवादी सिख संगठनों को पाकिस्तान की ओर से फंडिंग और हथियार की व्यवस्था की गई। पैसे और हथियार की लालच में सिख युवा आ गए, जिससे यह आंदोलन और तेज होता गया।
  • वहीं, दूसरा पंजाब बनने के बाद से ही वहां राजनीतिक उथल-पुथल का दौर शुरू हो गया। ज्ञानी जैल सिंह को छोड़कर कोई भी मुख्यमंत्री 5 साल का कार्यकाल पूरा नहीं कर पाए। राजनीतिक अस्थिरता का फायदा उठाकर आंदोलन के नेता इसे हिंसक बनाते चले गए।
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अमृतसर में भिंडरावाले का उदय

बात सन 1978 की है। अमृतसर में निरंकार संप्रदाय के साथ अकाली दलों का विवाद हो गया। निरंकार समुदाय के लोगों को जीवित गुरुओं पर विश्वास है, जबकि सिख गुरु गोविंद सिंह के बाद किसी को गुरु नहीं मानते हैं। दोनों के बीच यह विवाद वर्षों पुराना है। लेकिन 1978 में हुए विवाद में 13 अकाली कार्यकर्ताओं की मौत हो गई। इसमें जरनैल सिंह भिंडरावाले के करीबी फौजा सिंह भी शामिल था।

कोर्ट में यह केस चला और निरंकारी संप्रदाय के प्रमुख गुरुबचन सिंह केस में बरी हो गए। इसके बाद पंजाब में शुरू हुआ भिंडरावाले के आतंक का दौर। भिंडरावाले के समर्थकों ने 1980 में गुरुबचन सिंह की हत्या कर दी। कई जगहों पर हिंदुओं और निरंकारी समुदाय के लोग मारे जाने लगे।

पंजाब में लॉ एंड ऑर्डर पूरी तरह ध्वस्त हो गया। चरमपंथ के सहारे सिखों में पैठ बनाने के बाद भिंडरावाले ने अमृतसर के पवित्र स्वर्ण मंदिर को अपना ठिकाना बना लिया। अकाल तख्त से ही भिंडरावाले सिखों के लिए संदेश जारी करना शुरू कर दिया। अकाल तख्त का संदेश सिख समुदाय के लिए सर्वोपरि होता है।

सन 1982 में भिंडरावाले ने अकाली दल से हाथ मिला लिया और धर्मयुद्ध लॉन्च कर दिया। पंजाब में खालिस्तान आंदोलन के विरोध में बोलने वाले लोगों को भिंडरावाले और उनके समर्थक मौत के घाट उतार रहे थे। 1983 में जालंधर के डीआईजी एएस अटवाल को स्वर्ण मंदिर के सीढ़ी पर गोलियों से भून दिया गया। इसके बाद इंदिरा गांधी ने ऑपरेशन ब्लू स्टार शुरू करने का आदेश दे दिया।

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photo: stackumbrella

ऑपरेशन ब्लू स्टार से आंदोलन का खात्मा

पंजाब में कानून व्यवस्था ध्वस्त होने के बाद इंदिरा सरकार ने राष्ट्रपति शासन लागू कर दिया। पंजाब में आईबी के अधिकारियों को भेजा गया। खुफिया जानकारी मिलने के बाद सेना ने ऑपरेशन ब्लू स्टार की शुरुआत की। इस ऑपरेशन में स्वर्ण मंदिर के भीतर सेना के टैंक को दाखिल करा दिया गया।

ऑपरेशन के दौरान दोनों ओर से भीषण गोलीबारी हुई। आखिर में जरनैल भिंडरावाले मारा गया। सरकारी रिपोर्ट में कहा गया कि ऑपरेशन के दौरान 83 जवान शहीद हुए, जबकि 458 चरमपंथी मारे गए। हालांकि, सिख संगठनों ने 3000 लोगों के मारे जाने का दावा किया। सिख संगठन का कहना था कि इस ऑपरेशन से आम नागरिकों की भी मौत हुई है। इस ऑपरेशन के बाद इंदिरा गांधी का जमकर विरोध हुआ। कैप्टन अमरिंदर सिंह समेत कई सिख नेताओं ने पार्टी से इस्तीफा दे दिया।

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इंदिरा गांधी, बेअंत सिंह और आर्मी चीफ की हत्या

बात Khalistan की हो तब ऑपरेशन ब्लू स्टार का जिक्र आवश्यक हो जाता है। इस ऑपरेशन के बाद देश में बब्बर खालसा और अन्य आतंकी संगठन सक्रिय हो गए। ऑपरेशन के कुछ महीनों बाद ही प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या कर दी गई। उनकी हत्या उनके सुरक्षाबल में शामिल 2 सिख जवानों ने कर दी।

केवल इंदिरा गांधी ही नहीं इसके अलावा पंजाब के तत्कालीन मुख्यमंत्री बेअंत सिंह की हत्या 1995 में कर दी गई। बेअंत सिंह कार से एक कार्यक्रम में जा रहे थे, उसी वक्त एक सुसाइड बम से उन पर अटैक किया गया था। 1987 में भारत के पूर्व आर्मी चीफ जनरल एएस वैद्य को भी गोलियों से भून दिया गया।

इतना ही नहीं कनाडा से लंदन होते हुए भारत आने वाली एयर इंडिया के विमान कनिष्क को 1986 में उग्रवादियों ने हवा में ही उड़ा दिया। इस हमले में 329 लोगों की मौत हो गई। हालांकि, केंद्र और राज्य के संयुक्त ऑपरेशन की वजह से खालिस्तान आंदोलन की मांग पंजाब में शांत हो गई।

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photo: stackumbrella

‘अमृतपाल बना रहा था आर्मी’

अब बात अमृतपाल की। पंजाब में खालिस्तान को अलग देश बनाने की मांग नई नहीं है, लेकिन हालिया विवाद सितंबर 2022 के बाद तब शुरू हुआ जब अमृतपाल को ‘वारिस पंजाब दे’ की कमान सौंपी गई। अमृतपाल सितंबर 2022 में जरनैल सिंह भिंडरावाले के गांव जाकर एक रैली का आयोजन किया था जिसमें युवाओं से खालिस्तान के लिए लड़ने का आह्वान किया था।

पुलिस ने बताया कि Khalistan आंदोलन की फंडिंग ड्रग माफिया कर रहे थे। पाकिस्तानी एजेंसी से अमृतपाल के संगठन को हथियार और गोला बारूद मिल रहा था। पुलिस ने अमृतपाल को अरेस्ट करने के लिए 10 जिलों में नाकेबंदी कर दी है। पुलिस की कार्रवाई बीच एनआईए की 8 टीमें भी पंजाब पहुंच गई है, जो टेरर एंगल से पूरे मामले की जांच करेगी।

यह भी पढ़ें: Kangana Ranaut Vs Diljit Dosanjh Re-Begins! New Angle in Khalistan Controversy

अलग देश खालिस्तान की मांग करने वाले ‘वारिस पंजाब दे’ संगठन पर पंजाब पुलिस का ऑपरेशन जारी है। पुलिस के मुताबिक संगठन के सरगना अमृतपाल अब भी फरार है, लेकिन उसके 116 साथियों को गिरफ्तार कर लिया गया है। शुरुआती जांच के बाद पंजाब पुलिस ने दावा किया है कि अमृतपाल के ड्रग माफिया से संबंध हैं। वह अलग सिख देश बनाने के लिए पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई के संपर्क में था।

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