Justice Ujjal Bhuyan News: सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस उज्जल भुइयां ने देश में बढ़ती असहिष्णुता और शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शनों पर हो रही कार्रवाई को लेकर गंभीर चिंता जताई है। उन्होंने कहा कि आज के समय में सार्वजनिक बहस, शांतिपूर्ण प्रदर्शन और असहमति की आवाज को धीरे-धीरे आपराधिक कृत्य की तरह देखा जा रहा है, जो लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए चिंता का विषय है।

Justice Ujjal Bhuyan News: सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस उज्जल भुइयां ने देश में बढ़ती असहिष्णुता और शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शनों पर हो रही कार्रवाई को लेकर गंभीर चिंता जताई है। उन्होंने कहा कि आज के समय में सार्वजनिक बहस, शांतिपूर्ण प्रदर्शन और असहमति की आवाज को धीरे-धीरे आपराधिक कृत्य की तरह देखा जा रहा है, जो लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए चिंता का विषय है।
जस्टिस उज्जल भुइयां भोपाल स्थित नेशनल लॉ इंस्टीट्यूट यूनिवर्सिटी (NLIU) में आयोजित 5वें जस्टिस जी.पी. सिंह मेमोरियल लेक्चर को संबोधित कर रहे थे। इस दौरान उन्होंने कहा कि कई सामान्य नागरिक, पर्यावरण कार्यकर्ता और विश्वविद्यालय के छात्र केवल शांतिपूर्ण तरीके से अपनी बात रखने के कारण गिरफ्तार किए जा रहे हैं।
उन्होंने कहा कि ऐसे लोगों को कई बार हफ्तों या महीनों तक जेल में रहना पड़ता है, जबकि बाद में उन्हें कानूनी राहत मिलती है। इससे लोगों में अपनी बात रखने का डर पैदा होता है और लोकतांत्रिक व्यवस्था कमजोर होती है।
अपने संबोधन में जस्टिस भुइयां ने गंगा बोट इफ्तार मामले का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि कुछ युवा मुस्लिमों को गंगा नदी में नाव पर इफ्तार आयोजित करने के कारण तीन महीने तक जेल में रहना पड़ा।
उन्होंने सवाल उठाया कि जब ऐसा कोई कानून नहीं है जो नदी पर चिकन बिरयानी खाने से रोकता हो, तो फिर लोगों को जेल में क्यों रखा गया? उन्होंने टिप्पणी करते हुए कहा,
"मुझे पूरा विश्वास है कि चिकन बिरयानी खाना कोई अपराध नहीं है।"
उन्होंने कहा कि ऐसे मामलों से यह सवाल उठता है कि क्या आपराधिक कानून का इस्तेमाल सही तरीके से किया जा रहा है।
जस्टिस भुइयां ने विश्वविद्यालयों में होने वाले छात्र आंदोलनों का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि कई बार शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने वाले छात्रों को 30 से 40 दिनों तक हिरासत में रखा जाता है।
उनके अनुसार, ऐसे मामलों में छात्रों को लंबे समय तक कानूनी लड़ाई लड़नी पड़ती है, जिससे उनकी पढ़ाई और भविष्य दोनों प्रभावित होते हैं।
उन्होंने अदालतों द्वारा जमानत के दौरान लगाई जाने वाली कुछ शर्तों पर भी चिंता व्यक्त की। जस्टिस भुइयां ने कहा कि कई मामलों में आरोपियों को सार्वजनिक सभाओं में बोलने से रोका जाता है, बिना किसी ठोस कारण के पासपोर्ट जमा कराने को कहा जाता है या सोशल मीडिया गतिविधियों पर भी प्रतिबंध लगाए जाते हैं।
उन्होंने कहा कि ऐसी शर्तें व्यक्ति की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को सीमित कर सकती हैं और समाज में डर का माहौल पैदा कर सकती हैं।
जस्टिस भुइयां ने कानून विश्वविद्यालयों से छात्रों में स्वतंत्र और आलोचनात्मक सोच विकसित करने की अपील की। उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालय केवल नियमों का पालन सिखाने वाले संस्थान नहीं होने चाहिए, बल्कि ऐसे स्थान होने चाहिए जहां छात्र सवाल पूछ सकें, न्यायालयों के फैसलों का आलोचनात्मक अध्ययन कर सकें और शांतिपूर्ण एवं कानूनी तरीके से अपनी बात रख सकें।
उन्होंने कहा कि लोकतंत्र की मजबूती के लिए विश्वविद्यालयों में खुली चर्चा, स्वतंत्र विचार और अभिव्यक्ति की आजादी का माहौल बनाए रखना बेहद जरूरी है।