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NEET PG मार्क्स: भारत में अब 800 में से 9 अंक हासिल करने वाले डॉक्टर करेंगे इलाज??

NEET PG मार्क्स विवाद

NEET PG मार्क्स विवाद : भारत की मेडिकल शिक्षा व्यवस्था पर एक बार फिर से प्रश्न चिन्ह लग गया है। हाल ही में Neet PG मार्क्स विवाद का एक नया मामला सामने आया है।

इस मामले ने पूरे देश में बहस छेड़ दी है कि क्या अब मेडिकल पोस्ट ग्रेजुएशन में मेरिट की जगह सिर्फ सीट भरने पर जोर दिया जा रहा है। यह मामला उस डॉक्टर से जुड़ा है जिसने NEET PG 2025-26 की परीक्षा में 800 में से केवल 9 अंक हासिल किये और फिर भी उसे PG की सीट मिल गई।

यह मामला केवल एक छात्र तक सीमित नहीं है असल में यह पूरे सिस्टम की विश्वसनीयता पर उठता हुआ सवाल है। NEET PG जैसे कोर्स में जहां मेडिकल विशेषज्ञ तैयार किए जाते हैं वहां इस प्रकार के विवाद होना मेडिकल सुविधाओं पर सवाल खड़े करता है।

इस पूरे प्रकरण में सामने यह आया कि एक छात्र को 9 अंक मिलने पर भी सीट मिल गई और वहीं दूसरे छात्र को 90% होने पर भी पैसों की कमी की वजह से NEET PG में मनपसंद सीट नहीं मिल पाई। Neet PG मार्क्स विवाद के इस मुद्दे ने मेडिकल शिक्षा को ही विवादों में लाकर खड़ा कर दिया है।

क्या है Neet PG मार्क्स विवाद

Neet PG मार्क्स विवाद का मुद्दा तब सामने आया जब पता चला कि 2025-26 के सेशन के 3rd काउंसलिंग राउंड में प्राइवेट मेडिकल कॉलेज के मैनेजमेंट कोटा के अंतर्गत एक छात्र को 9 मार्क्स के बेसिस पर सीट दे दी गई।

इससे मेडिकल समुदाय, मेडिकल छात्रों, अभिभावकों और विशेषज्ञ के बीच गहरा आक्रोश बढ़ गया। यह मामला सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। फेसबुक, इंस्टाग्राम, X पर इस मामले में कई पोस्ट और रील्स वायरल हो रही हैं। यहां तक की Reddit पर भी इससे जुड़े सवाल उठाए जा रहे हैं।

क्या खाली सीटों को भरना ही है असली मकसद?

NEET PG 2025-26 में हजारों उम्मीदवारों ने परीक्षा दी थी। लेकिन सही संख्या में उम्मीदवार न मिलने की वजह से PG की कई सारी सीटें खाली रह गई।

उच्च कट ऑफ की वजह से उचित उम्मीदवारों का सामने ना आना, वही कुछ विषय और निजी कॉलेज की कम आकर्षक सीट भी फीस ज्यादा होने की वजह से खाली पड़ी रही। यही वजह थी कि स्वास्थ्य विभाग और सरकार ने मिलकर कट ऑफ को कम कर दिया।

यह मान लिया गया कि यदि सीट खाली रह जाती है तो क्वालीफाइंग परसेंटाइल को घघटाकर 7% कर दिया जाए। कुछ श्रेणी में तो यह 0% कर दिया गया।

मतलब 2025-26 के 3rd काउंसलिंग राउंड में ऐसे छात्रों ने भाग लिया जो 0% से 7% अंक हासिल कर चुके थे। यानी नेगेटिव मार्क्स वाले उम्मीदवार भी एलिजिबल बन गए।

यह विवाद मुद्दा क्यों बन गया है?

NEET PG मार्क्स विवाद अब चिकित्सा जैसे प्रोफेशन पर सवाल खड़ा कर रहा है। क्योंकि एक डॉक्टर से अपेक्षा की जाती है कि वह अपने प्रोफेशन में माहिर हो।

यदि कोई उम्मीदवार 9 अंक लेकर PG में दाखिला ले रहा है तो 5 साल की तैयारी पर प्रश्न खड़े होते हैं? यह तय हो जाता है की छात्र की तैयारी और उसकी योग्यता दोनों ही कम है।

इस पूरे प्रकरण की वजह से मैनेजमेंट कोटा पर भी सवाल उठते हैं की भारी डोनेशन और फीस के बदले मैनेजमेंट ऐसे छात्रों को विशेषज्ञ बनाएगा जो कमजोर है।

आर्थिक रूप से कमजोर मेधावी छात्र सही मौका नहीं पा सकते। राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर सीट खाली न रहने देने का निर्णय लेते हुए क्वालीफाइंग क्राइटेरिया को कम किया गया जो यह बताता है की सीट भरना अंतिम लक्ष्य है।

लेकिन यह पूरी तरह से गलत है। असल में शिक्षा क्षेत्र में सही डॉक्टर तैयार करना ही सरकार की नीति होनी चाहिए।

वर्तमान में इस मामले पर सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई

वर्तमान में इस मामले पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई जारी है। सुप्रीम कोर्ट में कट ऑफ नीति पर नए दिशा निर्देश आ सकते हैं। भविष्य में कॉउंसलिंग सेशन्स में मैनेजमेंट कोटा और कट ऑफ निर्धारण को लेकर कुछ सख्त नियम भी तय किये जा सकते हैं।

इसके अलावा हो सकता है की सुप्रीम कोर्ट कुछ नए नियम भी लागू करें जिससे फाइनल लाईसेंस लेवल का नियम बनाया जा सके ।

सुप्रीम कोर्ट में फिलहाल इस मामले को संविधान के आर्टिकल 14 और आर्टिकल 21 के अंतर्गत सुना जा रहा है। क्योंकि NEET PG क्वालीफाइंग परसेंटाइल को DRHS और मिनिस्ट्री ऑफ़ हेल्थ ने घटाकर 50% से 7% और कुछ श्रेणियां के लिए 0% कर दिया।

जिसकी वजह से लगभग 95,913 नॉन एलिजिबल उम्मीदवार भी काउंसलिंग के लिए एलिजिबल हो गए।

फाइनल लाइसेंसिंग एक्जाम होगा अनिवार्य?

सुप्रीम कोर्ट भी समझ रही है की कम प्रशिक्षित डॉक्टरों द्वारा इलाज दिए जाने पर गलत डायग्नोसिस और गलत ट्रीटमेंट की संभावना बढ़ सकती है।

जो कि सीधा स्वास्थ्य और जीवन को प्रभावित करेगा। ऐसे में PG कोर्सेज की गुणवत्ता को बनाए रखने के लिए सख्त नियमों की जरूरत है।

इसी को देखते हुए आने वाले समय में मिनिमम क्वालीफाइंग स्टैंडर्ड का स्पष्ट निर्धारण किया जाएगा। खाली सीटों को भरने के लिए कट ऑफ को कम नहीं किया जाएगा।

मैनेजमेंट कोटा रिफॉर्म्स के लिए नई नीति तैयार करने पर भी बात चल रही है। और विकसित देशों की तरह PG के बाद एक लाइसेंसिंग एग्जाम को भी अनिवार्य करने का प्रस्ताव पारित किया जा सकता है।

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