सुबह का टाइम, नॉर्मल सा दिन शुरू ही हुआ था… और तभी मध्य प्रदेश के महू एरिया में कुछ ऐसा हुआ जिसने पूरे इंदौर वॉटर सप्लाई सिस्टम को हिलाके रख दिया। जलूद से इंदौर को जोड़ने वाली नर्मदा फेज़-3 पाइपलाइन अचानक फट गई, और हाई-प्रेशर वॉटर ने जो सीन क्रिएट किया ना… लोग बोल रहे हैं “लग रहा था जैसे सड़क के नीचे से समुंदर फूट पड़ा हो।” मेटा वाइब यही है कि एक छोटी सी टेक्निकल खराबी ने पूरे शहर के कई एरिया में वॉटरलॉगिंग और अव्यवस्था डाल दी, और नॉर्मल लाइफ कुछ घंटों के लिए लगभग फ्रीज हो गई।
सुबह 7 बजे असल में क्या हुआ था?
जो जानकारी सामने आई है उसके हिसाब से, घटना गुरुवार सुबह करीब 7 बजे की है। नर्मदा फेज़-3 पाइपलाइन, जो इंदौर के करीब 80 पानी की टंकियों को सप्लाई करती है, उसमें अचानक प्रेशर बना और फिर टूट गया। मैं सच कहूँ तो ऐसे मामलों में जो “इनविज़िबल इंफ्रास्ट्रक्चर” होता है ना, वही सबसे खतरनाक होता है। लोगों को लगता है पानी आ रहा है बस, लेकिन अंदर कितना प्रेशर और इंजीनियरिंग चल रही होती है, वो तब समझ आता है जब ऐसी ब्रेकिंग सिचुएशन हो जाए।
जब पानी सड़कों पर बहने लगा, लोग क्या देख रहे थे?
लोकल रिपोर्ट्स के हिसाब से जैसे ही पाइपलाइन फटी, महू और आस-पास के इलाकों में पानी भरना शुरू हो गया। सड़कें सचमुच डूब गईं और कुछ जगहों पर पानी का बहाव इतना तेज़ था कि टू-व्हीलर तक बहने लगे। फॉरेस्ट डिपार्टमेंट ऑफिस हो या कैंटोनमेंट बोर्ड एरिया, सेंट्रल स्ट्रीट हो या ड्रीमलैंड और राज मोहल्ला—कई ज़रूरी जगहें प्रभावित हो गई हैं। लोगों का कहना है कि एक पॉइंट पर लग रहा था कि “यह रोड है या कोई टेंपरेरी नदी।” आप सोचिए, सुबह ऑफिस जाने का टाइम हो और सामने रोड ही गायब हो जाए… फ्रस्ट्रेशन और पैनिक दोनों एक साथ आते हैं ना।
ट्रैफिक जाम, बैरिकेड्स और एक पूरा एरिया ब्लॉक
सिचुएशन कंट्रोल से बाहर न जाए इसलिए ड्रीमलैंड स्क्वायर से DSOI स्क्वायर तक रोड को बैरिकेड करना पड़ा। ट्रैफिक रुक गया और लोगों को दूसरे रास्ते लेने पड़े। एक्सपर्ट्स कहते हैं कि जब हाई-प्रेशर पाइपलाइन फटती हैं, तब सबसे पहले ग्राउंड लेवल पर डैमेज दिखता है और यहीं यहाँ हुआ। एक 500 मीटर का एरिया लगभग “टेम्पररी तालाब” बन गया था। और इंटरेस्टिंग बात यह है कि बैंक और आस-पास के इंस्टीट्यूशन को भी पूरे दिन बंद रखना पड़ा, क्योंकि पानी का लेवल और सेफ्टी की चिंता दोनों ज़्यादा थी।
रिपेयर वर्क का ग्राउंड रियलिटी सीन
जब इंसिडेंट हुआ, नर्मदा वॉटर सप्लाई कंट्रोल रूम, बिजलपुर को अलर्ट मिलते ही PHE डिपार्टमेंट और रामकी कंपनी की टीम साइट पर पहुंच गई। सबसे पहले प्रेशर कंट्रोल करने के लिए गेट नंबर 4 और किशनगंज के स्क्वायर वाल्व खुल गए। इसका सिंपल मतलब यह था कि सिस्टम का प्रेशर थोड़ा रिलीज़ करो, वरना डैमेज और बढ़ सकता था। फिर डीवाटरिंग का काम शुरू हुआ, मतलब जहां लीकेज हुआ था, वहां से पानी निकालना। इसके लिए 4 मोटर पंप लगाए गए और काम सुबह 9 बजे से शाम 5 बजे तक चला। अगर आप कभी इंजीनियरिंग या सिविक इंफ्रास्ट्रक्चर को बंद से देखो, तो समझ आता है कि रिपेयर का काम कितना धीमा और नाजुक होता है—एक गलत मूव और सिचुएशन और बिगड़ सकती है।
क्या पहले भी ऐसा हुआ है?
लोग नैचुरली ये पूछ रहे हैं कि क्या ये पहली बार हुआ है? रिपोर्ट्स बताती हैं कि ये पाइपलाइन सिस्टम पुराना है और लगभग 10 साल पहले बना था। और इंटरेस्टिंग ट्विस्ट यह है कि करीब 8 साल पहले भी किशनगंज एरिया में ऐसा ही फेलियर हो चुका है। यानी यह साफ तौर पर एक आइसोलेटेड एक्सीडेंट नहीं लग रहा है, बाल्की सिस्टम स्ट्रेस या एजिंग इंफ्रास्ट्रक्चर का सिग्नल भी हो सकता है।
अथॉरिटीज़ का क्या कहना है?
म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन वॉटर वर्क्स इंचार्ज बबलू शर्मा के अनुसार रिपेयर का काम फास्ट ट्रैक पर है और पानी की सप्लाई को ठीक करने की कोशिश चल रही है। एस्टीमेट यह दिया गया है कि काम लगभग 12 घंटे ले सकता है। म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन कमिश्नर क्षितिज सिंघल भी साइट पर पहुंचकर सिचुएशन इंस्पेक्ट कर चुके हैं और ज़रूरी इंस्ट्रक्शन दिए गए हैं। एक्सपर्ट्स का यहाँ एक कॉमन पॉइंट होता है जब तक फुल प्रेशर टेस्टिंग और स्ट्रक्चरल चेक नहीं होता, तब तक सिस्टम को रीस्टार्ट करना रिस्की होता है।
असल सवाल जो सबके दिमाग में है
यहाँ सबसे बड़ा सवाल यह बनता है कि इतनी ज़रूरी पाइपलाइन सिस्टम में ऐसा रिपैक्ट कैसे हुआ? क्या मेंटेनेंस गैप था, या प्रेशर मैनेजमेंट में कोई दिक्कत थी? और दूसरा सवाल जो लोग चुपचाप पूछ रहे हैं क्या ऐसे इंसिडेंट फ्यूचर में अवॉइड हो सकते हैं, या हम हमेशा “डैमेज के बाद रिपेयर” मोड में ही रहेंगे?


