अंतर्राष्ट्रीय गिद्ध सचेतना दिवस : बिना वेतन लिए प्रकृति की सफाई करते हैं गिद्ध

गिद्धों को प्राकृतिक सफाईकर्मी भी कहा जाता है, क्योंकि यह अपने भोजन के लिए केवल मृत पशुओं के शरीर पर ही निर्भर रहता है। इस तरह से गिद्ध वातावरण के लिए कुशल एवं प्राकृतिक सफाईकर्मी का कार्य करता है। इनका पाचनतंत्र मजबूत होता है, जिससे कि यह रोगाणुओं से परिपूर्ण सड़ा-गला मांस भी आसानी पचा सकते हैं। यही कारण है कि गिद्ध अनेक प्रकार की संक्रामक बीमारियों को फैलने से रोकते हैंl

अंतर्राष्ट्रीय गिद्ध सचेतना दिवस : बिना वेतन लिए प्रकृति की सफाई करते हैं गिद्ध
आनंद पटेल। पर्यावरण संरक्षण में गिद्धों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। गिद्धों को रामायण काल में जटायु के नाम से भी जाना जाता था। अंग्रेजी में इन्हें वल्चर (Vulture) कहा जाता है l पिछले एक दशक में गिद्धों की संख्या अप्रत्याशित रूप से घटी है और इनकी संख्या का लगातार घटना बेहद ही संवेदनशील विषय हैl भारत में गिद्धों की नौ प्रजातियां पाई जाती हैं।

इन प्रजातियों में बियर्डेड (Bearded vulture), इजिप्शयन (Egyptian vulture), सिनेरियस (Cinereous vulture), किंग (King Vulture), स्बैंडर बिल्ड (Slender-Billed Vulture) यूरेसियन (Eurasian griffon), लॉन्ग बिल्ड (Long billed or Indian Vulture), हिमालियन ग्रिफिम (Himalayan griffon vulture) एवं व्हाइट बैक्ड (White-Rumped Vulture) जैसी प्रजातियां शामिल हैं।

सड़ा गला मांस भी पचा लेते हैं गिद्ध : 
गिद्धों को प्राकृतिक सफाईकर्मी भी कहा जाता है, क्योंकि यह अपने भोजन के लिए केवल मृत पशुओं के शरीर पर ही निर्भर रहता है। इस तरह से गिद्ध वातावरण के लिए कुशल एवं प्राकृतिक सफाईकर्मी का कार्य करता है। इनका पाचनतंत्र मजबूत होता है, जिससे कि यह रोगाणुओं से परिपूर्ण सड़ा-गला मांस भी आसानी पचा सकते हैं। यही कारण है कि गिद्ध अनेक प्रकार की संक्रामक बीमारियों को फैलने से रोकते हैंl


प्राकृतिक रूप से भोजन चक्र में गिद्धों की भूमिका अहम रही है और खाद्य श्रृंखला में इनका महत्वपूर्ण स्थान है। साथ ही यह अनेक प्रकार की पारिस्थितिकी सेवाएं प्रदान करते हैं, लेकिन पिछले एक दशक में गिद्धों की सभी प्रजातियां लुप्त होने की कगार पर पहुंच गई हैं।

इस कारण विलुप्त होने की कगार पर पहुंच गए गिद्ध : 
खाद्य श्रृंखला में सर्वोच्च स्थान पर होने के कारण गिद्ध वातावरण में होने वाले परिवर्तन जैसे कि भोज्य पदार्थों की कमी, लिंगानुपात में कमी, रासायनिक प्रदूषण और इनके आवास विनाश के लिए बहुत ही संवेदनशील होते हैं।
इनकी संख्या में गिरावट का सबसे बड़ा कारण पिछले कुछ दशकों में पशुओं के दर्द निवारण के लिए दी जाने वाली दवाई डाइक्लोफेनेक (Diclofenic) इसके लिए सबसे अधिक जिम्मेदार रही है।

डाइक्लोफेनेक 1980 के शुरुआती वर्षों से प्रचलन में आई थी और कुछ सालों बाद जब गिद्धों की संख्या में भारी गिरावट आई, तो डाइक्लोफेनेक और गिद्धों की मौत के मध्य सम्बन्ध स्थापित हो गया। इसके अलावा जंगलों की लगातार कटाई से गिद्धों के प्राकृतिक आवास नष्ट हो गए, जो इनके विलुप्त होने का सबसे बड़ा कारण है। 
 
डाइक्लाेफेनेक के कारण खत्म हुए 99% गिद्ध :
पिछले दशकों में डाइक्लोफेनेक नामक दवाई ने भारत से गिद्धों की 99% आबादी को साफ कर दिया। भारत में सर्वप्रथम गिद्ध की घटती हुई जनसंख्या केलवादेल, घाना नेशनल पार्क (भरतपुर, राजस्थान) में 1980 से 1990 के बीच दर्ज की गई, जो आगे की गणना के लिए मील का पत्थर साबित हुई। अचानक गिद्धों की घटती हुई संख्या को तब उत्तरी भारत और इससे जुड़े हुए पड़ोसी देशों में भी अवलोकित किया गया था।


गिद्धों की प्रजनन क्षमता भी संवर्धन के प्रयासों में एक बड़ी बाधा है, गिद्ध जोड़े साल में औसतन एक ही बच्चे को जन्म देते हैं। यही कारण है कि गिद्धों के संरक्षण और संवर्द्धन में खासी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। 

बक्सवाहा में भी मौजूद हैं गिद्ध : 
सरकार द्वारा इनके संरक्षण और संवर्धन के लिए बहुत सारे प्रयास किए जा रहे हैं, लेकिन यदि जंगल काटे जाते हैं, तो इनके प्राकृतिक आवास ख़त्म हो जाएंगे। मध्य प्रदेश के बक्सवाहा (Buxaha Forest) में भी गिद्ध बहुत अधिक संख्या में हैं, लेकिन हीरों के लिए इन जंगलों को काटा जाना यहां रहने वाले गिद्धों के लिए विनाशकारी साबित होगा। बक्सवाहा गिद्धों के लिए एक आदर्श स्थल है। यदि यह जंगल इसके बावजूद भी काटा जाता है, तो निश्चित है कि गिद्ध यहां से पूरी तरह से विलुप्त हो जाएंगे।
 

लेखक मप्र के पर्यावरणविद हैं, वन्य संपदा के संरक्षण को लेकर कार्य कर रहे हैं।

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