आजकल युवा पेशेवरों के करियर दृष्टिकोण में कुछ अलग सा देखने को मिल रहा है। जहां एंट्री-लेवल कर्मचारी अपने करियर में कड़ी मेहनत करने के लिए तैयार रहते हैं, वहीं कई Gen Z कर्मचारी अपनी ऊर्जा कॉर्पोरेट दुनिया की बजाय हॉबीज में लगा रहे हैं। नीटवर्किंग, पॉटरी, कढ़ाई, शहरी बागवानी जैसी गतिविधियां अब उनके समय और जुनून का हिस्सा बन गई हैं। इंटरनेट ने इन हॉबीज को प्यार से “दादी वाली हॉबीज” भी कह दिया है।
लेकिन इस मज़ाक के पीछे एक बड़ी बात छुपी है: यह पीढ़ी अब काम, महत्वाकांक्षा और मेहनत को लेकर वही दृष्टिकोण नहीं रखती, जो पुराने जमाने के लोग रखते थे।
राजलक्ष्मी की कहानी: करियर बनाम हॉबी
ठाणे में 23 वर्षीय बिज़नेस ग्रेजुएट राजलक्ष्मी इंदुलकर का उदाहरण इसे अच्छे से समझाता है। उन्होंने मुंबई के एक पॉपुलर MBA इंस्टीट्यूट से पढ़ाई की है। मंगलवार की दोपहर राजलक्ष्मी लकड़ी की कढ़ाई की हूप में ध्यान लगाकर काम कर रही थीं। उनके कॉलेज के दोस्त कॉर्पोरेट डेडलाइन, स्लैक नोटिफिकेशन और पावरपॉइंट डेक्स में व्यस्त थे। राजलक्ष्मी कहती हैं,
“मैंने तीन महीने तक असली नौकरी की कोशिश की। लेकिन दिन भर स्क्रीन घूरते हुए मुझे कुछ भी ठोस महसूस नहीं हुआ। कढ़ाई या पॉटरी में मुझे अपने बनाए हुए चीज़ का रिज़ल्ट दिखता है।”
यह अनुभव उन्हें यह एहसास दिलाता है कि करियर का पक्का ग्राइंड हर किसी के लिए जरूरी नहीं है।
क्यों Gen Z नौकरी की सीढ़ी चढ़ना नहीं चाहता?

अनुसंधान बताते हैं कि Gen Z पारंपरिक प्रमोशन और सैलरी की दौड़ में उतनी दिलचस्पी नहीं लेता। Deloitte 2025 Gen Z और मिलेनियल सर्वे के अनुसार, सिर्फ 6% Gen Z के लिए लीडरशिप पोज़ीशन सबसे बड़ा लक्ष्य है। इसके बजाय, यह पीढ़ी वर्क-लाइफ बैलेंस, मानसिक स्वास्थ्य और व्यक्तिगत संतुष्टि को प्राथमिकता देती है। दिल्ली स्थित करियर एडवाइजर अंकित कपूर कहते हैं, “पुराने जमाने में सफलता का मतलब प्रमोशन और सैलरी से होता था। Gen Z अक्सर अपने काम के बाहर खुशी और संतुष्टि ढूंढता है। इसलिए हॉबीज उनके लिए बहुत मायने रखती हैं।”
दादी वाली हॉबीज’ का रुझान
आजकल कई युवा कढ़ाई, पॉटरी, बागवानी, कैंडल मेकिंग और यहां तक कि ब्लैकस्मिथिंग जैसी हॉबीज में समय और ऊर्जा लगाते हैं। मुंबई की करियर काउंसलर डॉ. रितु शर्मा बताती हैं, “ये लोग अनुशासनहीन नहीं हैं। बस उनकी प्रेरणा का स्रोत अलग है। कॉर्पोरेट स्ट्रक्चर उन्हें थकाता है, लेकिन हॉबीज उन्हें कंट्रोल और क्रिएटिविटी देती हैं।”
दिल्ली की युवाओं की मेंटर नेहा गुप्ता भी कहती हैं, “कई Gen Z ग्रेजुएट्स मुझे कहते हैं कि वे मानसिक स्वास्थ्य के लिए अपने करियर का बलिदान नहीं देना चाहते। वे कमाई सीमित कर सकते हैं, लेकिन वो अपने समय को पसंदीदा चीज़ों में खर्च करना चाहते हैं।”
हॉबी में मिलता है ठोस परिणाम
आधुनिक डिजिटल जॉब्स में, जैसे ईमेल, एक्सेल और प्रेज़ेंटेशन, परिणाम अक्सर अमूर्त होते हैं। लेकिन हॉबीज में तुरंत रिज़ल्ट मिलता है: एक कढ़ाई की स्कार्फ, हाथ से बनी पॉट्री, या छत के बाग का हरा-भरा रूप। दिल्ली के 24 वर्षीय अर्जुन वर्मा कहते हैं, “कंसल्टेंसी में एक साल बिताने के बाद मुझे लगा कि दिन भर मीटिंग्स और एक्सेल शीट्स में फंसकर मैं कुछ बना नहीं रहा। अब वुडवर्क सीखना मेरे लिए बेहद संतोषजनक है।” हैदराबाद की मेहक सिंह भी अपने शाम के समय को नेटवर्किंग की बजाय पॉटरी क्लास में बिताती हैं। उनका कहना है, “पॉटरी मुझे धीमा करती है और मानसिक संतुलन देती है।”
Gen Z की नई सफलता की परिभाषा
पुराने लोग अक्सर Gen Z को “अलसी” या “अधिकारप्रिय” कहते हैं। लेकिन विशेषज्ञ बताते हैं कि यह सिर्फ एक सफलता की बदलती परिभाषा है। Gen Z ने आर्थिक अनिश्चितता, क्लाइमेट एंग्जायटी और COVID-19 जैसी चुनौतियों के बीच पला बढ़ा है। उनके लिए पारंपरिक करियर अब सुरक्षित या भरोसेमंद नहीं लगते। परिणामस्वरूप, व्यक्तिगत संतोष और मानसिक स्वास्थ्य उनकी प्राथमिकता बन गए हैं।
इसलिए कई युवा अब लैपटॉप छोड़कर सुई और धागा, मिट्टी और पॉटरी, या छोटे बाग की देखभाल में समय लगाना पसंद करते हैं।












