Kharif Season: देश के दो बड़े कृषि प्रधान राज्यों मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश में बिना सब्सिडी वाले फर्टिलाइज़र की बिक्री पर लगे बैन ने खेती-बाड़ी और फ़सल उत्पादन को लेकर नई मुसीबतखड़ी कर दी है। यह फ़ैसला ऐसे समय में आया है, जब देश पहले से ही कमज़ोर मॉनसून और पश्चिम एशिया में चल रहे संकट की वजह से फर्टिलाइज़र की सप्लाई में आ रही दिक्कतों से जूझ रहा है।
मध्य प्रदेश सरकार ने यूरिया बनाने वाली बड़ी कंपनियों को राज्य के भीतर बिना सब्सिडी वाले फर्टिलाइज़र बेचने से रोक दिया है। इससे पहले, उत्तर प्रदेश भी ऐसा ही कदम उठा चुका था। इसके बाद, 20 मई को महाराष्ट्र ने भी इसी तरह का निर्देश जारी किया, जिससे यह समस्या और भी बढ़ गई।
राज्य सरकारों का तर्क
राज्य सरकारों का तर्क है कि कई कंपनियाँ बिना सब्सिडी वाले उत्पादों जैसे कि बायो-स्टिमुलेंट्स, लिक्विड स्पेशलिटी फर्टिलाइज़र और पानी में घुलने वाले फर्टिलाइज़र को सब्सिडी वाले फर्टिलाइज़र के साथ “टैग” (बंडल) करके बेच रही हैं। यह कदम ऐसी हरकतों पर रोक लगाने और सब्सिडी के गलत इस्तेमाल को रोकने के लिए उठाया गया है।
इस फ़ैसले से इंडस्ट्री नाराज़
हालाँकि, इंडस्ट्री इस फ़ैसले से सहमत नहीं है। उनका कहना है कि इस कदम से न सिर्फ़ फर्टिलाइज़र की सप्लाई में रुकावट आएगी, बल्कि किसानों की फ़सलों को संतुलित पोषण भी नहीं मिल पाएगा। पिछले कई सालों से भारत सरकार यूरिया पर ही पूरी तरह निर्भर रहने की आदत को कम करने के प्रयास किए जा रहे हैं। साथ ही रासायनिक फर्टिलाइज़र के संतुलित इस्तेमाल को बढ़ावा देने की नीति पर भी काम किया जा रहा है।
नीति का असर राष्ट्रीय स्तर पर भी पड़ने की संभावना
मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश दोनों ही कृषि के लिहाज़ से बहुत अहम राज्य हैं। मध्य प्रदेश देश का दूसरा सबसे बड़ा अनाज उत्पादक राज्य है और दालों व तिलहनों की खेती में सबसे आगे है। वहीं, उत्तर प्रदेश देश के कुल कृषि उत्पादन में लगभग 20 प्रतिशत का योगदान देता है। इसलिए, इन राज्यों में लागू की गई किसी भी नीति का असर राष्ट्रीय स्तर पर भी पड़ने की पूरी संभावना है।
इंडस्ट्री से जुड़े सूत्रों के मुताबिक, बिना सब्सिडी वाले फर्टिलाइज़र का सेक्टर अब बढ़कर लगभग 1 अरब डॉलर का हो चुका है। इन फर्टिलाइज़र में खास तरह के पोषक तत्व होते हैं जो, खासकर ज़्यादा पैदावार देने वाली फ़सलों और संतुलित खेती के तरीकों के लिए बहुत ज़रूरी होते हैं। पिछले कुछ सालों में, खाद बनाने वाली बड़ी कंपनियों ने भी इस सेक्टर में काफी निवेश किया है। इसलिए, इस कैटेगरी की खादों पर बैन लगाने से इन निवेशों पर बुरा असर पड़ सकता है।

FAI ने चिंता जताई- राज्य सरकारों से अपील की
इस मुद्दे पर चिंता जताते हुए, फर्टिलाइजर एसोसिएशन ऑफ इंडिया (FAI) ने राज्य सरकारों से अपील की है कि वे अपने निर्देशों पर फिर से विचार करें। FAI का तर्क है कि ऐसे फैसलों से सरकार के बड़े और लंबे समय के लक्ष्यों को नुकसान पहुँच सकता है। संगठन ने महाराष्ट्र सरकार को लिखे एक पत्र में इन्हीं चिंताओं को ज़ाहिर किया है।
इंडस्ट्री के अधिकारियों का मानना है कि “टैगिंग” यानी सब्सिडी वाली खाद के साथ-साथ दूसरे प्रोडक्ट भी बेचना ज़रूरी करना वाकई एक असली समस्या है, लेकिन, उनका कहना है कि पूरी तरह से बैन लगाना इसका सही हल नहीं है। इसके बजाय, वे बीच का कोई रास्ता निकालने की वकालत करते हैं।
Read Also- इस राज्य में में पशुपालन और मत्स्य पालन को बढ़ावा दे रही सरकार, उत्पादन बढ़ाने पर भी फोकस, जानें क्या है लक्ष्य?
रीफ सीज़न के दौरान इस आदेश को लागू करने से रोक दिया जाए
FAI का सुझाव है कि फिलहाल आने वाले खरीफ सीज़न के दौरान इस आदेश को लागू करने से रोक दिया जाए, ताकि बुवाई के काम पर कोई असर न पड़े। इसके अलावा, उसने एक ‘ज्वाइंट वर्किंग ग्रुप’ बनाने का प्रस्ताव दिया है, जिसमें कृषि विभाग, खाद कंपनियों, डीलर एसोसिएशन और किसानों के प्रतिनिधि शामिल हों, ताकि इस समस्या का कोई व्यावहारिक और मुमकिन हल निकाला जा सके।
जानकारों का मानना है कि ऐसे समय में, जब दुनिया भर में खाद की सप्लाई पहले से ही मुश्किल में है। राज्य स्तर पर लिए गए फैसले हालात को और भी खराब कर सकते हैं। इन नीतियों का असली असर आने वाले खरीफ सीज़न में साफ तौर पर दिखाई देने की संभावना है। कुल मिलाकर, FAI सरकार से अपील करता है कि वह जल्दबाजी में बैन न लगाए, बल्कि ऐसा हल निकाले जो सभी पक्षों किसानों, इंडस्ट्री और सप्लाई चेन के हितों की रक्षा करे।













