पाकिस्तान के आर्मी चीफ जनरल Asim Munir ने हाल ही में दावा किया था कि ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारत ने अमेरिका से सीज़फायर के लिए मध्यस्थता की मांग की थी। लेकिन अब अमेरिका में सामने आए नए खुलासों ने इस पूरे नैरेटिव पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं।
दरअसल, अमेरिका के Foreign Agents Registration Act यानी FARA के तहत दाखिल दस्तावेजों से पता चला है कि जिस समय भारत आतंकवाद के खिलाफ सख्त कार्रवाई कर रहा था, उसी दौरान पाकिस्तान वॉशिंगटन में बड़े स्तर पर लॉबिंग और बैकडोर डिप्लोमेसी में जुटा हुआ था।
यानी एक तरफ सार्वजनिक मंचों पर पाकिस्तान अपनी जीत की कहानी सुनाने में लगा था, तो दूसरी तरफ अमेरिकी सांसदों, रक्षा अधिकारियों और वित्तीय एजेंसियों तक पहुंच बनाने की कोशिश तेज कर दी गई थी। यही वजह है कि अब असिम मुनीर के बयान पर नई बहस शुरू हो गई है।
पहलगाम हमले के बाद बदला पूरा समीकरण
22 अप्रैल को पहलगाम में हुए आतंकी हमले ने पूरे देश को झकझोर दिया था। इस हमले में 26 लोगों की मौत हुई थी, जिनमें 25 भारतीय और एक नेपाली नागरिक शामिल था। इसके बाद भारत ने जवाबी कार्रवाई करते हुए ऑपरेशन सिंदूर लॉन्च किया। भारतीय सुरक्षा एजेंसियों ने पाकिस्तान और पीओजेके में मौजूद आतंकी ठिकानों को निशाना बनाया। भारत की इस कार्रवाई के बाद दोनों देशों के बीच तनाव अचानक बेहद बढ़ गया। लेकिन इसी दौरान अमेरिका में पाकिस्तान की तरफ से शुरू हुई लॉबिंग अब चर्चा का बड़ा विषय बन गई है।
ऑपरेशन सिंदूर शुरू होते ही एक्टिव हुआ पाकिस्तान
FARA दस्तावेजों के मुताबिक, 6 मई को जैसे ही भारत ने ऑपरेशन सिंदूर शुरू किया, पाकिस्तान से जुड़े प्रतिनिधियों ने अमेरिका के राजनीतिक और रक्षा गलियारों में तेज़ी से संपर्क साधना शुरू कर दिया। रिकॉर्ड में “Meeting request w/Ambassador” जैसे कई एंट्री दर्ज हैं। इन दस्तावेजों में अमेरिकी सांसदों, सीनेट स्टाफ, ट्रेजरी अधिकारियों और विदेश नीति सलाहकारों से लगातार संपर्क की जानकारी सामने आई है। इन संपर्कों में अमेरिकी राजनीति के कई बड़े नाम जुड़े बताए गए हैं। इनमें House Foreign Affairs Committee के चेयरमैन Brian Mast, Senate Majority Leader John Thune, House Minority Leader Hakeem Jeffries और House Majority Leader Steve Scalise के कार्यालयों से जुड़ी बातचीत शामिल बताई गई है। एक एंट्री में “तकरीबन क्षेत्रीय तनाव” पर ब्रायन मास्ट के साथ कॉल का जिक्र है, जबकि दूसरी एंट्री में हकीम जेफ्रीज़ के सलाहकार वाइंडी पार्कर के साथ बैठक तय करने की चर्चा दर्ज है।
पाकिस्तान ने मांगी डिफेंस अटैची मीटिंग
सबसे ज्यादा हलचल 9 मई को देखने को मिली। दस्तावेजों में कई जगह “Defense Attache Meeting Request” का उल्लेख किया गया है। इन एंट्रीज़ में अमेरिकी सीनेटर Roger Wicker, Tom Cotton, Richard Blumenthal और प्रतिनिधि Mike Rogers से जुड़े स्टाफ से संपर्क का जिक्र है। यानी पाकिस्तान सिर्फ राजनीतिक समर्थन नहीं तलाश रहा था, बल्कि वह रक्षा और सुरक्षा मामलों में भी अमेरिकी नेटवर्क को सक्रिय करने की कोशिश कर रहा था। दस्तावेजों में अमेरिकी मीडिया से संपर्क की बात भी सामने आई है। खासतौर पर Wall Street Journal की पत्रकार Rebecca Ballhaus के साथ बातचीत का जिक्र भी इन फाइलों में दर्ज है।
FATF और आतंक फंडिंग को लेकर भी एक्टिव रहा पाकिस्तान
इन दस्तावेजों का सबसे दिलचस्प हिस्सा वो है जिसमें FATF, ट्रेजरी विभाग और आतंकवाद फंडिंग से जुड़े मामलों पर बातचीत का जिक्र मिलता है। रिकॉर्ड बताते हैं कि पाकिस्तान ने अमेरिकी ट्रेजरी अधिकारियों और वित्तीय इंटेलिजेंस से जुड़े लोगों तक पहुंच बनाने की कोशिश की। कई बैठकों में “Banking/Finance Information Gathering” और “Military, Security and International Affairs” जैसे विषय दर्ज हैं। यानी मामला सिर्फ सीज़फायर या डिप्लोमेसी तक सीमित नहीं था। पाकिस्तान इस पूरे तनाव के दौरान अंतरराष्ट्रीय दबाव को मैनेज करने की कोशिश में लगा हुआ था।
लॉबिंग पर खर्च हुए हजारों डॉलर
FARA फाइलिंग के मुताबिक, पाकिस्तान से जुड़े काम के लिए वॉशिंगटन की एक लॉबिंग फर्म को कुल 55,000 डॉलर की राशि दी गई। इसमें 25,000 डॉलर का रिटेनर और बाकी रकम मीटिंग्स और शेड्यूलिंग गतिविधियों से जुड़ी बताई गई है। दस्तावेजों में सीनेट और कांग्रेस कार्यालयों के साथ बैठकों पर हुए खर्च का भी उल्लेख है। इतना ही नहीं, जून और जुलाई तक भी पाकिस्तान की तरफ से अमेरिकी रक्षा और राजनीतिक हलकों में संपर्क बनाए रखने की कोशिश जारी रही। रिकॉर्ड में “Defense Delegation” और “Air Chief Marshal Meeting Request” जैसी एंट्रीज़ भी दर्ज हैं।
अब सवालों के घेरे में असिम मुनीर का दावा
इन खुलासों के बाद सबसे बड़ा सवाल यही उठ रहा है कि अगर भारत ने वास्तव में अमेरिका से मध्यस्थता मांगी थी, तो फिर पाकिस्तान को इतनी बड़ी लॉबिंग मुहिम चलाने की जरूरत क्यों पड़ी? भारत सरकार लगातार साफ कहती रही है कि सीज़फायर की पहल पाकिस्तान की तरफ से हुई थी। भारतीय अधिकारियों के मुताबिक, पाकिस्तान के DGMO ने सीधे भारतीय DGMO लेफ्टिनेंट जनरल Rajiv Ghai से संपर्क किया था। भारत ने यह भी स्पष्ट किया है कि ऑपरेशन सिंदूर का 88 घंटे का सैन्य चरण जरूर खत्म हुआ, लेकिन आतंकवाद के खिलाफ भारत की नई रणनीति के तहत यह ऑपरेशन अभी भी सक्रिय माना जा रहा है।
पाकिस्तान का नैरेटिव और जमीनी हकीकत
दिलचस्प बात यह है कि पाकिस्तान एक तरफ अंतरराष्ट्रीय मंचों पर खुद को शांतिप्रिय दिखाने की कोशिश करता रहा, जबकि दूसरी तरफ अमेरिका में बड़े स्तर पर राजनीतिक, सैन्य और वित्तीय लॉबिंग चल रही थी। अब FARA दस्तावेज सामने आने के बाद पाकिस्तान के दावों और असल गतिविधियों के बीच का फर्क साफ दिखाई देने लगा है। ऑपरेशन सिंदूर सिर्फ सैन्य कार्रवाई नहीं था, बल्कि इसने भारत-पाकिस्तान के बीच चल रही कूटनीतिक लड़ाई की भी कई परतें खोल दी हैं। और अब वॉशिंगटन से सामने आए ये दस्तावेज उसी कहानी का नया अध्याय बन चुके हैं।

















