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Ganga Saptami : क्यों सालों तक खराब नहीं होता गंगाजल? जानें क्या है इसका धार्मिक और वैज्ञानिक महत्व

Ganga Saptami

Ganga Saptami : इस वर्ष गंगा सप्तमी का त्योहार 23 अप्रैल को मनाया जाएगा। माना जाता है कि इसी दिन मां गंगा प्रकट हुई थीं। गंगा नदी का जितना धार्मिक महत्व है, उतना ही वैज्ञानिक महत्व भी है। दिव्य और प्राकृतिक गुणों से भरपूर होने के कारण गंगा के जल को अत्यंत पवित्र और शुद्ध माना जाता है। कहा जाता है कि गंगा के मात्र दर्शन करने से ही मोक्ष और मुक्ति के द्वार खुल जाते हैं। सदियों से मां गंगा लोगों के पापों को धोकर उनका उद्धार करती आ रही हैं। मां गंगा की यात्रा केवल गंगोत्री से बहकर गंगा सागर में विलीन होने तक ही सीमित नहीं है। बल्कि, युगों-युगों से वह मानवता को धर्म का सच्चा सार सिखाती आ रही हैं।

 

कहा जाता है कि जिन्हें मां गंगा के दर्शन का सौभाग्य प्राप्त होता है, वे वास्तव में धन्य होते हैं। गंगा में श्रद्धापूर्वक डुबकी लगाने से और भी अधिक सौभाग्य की प्राप्ति होती है, क्योंकि इसका जल अमृत (अमरता का रस) के समान है। गंगा नदी को उसके जल के अद्वितीय गुणों के कारण अमूल्य माना जाता है। गंगा का जल लंबे समय तक अपनी शुद्धता और पवित्रता बनाए रखता है। कहा जाता है कि इसकी उत्पत्ति भगवान विष्णु के चरणों से हुई है और यह भगवान शिव की जटाओं में निवास करती है। ऐसी मान्यता है कि गंगा के तट पर स्थित तीर्थ स्थल अन्य पवित्र स्थलों की तुलना में कहीं अधिक पवित्र हैं।

 

लंबे समय तक खराब क्यों नहीं होता गंगाजल?

गंगा एक ऐसी नदी है जो हिमालय से निकलती है और बंगाल की खाड़ी तक बहती है, जहाँ अंततः यह सागर में विलीन हो जाती है। ज्योतिषाचार्य के अनुसार, हमारी उन्नत सभ्यता का विकास ठीक गंगा के तटों पर ही हुआ है। ऐतिहासिक रूप से सनातन परंपरा के लगभग सभी विद्वत्तापूर्ण शोध, महान ऋषि-मुनि और भव्य नगर गंगा नदी के तटों पर ही स्थापित रहे हैं। उन्होंने बताया कि गंगा का जल दिव्य गुणों से इतना ओत-प्रोत है कि जहाँ अन्य प्रकार का जल खराब हो सकता है, वहीं गंगा का जल कई वर्षों तक खराब नहीं होता। इसी कारण से, लोग गंगा के जल को अपने घरों, मंदिरों और अन्य पवित्र स्थानों में वर्षों तक सहेजकर रखते हैं।

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गंगा सप्तमी पर गंगाजल से जुड़े रीति-रिवाज और प्रथाएँ

गंगा का दुग्धाभिषेक

शास्त्रों के अनुसार, गंगा सप्तमी के दिन दान-पुण्य और शुभ कार्यों का विशेष महत्व होता है। इस पावन अवसर पर, गंगा के दिव्य नामों का जाप करते हुए उनका सहस्रार्चन (हजारों अर्पणों वाली एक विस्तृत पूजा विधि) करना चाहिए। माँ गंगा की पूजा के बाद, निर्धारित विधि के अनुसार दुग्धाभिषेक (दूध से अभिषेक) किया जाता है। जो व्यक्ति यह अनुष्ठान करता है, उस पर माँ गंगा की कृपा सदैव बनी रहती है।

 

गंगा में स्नान और पूजा-अर्चना

यदि संभव हो, तो इस दिन गंगा नदी में पवित्र स्नान करना चाहिए। “ॐ श्री गंगे नमः” मंत्र का जाप करते हुए माँ गंगा को अर्घ्य (जल अर्पण) दें। गंगा नदी में तिल प्रवाहित करें। गंगा घाट (नदी के किनारे) पर पूजा-अर्चना करें। पूजा के बाद, अपनी सामर्थ्य के अनुसार ब्राह्मणों और ज़रूरतमंदों को दान दें।

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दान और पुण्य कार्य

गंगा सप्तमी के दिन, पूजा-अर्चना संपन्न करने के बाद सत्तू (भुने हुए चने का आटा), मिट्टी के घड़े , हाथ के पंखे, छतरियाँ या चप्पलें दान करना अत्यंत पुण्यकारी माना जाता है। इस दिन आप वस्त्र, अनाज और इसी तरह की अन्य वस्तुएँ भी दान कर सकते हैं। अपनी क्षमता के अनुसार आर्थिक दान भी किया जा सकता है। इसके अतिरिक्त, इस दिन मीठा पानी या शरबत (मीठे पेय पदार्थ) वितरित करना भी एक अत्यंत पुण्यकारी कार्य माना जाता है।

 

 पितरों की पूजा (पितृ पूजन)

माँ गंगा अपने पितरों को मोक्ष (मुक्ति) प्रदान करने वाली हैं। इसलिए उन्हें मोक्षदायिनी के रूप में भी पूजा जाता है। परिणामस्वरूप, गंगा के तट पर जाकर श्राद्ध और पिंडदान करना अत्यंत आध्यात्मिक महत्व रखता है।

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