Artemis II मिशन: अंतरिक्ष यात्रा की बात आते ही हमारे दिमाग में कई प्रकार की इमेजिनेशन आने लगती है। राकेट, चांद, स्पेस कॉलोनी इत्यादि, लेकिन इसके पीछे एक गंभीर पहलू छुपा है जिस पर चर्चा शायद कम होती है। यदि इंसान सच में स्पेस में शिफ्ट होने लगा तो इंसान की प्राकृतिक जरूरतों का क्या होगा? स्पेस में इंसान की प्रजनन क्षमता कैसे काम करेगी? और ऐसे संवेदनशील मुद्दे वैज्ञानिकों की चिंता भी बनते जा रहे हैं।
Artemis II मिशन के लॉन्च से ठीक पहले NASA ने एक नई रिसर्च जारी की, जिसने इस महत्वपूर्ण मुद्दे पर चर्चा को तेज कर दिया। वैज्ञानिकों का कहना है कि माइक्रो ग्रेविटी यानी शून्य गुरुत्वाकर्षण में शरीर की संरचना ही नहीं बदलती बल्कि प्रजनन क्रिया भी प्रभावित होती है। ऐसे में सवाल यह उठता है कि यदि भविष्य में इंसान अंतरिक्ष में जीवन जीना चाहता है, चांद या मंगल पर बसना चाहता है तो क्या वहां परिवार बसाना संभव हो पाएगा? और विज्ञान अब इसी के जवाब खोज रहा है और Artemis II मिशन इस दिशा में बहुत बड़ा कदम साबित होगा।
क्या है NASA का यह Artemis II मिशन?
Artemis II मिशन NASA द्वारा लांच किया गया एक विशेष मिशन है, जिसमें 4 अंतरिक्ष यात्री चंद्रमा के चारों ओर 10 दिनों की यात्रा करेंगे। 50 साल बाद पृथ्वी से इंसान फिर से चंद्रमा पर रहने जा रहा है। इस मिशन का उद्देश्य केवल चांद तक पहुंचना नहीं बल्कि अंतरिक्ष में मानव जीवन की चुनौतियों को समझना भी है। यह मिशन असल में स्पेस सेक्सोलॉजी के विषय पर रिसर्च करने के लिए शुरू किया गया है। ताकि पता किया जा सके कि चांद या मंगल पर रहना, वहां प्रजनन करना संभव है या नहीं?
माइक्रो ग्रेविटी सेक्स लाइफ को कैसे प्रभावित करती है?
वैज्ञानिकों की हालिया रिसर्च से पता चलता है कि माइक्रो ग्रेविटी मानव की प्रजनन प्रणाली पर गंभीर असर डालती है। रिसर्च में पाया गया है कि शून्य गुरुत्वाकर्षण में स्पर्म की दिशा बदल जाती है। स्पर्म भले ही सक्रिय रहते हैं लेकिन सही दिशा में नहीं बढ़ पाते। इससे फर्टिलाइजेशन की प्रक्रिया भी प्रभावित होती है। एक और अध्ययन में पाया गया है कि स्पेस में माइक्रो ग्रेविटी होने की वजह से भ्रूण का विकास भी बाधित होता है।
इस रिसर्च से पता चलता है कि अंतरिक्ष में गर्भधारण बेहद ही जटिल प्रक्रिया है। कॉस्मिक रेडिएशन भ्रूण के लिए काफी खतरनाक भी हो सकते हैं। वहीं माइक्रो ग्रेविटी की वजह से शरीर की कार्य प्रणाली पूरी तरह से बदल जाती है। स्पेस में हार्मोनल संतुलन भी प्रभावित होते हैं। ऐसे में यह साफ नहीं हो पा रहा कि क्या स्पेस में इंसान सुरक्षित तरीके से प्रजनन कर सकता है या नहीं।
अंतरिक्ष यात्रियों के लिए यह रिसर्च क्यों महत्वपूर्ण है?
Artemis II मिशन फिलहाल एक रिसर्च के आधार पर शुरू किया गया है। लेकिन आने वाले समय में जब लंबे समय के लिए इंसान मंगल या चंद्रमा पर बसने का सपना पूरा करेंगे। वहां कॉलोनाइजेशन होगा तब इंसानों को अंतरिक्ष में लंबे समय तक रहना होगा। ऐसे में अंतरिक्ष में सेक्स लाइफ और प्रजनन स्वास्थ्य का एक बड़ा मुद्दा बन सकता है
वर्तमान में वैज्ञानिक स्पेस सेक्सोलॉजी नाम के नए क्षेत्र पर काम कर रहे हैं, ताकि अंतरिक्ष में मानव संबंध प्रजनन और मानसिक स्वास्थ्य का अध्ययन किया जाए। इस रिसर्च में शायद स्पेस में शारीरिक संबंध बनाने की चुनौतियां भावनात्मक और मानसिक प्रभाव, प्रजनन की वैज्ञानिक सीमाओं पर अध्ययन किया जा रहा है। क्योंकि चांद या मंगल पर बसना है तो ऑक्सीजन और पानी ही नहीं बल्कि प्रजनन की क्षमता भी जरूरी होगी। इसलिए Artemis II मिशन जैसे मिशन केवल एक तकनीकी परीक्षण नहीं है यह मानव सभ्यता की नींव हैं।
कुल मिलाकर Artemis II मिशन ने स्पेस सेक्सोलॉजी और प्रजनन क्षमता पर अध्ययन करने का काम शुरू कर दिया है। Artemis II मिशन से इकट्ठा किये डाटा के आधार पर वैज्ञानिक अंतरिक्ष में बसने और कॉलोनी बनाने की ओर आगे कदम बढ़ा सकेंगे।
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