सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हेट स्पीच से निपटने के लिए भारत में पहले से कानून मौजूद हैं।
कोर्ट ने साफ किया कि नए अपराध बनाना या सजा तय करना संसद और विधायिका का काम है।
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने कई याचिकाओं पर यह फैसला सुनाया।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि “कोई legislative vacuum नहीं है”, यानी कानून की कमी नहीं है।
कोर्ट ने माना कि समस्या कानून की कमी नहीं बल्कि उसके सही लागू न होने की है।
सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर हेट स्पीच मामलों में अब मौजूदा IT और क्रिमिनल कानूनों का इस्तेमाल जारी रहेगा।
फैसले के बाद अभिव्यक्ति की आजादी और हेट स्पीच के बीच संतुलन पर बहस तेज हो गई है।
कोर्ट ने केंद्र सरकार को सुझाव दिया कि जरूरत हो तो भविष्य में नया कानून लाने पर विचार किया जा सकता है।
कई याचिकाओं में “UPSC Jihad” और धार्मिक भाषणों जैसे मामलों का भी जिक्र था।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अदालत कानून की व्याख्या कर सकती है, लेकिन कानून बना नहीं सकती।
सोशल मीडिया यूजर्स के लिए इसका मतलब है कि भड़काऊ पोस्ट पर कार्रवाई अब भी IPC/BNS और IT नियमों के तहत हो सकती है।
फैसले के बाद सोशल मीडिया पर लोगों की मिली-जुली प्रतिक्रिया देखने को मिली, कुछ ने इसे सही बताया तो कुछ ने इसे “missed opportunity” कहा।
Read More...