भारत में महंगाई एक बार फिर तेज़ी से बढ़ रही है। कॉमर्स मिनिस्ट्री के ताज़ा आंकड़ों के अनुसार, मई 2026 में थोक महंगाई (WPI – होलसेल प्राइस इंडेक्स) बढ़कर 9.68% हो गई। अप्रैल में यह 8.26% थी। यह पिछले 43 महीनों का सबसे ऊंचा स्तर है; इससे पहले, सितंबर 2022 में WPI 10.70% दर्ज की गई थी।
महंगाई में इस बढ़ोतरी के मुख्य कारणों में ईंधन और बिजली की कीमतों में भारी उछाल, खाने-पीने की चीज़ों की बढ़ती लागत और मैन्युफैक्चरिंग (निर्माण) की बढ़ती लागत शामिल हैं। इसके अलावा, अमेरिका और ईरान के बीच जारी तनाव ग्लोबल एनर्जी मार्केट पर दबाव डाल रहा है।
मई 2026 में थोक महंगाई क्यों बढ़ी?
सरकारी आंकड़ों से कई अहम कैटेगरी में कीमतों में बढ़ोतरी का पता चलता है:
- थोक महंगाई (WPI): 8.26% से बढ़कर 9.68% हुई
- प्राइमरी आर्टिकल्स (प्राथमिक वस्तुएं): 3.78% से बढ़कर 4.99% हुई
- फूड इंडेक्स (खाद्य सूचकांक): 3.11% से बढ़कर 4.49% हुआ
- ईंधन और बिजली: 24.89% से बढ़कर 30.33% हुई
- मैन्युफैक्चर्ड प्रोडक्ट्स (निर्मित उत्पाद): 6.68% से बढ़कर 7.48% हुए
सबसे ज़्यादा बढ़ोतरी ईंधन और बिजली सेक्टर में देखी गई, जिससे इंडस्ट्रीज़ के लिए प्रोडक्शन कॉस्ट (उत्पादन लागत) बढ़ गई।
रिटेल महंगाई भी बढ़ी
खुदरा महंगाई (CPI) भी अप्रैल में 3.48% से बढ़कर मई 2026 में 3.93% हो गई। हालांकि यह RBI के 4% के टारगेट रेंज के भीतर है, लेकिन लगातार बढ़ती कीमतें आने वाले महीनों में दबाव बढ़ा सकती हैं।
2025-26 फाइनेंशियल ईयर में थोक महंगाई का ट्रेंड
चार्ट में दिखाए गए आंकड़े पूरे फाइनेंशियल ईयर के दौरान थोक महंगाई में उतार-चढ़ाव को दर्शाते हैं।
| महीना | थोक महंगाई |
|---|---|
| अप्रैल | 0.85% |
| मई | 0.39% |
| जून | -0.13% |
| जुलाई | -0.58% |
| अगस्त | 0.52% |
| सितंबर | 0.13% |
| अक्टूबर | -1.21% |
| नवंबर | -0.32% |
| दिसंबर | 0.83% |
| जनवरी | 1.81% |
| फरवरी | 2.13% |
| मार्च | 3.88% |
मार्च में शुरू हुआ ऊपर की ओर का ट्रेंड अब मई में 9.68% तक पहुंच गया है, जो प्रोडक्शन कॉस्ट में भारी बढ़ोतरी का संकेत है।
2025-26 फिस्कल ईयर में खुदरा महंगाई का ट्रेंड:
| महीना | रिटेल महंगाई |
|---|---|
| अप्रैल | 3.16% |
| मई | 2.82% |
| जून | 2.10% |
| जुलाई | 1.61% |
| अगस्त | 2.07% |
| सितंबर | 1.44% |
| अक्टूबर | 0.25% |
| नवंबर | 0.71% |
| दिसंबर | 1.33% |
| जनवरी | 2.74% |
| फरवरी | 3.21% |
| मार्च | 3.40% |
पूरे साल खुदरा महंगाई काफी हद तक कंट्रोल में रही, हालांकि मार्च के बाद थोड़ी बढ़ोतरी देखी गई।
WPI और CPI में क्या अंतर है?
थोक मूल्य सूचकांक (WPI):
- यह थोक बाज़ार में व्यापारियों के बीच होने वाले लेन-देन पर आधारित है।
- यह मैन्युफैक्चरिंग, ईंधन और कच्चे माल की लागत से काफी हद तक प्रभावित होता है।
उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI):
- यह बाज़ार में आम उपभोक्ता द्वारा चुकाई जाने वाली कीमतों पर आधारित है।
- RBI मुख्य रूप से अपनी मौद्रिक नीति बनाने के लिए CPI का इस्तेमाल करता है।
इसका आम आदमी पर क्या असर पड़ेगा?
अगर थोक महंगाई लंबे समय तक ज़्यादा बनी रहती है, तो कंपनियाँ बढ़ी हुई लागत का बोझ ग्राहकों पर डाल सकती हैं। इससे निकट भविष्य में इन चीज़ों की कीमतें बढ़ सकती हैं:
- पेट्रोल, डीज़ल और ट्रांसपोर्टेशन
- खाने-पीने की चीज़ें
- खाना पकाने का तेल
- घरेलू सामान
- इलेक्ट्रॉनिक उत्पाद
- निर्माण सामग्री
संक्षेप में, हालाँकि खुदरा महंगाई अभी नियंत्रण में है, लेकिन थोक महंगाई में लगातार बढ़ोतरी से आने वाले महीनों में रोज़मर्रा की चीज़ों के महँगे होने की संभावना बढ़ गई है।
सरकार के सामने क्या चुनौती है?
महंगाई को काबू में रखने के लिए, सरकार को ईंधन की कीमतों, आयात लागत और सप्लाई चेन पर कड़ी नज़र रखनी होगी। वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की कीमतों में और बढ़ोतरी या लगातार भू-राजनीतिक तनाव महंगाई पर अतिरिक्त दबाव डाल सकते हैं।
मई 2026 के आँकड़े बताते हैं कि भारत में थोक महंगाई 43 महीनों के उच्चतम स्तर 9.68% पर पहुँच गई है। ईंधन, खाने-पीने की चीज़ों और मैन्युफैक्चरिंग की बढ़ती लागत इसके मुख्य कारण हैं। जबकि खुदरा महंगाई अभी RBI की तय सीमा के भीतर है, थोक कीमतों में लगातार बढ़ोतरी का असर जल्द ही आम आदमी की जेब पर पड़ सकता है।

