क्या पता कब मौत का पैगाम आ जाए।
कब जिंदगी की आखिरी शाम हो जाए। 
मैं तो ढूंढता रहता हूं ऐसे मौकों को दोस्तों। 
कि मेरी जिंदगी किसी को हंसाने के काम आ जाए।।

प्रेस फोटोग्राफर और रंगकर्मी ताजनूर खान पर ये पंक्तियां बिल्कुल सटीक बैठ रही हैं। यारों के यार और हमेशा सबसे हंसकर मिलने वाले ताजनूर खान पिछले 5 दिनों से गंभीर रूप से बीमार थे और बैरागढ़ स्थित चिरायु कोविड केयर हॉस्पिटल में एडमिट थे। लगातार सीने में दर्द सांस लेने में तकलीफ के चलते उन्हें चिरायु में एडमिट कराया गया था, लेकिन मंगलवार शाम अचानक ताजनूर की तबियत बिगड़ी और शाम 6.30 बजे उन्होंने अपनी अंतिम सांस ली। 


इसके बाद सोशल मीडिया पर जैसे ही उनके निधन की खबर वायरल हुई। उनको जानने वाला हर व्यक्ति हैरान रह गया। उनके चले जाने की खबर पर लोग यकीन ही नहीं कर पा रहे थे और एक दूसरे से फोन पर ताजनूर की खैरियत पूछ रहे थे। लगभग 6 दिन पहले ही ताजनूर खान ने वरिष्ठ रंगकर्मी हमीदउल्ला मामू के एक कार्यक्रम की कवरेज की थी। इस दौरान वे सबसे हंसी खुशी मिले थे, लेकिन अचानक ही ताजनूर के निधन की खबर ने सबको हैरानी में डाल दिया। 

चले गए ताज भाई : 
इस खबर की जानकारी मिलते ही वरिष्ठ पत्रकार आरिफ मिर्जा ने अपनी वॉल पर अपने चर्चित कॉलम सूरमा की फेंक की एक पुराने खबर शेयर करते हुए लिखा कि

” चले गए ताज भाई

ताजनूर ये किस मोड़ पे तुम्हें बिछड़ने की सूझी…
तुमसे यूं मुलाकातें बहुत मुक्तसर हुईं…मैं तुम्हारे खुश अखलाक का कायल रहा। मैंने तुम्हारे किरदार पे लिखा भी था। कितने खुश हुए थे तुम। कितने प्यारे लफ़्ज़ों में तुमने शुक्रिया अदा किया था। तीन चार दिन से सीने में दर्द के चलते चिरायु में भर्ती थे। आज शाम कार्डियक अरेस्ट से उनका इन्तकाल हुआ। पता चला है कि कोरोना काल मे ताज भाई किसी अखबार में भी नहीं थे। पुराने संस्थान ने उनका कुछ पैसा भी रोक रखा था। माली हालत खराब चल रही थी उनकी। अल्लाह तुम्हारे दरजात बुलंद करे। आमीन…”

आरिफ मिर्जा की इस पोस्ट के शेयर होने के बाद ही पत्रकाराें तक ताजनूर के अचानक चले जाने की यह खबर पहुंची। कई पत्रकारों ने ताजनूर के साथ अपने पुराने किस्से शेयर किए। वहीं कई पत्रकार तो इस खबर पर यकीन ही नहीं कर पा रहे थे।

एक साल से नहीं मिला था वेतन :
कोरोना काल के बाद से ही बेरोजगार ताजनूर की उनके चाचा के बेटे मोहम्मद सादिक से अच्छी पटती थी। सादिक बताते हैं कि ताजनूर एक साल से परेशान थे। एक तो वे एक साल से घर पर थे। साथ ही लगभग सात माह का वेतन उनके पुराने संस्थान ने भी रोक रखा था। हालांकि इसके बावजूद भी ताजनूर कभी परेशान नहीं दिखे। सादिक याद करते हुए कहते हैं कि लगभग 15 दिन पहले ताजनूर ने पत्रकारिता को छोड़ मंडी में कामकाज शुरू करने की बात कही थी।

इसके बाद ताजनूर ने एक हफ्ते तक मंडी में काम भी किया। हालांकि कुछ बात नहीं बनी। हालांकि उन्होंने कभी भी अपने परिवार से इस बारे में कोई जिक्र नहीं किया। वे हमेशा अपनी परेशानियों को खुद ही सुलझाने की कोशिश करते थे।

वरिष्ठ रंगकर्मी अलखनंदन और हबीब तनवीर को प्रिय थे ताज :
नट बुंदेले के निदेशक वरिष्ठ रंगकर्मी अंश पायन सिन्हा बताते हैं कि ताज भाई से उनका और उनके परिवार का रिश्ता करीब दो दशक पुराना है। ताजनूर ने सबसे पहले नट बुंदेले से ही रंगकर्म की शुरुआत की थी। इस दौरान वे लंबे समय तक वरिष्ठ रंगकर्मी अलखनंदन और उनकी संस्था नट बुंदेले के साथ जुड़े रहे। इसी दौरान ताज की मुलाकात प्रसिद्ध रंगकर्मी हबीब तनवीर से हुई। तनवीर साहब के साथ ताजनूर हमेशा साए की तरह ही साथ रहते थे।

हालांकि बाद में बढ़ती जिम्मेदारियों के कारण ताजनूर ने फोटोग्राफी करना शुरू की। अंश पायन सिन्हा बताते हैं कि 2003 में उनके सोलो शो में भी फाेटोग्राफी की जिम्मेदारी ताजनूर ने ही संभाली थी। बाद में वे कई अलग-अलग समाचार पत्राें से जुड़े इस दौरान वे ज्यादातर कला फाेटोग्राफर के रूप में ही अपनी सेवाएं देते रहे।

लोगों की मांग परिवार को मिले आर्थिक सहायता :
लगभग दो साल तक तंगहाली में गुजारने के बाद ताजनूर इस दुनिया को अलविदा कहकर चले गए हैं। हालांकि वे अपने पीछे दो बेटों अजमद और उजेर व पत्नी को छोड़ गए हैं। खराब आर्थिक स्थिति के कारण दोनों के बेटों के भरण-पोषण की जिम्मेदारी मां और चाचाओं पर है।

इन दोनों बच्चों की अच्छी शिक्षा और आर्थिक सहायता के लिए रंगकर्मी और कला पत्रकारों की मांग हैं कि ताजनूर ने लगभग 15 साल से भी ज्यादा समय तक प्रेस फोटोग्राफी की। ऐसे में उनकी सहायता के लिए प्रदेश सरकार को जरूरी कदम उठाने चाहिए।